Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय ऐसे साहित्य साधक का, जिन्होंने भोजपुरी माटी की खुशबू, गांव की आत्मा और किसान जीवन के संघर्ष को अपनी लेखनी का केंद्र बनाया। राम बहादुर राय उन रचनाकारों में हैं, जिन्होंने भोजपुरी और हिन्दी दोनों भाषाओं में लोकजीवन, सामाजिक सरोकार, सांस्कृतिक चेतना और भाषाई अस्मिता को सशक्त स्वर दिया।
वे केवल कवि नहीं, बल्कि लोकचिंतक, संस्मरणकार, शिक्षक और भोजपुरी भाषा आंदोलन के सक्रिय प्रहरी भी हैं। उनकी रचनाओं में गांव का बदलता परिवेश, टूटते रिश्तों की टीस, लोकसंस्कृति की मिठास और मानवीय संवेदनाओं की गरमाहट एक साथ दिखाई देती है। यही कारण है कि समकालीन भोजपुरी साहित्य में वे एक विशिष्ट और सम्मानित हस्ताक्षर के रूप में स्थापित हैं।
बलिया की धरती से निकली लोकचेतना की आवाज
1 मई 1971 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के भरौली गांव में जन्मे राम बहादुर राय का बचपन किसान परिवार के बीच बीता। पिता श्री रामायन राय और माता श्रीमती मालती देवी के संस्कारों ने उन्हें श्रम, संवेदना और लोकजीवन की गहरी समझ दी।
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खेत, खलिहान, गांव की चौपाल, लोकगीत, रिश्तों की आत्मीयता और ग्रामीण जीवन की चुनौतियां उनके अनुभव का हिस्सा रहीं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में गांव किसी कल्पना का विषय नहीं, बल्कि जीवंत यथार्थ बनकर सामने आता है। 
डॉ. विवेकी राय की परंपरा से मिली साहित्यिक दृष्टि
राम बहादुर राय के साहित्यिक व्यक्तित्व के निर्माण में डॉ. विवेकी राय का गहरा प्रभाव रहा। भरौली गांव से जुड़े होने के कारण उन्हें बचपन से ही डॉ. विवेकी राय का सान्निध्य और साहित्यिक वातावरण मिला।
लोकजीवन को साहित्य का केंद्र बनाने की जो परंपरा डॉ. विवेकी राय ने स्थापित की, उसी संवेदनशील धारा को राम बहादुर राय ने अपनी रचनाओं में आगे बढ़ाया। उनकी लेखनी में भोजपुरी माटी की गंध और ग्रामीण जीवन की सच्चाई पूरी प्रामाणिकता के साथ उपस्थित होती है।
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भोजपुरी साहित्य में गांव की धड़कनों को दी आवाज
राम बहादुर राय की रचनाओं में गांव केवल स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की जटिलताओं और बदलते सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है। वे लोक संस्कृति के क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हुए उसकी गरिमा और आत्मा को बचाए रखने का आग्रह करते हैं।
उनकी प्रमुख भोजपुरी कृतियां हैं-
- अब गँवुओं में शहर आ गइल
- भोजपुरी के मान्यता देई ए सरकार!
- गाँव के थाती (संस्मरण)
- हमार गाँव!!
- नेह के थुन्हीं-टाटी हऽ गाँव
इनमें विशेष रूप से ‘नेह के थुन्हीं-टाटी हऽ गाँव’ ग्रामीण जीवन, बदलती सामाजिक संरचना और लोक संवेदना का अत्यंत मार्मिक काव्य-दस्तावेज माना जाता है।

हिन्दी और भोजपुरी—दोनों साहित्य को समृद्ध किया
राम बहादुर राय ने हिन्दी साहित्य में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी प्रमुख हिन्दी कृतियों में 
- जीवन के विविध रंग
- अनकही संवेदनाएँ
- धरती के परिंदे
- आदमी के कई रंग
- आखिर मौन कब तक!! जैसी पुस्तकें शामिल हैं।
इसके अलावा उनकी रचनाएं देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। लगभग 29 साझा काव्य-संग्रहों में भी उनकी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज है।
शिक्षक भी, साहित्य साधक भी
राम बहादुर राय ने हिन्दी साहित्य और इतिहास में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। इसके अलावा मानवाधिकार एवं कर्तव्य, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा बीएड की शिक्षा हासिल की है।

वर्तमान में वे शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। शिक्षा और साहित्य को साथ लेकर चलने वाले राम बहादुर राय नई पीढ़ी को भाषा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का सतत प्रयास कर रहे हैं।
भोजपुरी भाषा आंदोलन की मजबूत आवाज
राम बहादुर राय का योगदान केवल साहित्य तक सीमित नहीं है। वे भोजपुरी भाषा के संवैधानिक सम्मान के लिए भी निरंतर सक्रिय रहे हैं।
वे भोजपुरी साहित्य विकास मंच के संगठन मंत्री तथा अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के कार्यकारिणी सदस्य के रूप में भोजपुरी भाषा और साहित्य के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए लगातार कार्य कर रहे हैं।
भोजपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है। वे भाषा के सम्मान को समाज की सांस्कृतिक पहचान और स्वाभिमान से जोड़कर देखते हैं।
सम्मानों से सजी साहित्य यात्रा
राम बहादुर राय की साहित्य साधना को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें विद्यावाचस्पति सारस्वत सम्मान, विद्यासागर सम्मान, बृजनन्दन तिवारी स्मृति सम्मान, जगन्नाथ सिंह पुरस्कार, पूर्वांचल गौरव सम्मान, विश्वरी ठाकुर स्मृति सम्मान, साहित्य विभूषण सम्मान तथा पंडित गौरीशंकर पाण्डेय अंतरराष्ट्रीय वाङ्मय सम्मान–2026 (नेपाल) प्रमुख हैं।

ये सम्मान उनकी साहित्यिक प्रतिभा, भोजपुरी भाषा और संस्कृति के प्रति उनके समर्पण तथा लोकजीवन को साहित्य में प्रतिष्ठित करने के उनके महत्वपूर्ण योगदान की राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति हैं।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
राम बहादुर राय को ‘भोजपुरी धुरंधर’ इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी साहित्य में गांव, किसान, लोक संस्कृति और सामाजिक यथार्थ को केंद्र में रखकर एक नई संवेदनशील धारा विकसित की। उनकी रचनाएं केवल साहित्य नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक स्मृति, लोक विरासत और बदलते समय का जीवंत दस्तावेज हैं।
उन्होंने सिद्ध किया कि भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि समृद्ध साहित्य, गहरी संवेदना और सांस्कृतिक चेतना की भाषा है। ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में राम बहादुर राय उस लोकधर्मी साहित्यकार के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने अपनी कलम से भोजपुरी माटी की खुशबू, ग्राम्य संस्कृति की आत्मा और लोकजीवन की सच्चाइयों को अमर शब्द दिए। (रिपोर्ट- डॉ० दिनेश प्रसाद सिन्हा, मुजफ्फरपुर बिहार)

