भोजपुरी काव्य संग्रह: अनबोलता
रचनाकार: डॉ. संतोष पटेल
समीक्षक: डॉ. पुष्कर कुमार
साहित्य केवल व्यक्तिगत भावनाओं और दुःखों की अभिव्यक्ति नहीं होता, बल्कि यह समाज के हाशिए पर खड़े लोगों, स्त्रियों, किसानों, श्रमिकों और संवेदनशील मनुष्यों की मौन पीड़ा को भी स्वर देता है। हिंदी साहित्य की परंपरा में प्रेमचंद के गोदान में किसान होरी का संघर्ष, निर्मला में स्त्री जीवन की यातना, महादेवी वर्मा की रचनाओं में करुणा और आत्मपीड़ा, अज्ञेय के शेखर : एक जीवनी में आत्मसंघर्ष तथा निराला की सरोज-स्मृति में पुत्री-वियोग की वेदना इसी संवेदनशील परंपरा के उदाहरण हैं।
इसी साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. संतोष पटेल का भोजपुरी काव्य संग्रह ‘अनबोलता’ समकालीन भोजपुरी कविता में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है। यह संग्रह केवल भाषा की सुंदरता को प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि समाज के उन वर्गों की पीड़ा और संघर्ष को भी अभिव्यक्ति देता है, जिनकी आवाज अक्सर दब जाती है।
ये भी पढ़ें-रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’: भोजपुरी रंगमंच के वह पुरोधा, जिनके ‘लोहा सिंह’ ने रेडियो पर रचा इतिहास
‘अनबोलता’ का मूल स्वर मौन के भीतर छिपे दर्द, प्रतिरोध और सामाजिक चेतना को व्यक्त करना है। कवि गरीब, श्रमिक, दलित और स्त्री जीवन के अनुभवों को केंद्र में रखते हैं। संग्रह की कविताएं जीवन-संघर्ष, अस्मिता और सामाजिक विषमता के प्रश्नों से सीधे संवाद करती हैं।
ग्रामीण परिवेश और जनजीवन का यथार्थ चित्रण इस संग्रह की प्रमुख विशेषता है। कवि का दृष्टिकोण मानवीय और संवेदनशील है, जो पाठक को पात्रों और परिस्थितियों से भावनात्मक रूप से जोड़ता है।
“कहेले गांव बिगड़ गइल मलिकाइन,
सरकार पांच किलो अनाज दे के,
बनावत बिया निकम्मा…”
(‘ढील हेरत’ कविता से)
भोजपुरी की सहजता, लोकधर्मिता और बोलचाल की भाषा इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति है। लोक प्रयोग, कहावतें और प्रतीक कविताओं को जीवंत बनाते हैं। कई स्थानों पर कवि प्रतीकों के माध्यम से सामाजिक विडंबनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
“हरिन, खरगोश आ बानर
अस खुस रहले जानू,
बाकिर रंगल सियार के टोली में
रहलें शामिल लकड़बग्घा…”
(‘रंगल सियार’ कविता से)
ये भी पढ़ें- भोजपुरी गीत, कविता आ गजल के अनमोल मणिका: डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना
यह संग्रह सामाजिक चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ है। जाति, वर्ग और असमानता जैसे प्रश्नों पर कवि की स्पष्ट दृष्टि दिखाई देती है। व्यवस्था के प्रति आंतरिक प्रतिरोध और उपेक्षित वर्गों के प्रति संवेदना इसकी वैचारिक मजबूती है।
“मालिक के दुअरा चुकामुक़ा नीचे,
जमीन प बइठल रहलें सुकट काका…”
(‘कनकटही कप’ कविता से)
कवि उन लोगों को केंद्र में लाते हैं, जिनका जीवन अक्सर समाज की मुख्यधारा में अनदेखा रह जाता है। इस दृष्टि से ‘अनबोलता’ केवल काव्य संग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज भी बन जाता है।
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसका जीवन से सीधा जुड़ाव है। कविताएं कृत्रिम भावुकता से दूर रहकर समाज की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। जहां आज साहित्य में मनोरंजन प्रधान रचनाओं की संख्या बढ़ रही है, वहीं ‘अनबोलता’ जैसी कृति गंभीर सामाजिक साहित्य की परंपरा को मजबूत करती है।
डॉ. संतोष पटेल ने भोजपुरी को केवल लोकभाषा के रूप में नहीं, बल्कि विचार और प्रतिरोध की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी कविताएं समकालीन समाज के यथार्थ, संघर्ष और संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से सामने लाती हैं।
ये भी पढ़ें- भोजपुरी के शेक्सपियर क्यों कहलाए भिखारी ठाकुर?
कुल मिलाकर ‘अनबोलता’ ऐसा काव्य संग्रह है, जो मौन को आवाज देता है और हाशिए के जीवन को साहित्य के केंद्र में स्थापित करता है। इसकी संवेदनात्मक शक्ति, सामाजिक प्रतिबद्धता और भोजपुरी भाषा की सहजता इसे समकालीन भोजपुरी साहित्य की उल्लेखनीय कृति बनाती है। यह संग्रह पाठकों को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि समाज और जीवन के अनकहे पक्षों पर गंभीर चिंतन करने के लिए भी प्रेरित करता है।
डॉ. पुष्कर कुमार, शालीमार बाग, दिल्ली

