रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’: भोजपुरी रंगमंच के वह पुरोधा, जिनके ‘लोहा सिंह’ ने रेडियो पर रचा इतिहास

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16 अगस्त जन्मदिन विशेष 
Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ शृंखला में आज पढ़िए उस साहित्यकार, नाटककार, अभिनेता और शिक्षक की कहानी, जिसने भोजपुरी को रेडियो के जरिए घर-घर पहुंचाया। ‘लोहा सिंह’ के रचनाकार रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ की लोकप्रियता ऐसी थी कि उनका अपना नाम पीछे छूट गया और लोग उन्हें ही ‘लोहा सिंह’ कहने लगे। 1991 में भारत सरकार ने उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया।

भोजपुरी साहित्य और रंगमंच की यात्रा में रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ का नाम उस पीढ़ी के साथ जुड़ा है, जिसने लोकभाषा को आधुनिक माध्यमों से जोड़ा। वे केवल ‘लोहा सिंह’ के लेखक नहीं थे। हिंदी और भोजपुरी दोनों में लिखने वाले साहित्यकार, नाटककार, रंगकर्मी, निर्देशक, अभिनेता और हिंदी के प्राध्यापक के रूप में उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। बिहार ने 1991 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित होते देखा और भारत सरकार के आधिकारिक पद्म पुरस्कार रिकॉर्ड में उनका सम्मान ‘साहित्य एवं शिक्षा’ के क्षेत्र में दर्ज है।

उनकी सबसे बड़ी लोकप्रिय पहचान जरूर ‘लोहा सिंह’ बनी। आलोचक गोपेश्वर सिंह के संस्मरण में इसे भोजपुरी का पहला ‘सोप ओपेरा’ तक कहा गया है और वे लिखते हैं कि नाटक की लोकप्रियता ऐसी थी कि उसके लेखक को उनके असली नाम से कम और ‘लोहा सिंह’ नाम से अधिक जाना जाने लगा।

सेमरा की मिट्टी से निकला साहित्य का यह पुरोधा

रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ का जन्म 16 अगस्त 1927 को रोहतास जिले के सेमरा गांव में हुआ था—यह तारीख कई उपलब्ध संदर्भों में मिलती है। हालांकि कुछ स्रोत जन्म-वर्ष 1929 भी दर्ज करते हैं। इसलिए उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर यहां 1927 को प्राथमिकता दी जा रही है।

उनके पिता रायबहादुर जानकी सिंह थे और माता का नाम रामसखी देवी बताया जाता है। उनका आरंभिक जीवन बिहार के अलग-अलग हिस्सों से जुड़ा रहा। नवगछिया, मुंगेर में शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने मुंगेर टाउन स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद पटना विश्वविद्यालय से 1948 में बीए और 1950 में एमए किया।

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शिक्षा पूरी करने के बाद वे बी.एन. कॉलेज, पटना में हिंदी के प्राध्यापक बने। बी.एन. कॉलेज की अपनी आधिकारिक वेबसाइट भी उन्हें कॉलेज के प्रमुख शिक्षकों में गिनाती है और उन्हें ‘लोहा सिंह’ के रचनाकार के रूप में याद करती है।

कलम से शुरू हुआ सफर, रेडियो तक पहुंचा

काश्यप की साहित्यिक सक्रियता कम उम्र में ही शुरू हो गई थी। उपलब्ध साहित्यिक संदर्भों के अनुसार उनकी रचनाएं हिंदी और भोजपुरी दोनों में प्रकाशित हुईं। हिंदी में लेखन के साथ-साथ वे भोजपुरी कहानी, नाटक और अन्य विधाओं में भी सक्रिय रहे। उनकी भोजपुरी कहानी ‘मछरी’ के 1960 के दशक में ‘अंजोर’ पत्रिका में प्रकाशित होने का उल्लेख मिलता है। लेकिन जिस रचना ने उन्हें जन-जन तक पहुंचाया, वह थी ‘लोहा सिंह’

यह केवल एक नाटक नहीं था, बल्कि रेडियो पर चलने वाली ऐसी लोकप्रिय श्रृंखला थी, जिसने भोजपुरी समाज के सुनने और मनोरंजन करने के तौर-तरीके को ही बदल दिया। उस समय रेडियो घरों का सबसे प्रभावशाली जनसंचार माध्यम था। ऐसे दौर में भोजपुरी के पात्रों, बोली और ग्रामीण जीवन को लेकर तैयार किया गया यह नाटक बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचा।

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‘लोहा सिंह’ बना लेखक का दूसरा नाम

‘लोहा सिंह’ की सबसे असाधारण बात यही थी कि इसके पात्र और लेखक के बीच की दूरी धीरे-धीरे मिट गई। गोपेश्वर सिंह के संस्मरण के अनुसार, जब रेडियो पर इस नाटक का प्रसारण शुरू हुआ तो लोगों में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। नियमित प्रसारण के बाद काश्यप की पहचान उनके वास्तविक नाम से अधिक ‘लोहा सिंह’ के रूप में होने लगी।

रामेश्वर सिंह काश्यप स्वयं इस पात्र की भूमिका निभाते थे। एक संस्मरणात्मक लेख में उनके बारे में बताया गया है कि ‘तसलवा तोर कि मोर’ नामक भोजपुरी रेडियो रूपक में ‘लोहा सिंह’ पात्र था और काश्यप ने ही उसकी भूमिका निभाई। श्रोताओं की मांग और पात्र की लोकप्रियता ने बाद में ‘लोहा सिंह’ को अलग पहचान दिलाई।

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लोहा सिंह का चरित्र एक पूर्व सैनिक के रूप में सामने आता था और उसके संवादों में भोजपुरी के साथ हिंदी-अंग्रेजी के मिश्रित प्रयोग से हास्य और विशिष्ट व्यक्तित्व पैदा होता था। यही अंदाज श्रोताओं के बीच उसकी पहचान बन गया।

एक पात्र की बोली बन गई लोकस्मृति

‘लोहा सिंह’ के संवादों में देसी हास्य, सैनिक जीवन की छाप और ग्रामीण समाज की भाषा का अनूठा मेल था। ‘खदेरन की मदर’ और ‘फाटक बाबा’ जैसे पात्रों और संवादों का उल्लेख आज भी पुराने श्रोताओं की स्मृतियों में मिलता है। संस्मरणों में ‘लोहा सिंह’ की बोलने की शैली को विशेष रूप से याद किया गया है।

इस लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि काश्यप ने भोजपुरी को किसी कृत्रिम साहित्यिक भाषा की तरह नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन की जीवंत भाषा के रूप में इस्तेमाल किया। पात्र बोलते थे तो लगता था जैसे गांव, चौपाल और आसपास का समाज रेडियो के भीतर जीवित हो उठा हो।

भोजपुरी रंगमंच से गहरा रिश्ता

काश्यप केवल रेडियो लेखक नहीं थे। वे रंगमंच से भी गहराई से जुड़े थे। उन्होंने नाटक लिखे, उनका निर्देशन किया और अभिनय भी किया। उपलब्ध संदर्भों में उनके प्रमुख कार्यों में ‘लोहा सिंह’, ‘तसलवा तोर कि मोर’, ‘मछरी’, ‘भौजी से भेंट’ और ‘नीलकंठ निराला’ जैसे नाम मिलते हैं।

वे इप्टा (भारतीय जननाट्य संघ) से भी जुड़े रहे। रंगमंच की यह सक्रियता बताती है कि उनके लिए नाटक केवल लिखने की विधा नहीं था; वह उसे मंच, अभिनय और दर्शक—तीनों स्तरों पर समझते थे।

उनके रंगकर्म की पहचान को 1987 में मिला पाटलिपुत्र नाट्य सम्मान भी प्रमाणित करता है। पाटलिपुत्र नाट्य महोत्सव की आधिकारिक सूची में 1987 के सम्मानित रंगकर्मियों में ‘श्री रामेश्वर सिंह काश्यप उर्फ लोहा सिंह, आरा’ का नाम दर्ज है।

‘लोहा सिंह’ सिर्फ रेडियो तक सीमित नहीं रहा

काश्यप की रचना ‘लोहा सिंह’ रेडियो की सीमाओं से बाहर भी गई। इसी नाम से 1966 में भोजपुरी फिल्म बनी, जिसका निर्देशन कुंदन कुमार ने किया था। फिल्म में सुजीत कुमार, विजय चौधरी और स्वयं रामेश्वर सिंह काश्यप सहित कई कलाकार थे। यह फिल्म उनके इसी चर्चित नाटक पर आधारित थी।

इस फिल्म ने ‘लोहा सिंह’ को एक नए माध्यम में पहुंचाया। यानी जिस पात्र ने पहले आवाज के जरिए श्रोताओं की कल्पना में जगह बनाई थी, वह बाद में पर्दे पर भी दिखाई दिया।

रेडियो ने भोजपुरी को दिया नया जनमंच

‘लोहा सिंह’ की सफलता को केवल एक लोकप्रिय कार्यक्रम की सफलता मानना उसके महत्व को छोटा करना होगा। उस दौर में रेडियो व्यापक जनसंचार का प्रमुख माध्यम था। गोपेश्वर सिंह के संस्मरण में भी इस बात पर जोर है कि रेडियो के जरिए ‘लोहा सिंह’ की पहुंच पारंपरिक नाच-नौटंकी की तुलना में कहीं व्यापक हुई।

यही वह दौर था जब भोजपुरी ने रेडियो पर अपनी अलग आवाज बनाई। काश्यप की भाषा में हास्य था, लेकिन वह केवल हंसाने के लिए नहीं था। उनके पात्रों के माध्यम से ग्रामीण समाज, सामाजिक व्यवहार और तत्कालीन जीवन की विसंगतियां भी सामने आती थीं।

शिक्षक और साहित्यकार भी उतने ही महत्वपूर्ण

‘लोहा सिंह’ की लोकप्रियता के कारण काश्यप के साहित्यिक व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष अक्सर पीछे छूट जाता है। जबकि वे उच्च शिक्षा प्राप्त हिंदी प्राध्यापक थे और लंबे समय तक अध्यापन से जुड़े रहे। बी.एन. कॉलेज, पटना की आधिकारिक विरासत सूची में उनका नाम उन शिक्षकों के साथ दर्ज है जिन्होंने कॉलेज की शैक्षिक और साहित्यिक प्रतिष्ठा को मजबूत किया।

यही द्वैत उनके व्यक्तित्व की खासियत था—एक तरफ विश्वविद्यालय का हिंदी प्राध्यापक और साहित्यकार, दूसरी तरफ रेडियो पर भोजपुरी का बेहद लोकप्रिय पात्र।

1991 में मिला पद्मश्री

रामेश्वर सिंह काश्यप की साहित्यिक और शैक्षिक उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान तब मिला, जब 1991 में उन्हें पद्मश्री प्रदान किया गया। भारत सरकार के पद्म पुरस्कारों के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका नाम Padma Shri (1991), Literature and Education, Bihar के रूप में दर्ज है।

यह सम्मान उनके लिए ही नहीं, बल्कि भोजपुरी साहित्य और रंगमंच के लिए भी महत्वपूर्ण था। ‘लोहा सिंह’ के जरिए जिस लोकभाषा की आवाज लाखों श्रोताओं तक पहुंची थी, उसी रचनाकार को राष्ट्रीय नागरिक सम्मान मिलना भोजपुरी की रचनात्मक क्षमता की बड़ी स्वीकृति थी।

लोकप्रियता के पीछे छिपा रहा एक बड़ा साहित्यकार

रामेश्वर सिंह काश्यप की एक बड़ी विडंबना यही रही कि ‘लोहा सिंह’ की लोकप्रियता इतनी विराट थी कि उनके साहित्यकार वाले व्यक्तित्व पर उसकी छाया पड़ गई। गोपेश्वर सिंह ने भी अपने संस्मरण में इस तथ्य को रेखांकित किया है कि काश्यप की पहचान उनके असली नाम से अधिक ‘लोहा सिंह’ के नाम से होने लगी थी।

लेकिन साहित्य के इतिहास में किसी रचनाकार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि भी क्या होगी कि उसका पात्र उसकी अपनी पहचान बन जाए?

काश्यप ने भोजपुरी को केवल लिखा नहीं, उसे आवाज दी। उन्होंने पात्रों को जीवन दिया, संवादों को लोकस्मृति का हिस्सा बनाया और रेडियो जैसे आधुनिक माध्यम में भोजपुरी की ताकत साबित की।

भोजपुरी के लिए उनकी विरासत

रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ की विरासत को केवल ‘लोहा सिंह’ तक सीमित करना उनके साथ न्याय नहीं होगा। वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसने हिंदी की अकादमिक दुनिया और भोजपुरी के लोकजीवन के बीच एक पुल बनाया।

उनकी रचनात्मक यात्रा यह बताती है कि मातृभाषा को बड़े मंच तक पहुंचाने के लिए केवल भाषा प्रेम पर्याप्त नहीं है। उसके लिए साहित्यिक दृष्टि, माध्यम की समझ, अभिनय की क्षमता और समाज की नब्ज पहचानने वाली संवेदना भी चाहिए।

आज भोजपुरी डिजिटल युग में नई पहचान बना रही है। सोशल मीडिया, ओटीटी, पॉडकास्ट और डिजिटल पत्रकारिता ने भोजपुरी को अभिव्यक्ति के नए मंच दिए हैं। ऐसे समय में काश्यप की यात्रा यह याद दिलाती है कि माध्यम बदलते हैं, लेकिन भाषा की ताकत उसकी अपनी जमीन और जीवन से आती है।

16 अगस्त को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना इसलिए भी जरूरी है कि भोजपुरी के इतिहास को केवल आज की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उन पुरोधाओं की साधना से समझा जाए जिन्होंने दशकों पहले इस भाषा को आधुनिक जनसंचार के मंच पर प्रतिष्ठित किया था।

रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’-एक ऐसा नाम, जिसे उनके रचे पात्र ने अमर कर दिया। ‘लोहा सिंह’ आज भी याद किया जाता है, तो उसके पीछे उस साहित्यकार की कलम, उस अभिनेता की आवाज और उस रंगकर्मी की साधना है।

Bhojpuri24.com की ओर से रामेश्वर सिंह ‘काश्यप’ को जयंती पर विनम्र नमन।

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