Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला में आज पढ़िए उस साहित्य साधक की कहानी, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति की सेवा में समर्पित कर दिया। अविनाश चंद्र विद्यार्थी केवल कवि नहीं थे, बल्कि भोजपुरी के संवेदनशील रचनाकार, गजलकार, निबंधकार, संपादक, शोधकर्ता और सांस्कृतिक प्रहरी थे। उन्होंने भोजपुरी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के साथ-साथ लोकनाट्य सम्राट भिखारी ठाकुर जैसी अमूल्य साहित्यिक विरासत को सहेजने का ऐतिहासिक कार्य किया।
आज जब भोजपुरी भाषा के समर्पित साहित्यकारों का स्मरण होता है, तो अविनाश चंद्र विद्यार्थी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने कभी प्रसिद्धि को लक्ष्य नहीं बनाया, बल्कि अपनी पूरी ऊर्जा भोजपुरी भाषा और उसकी सांस्कृतिक अस्मिता को मजबूत करने में लगा दी। यदि भिखारी ठाकुर भोजपुरी लोकनाट्य के शिखर पुरुष हैं और महेंद्र मिसिर लोकसंगीत के सम्राट, तो अविनाश चंद्र विद्यार्थी भोजपुरी साहित्य की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जिसने भाषा की जड़ों को सींचने और उसकी विरासत को सुरक्षित रखने का कार्य किया।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
अविनाश चंद्र विद्यार्थी का जन्म 14 जनवरी 1926 को बिहार के तत्कालीन शाहाबाद (अब भोजपुर) जिले के शाहपुर गांव में बाबू बबन लाल (नारायण प्रसाद) और धीरजा देवी के परिवार में हुआ। जन्म के कुछ समय बाद ही उनकी माता का निधन हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी बुआ बिरिज कुमारी देवी ने किया। विद्यार्थी जी उन्हें अपनी मां के समान सम्मान देते थे और बाद में अपना प्रसिद्ध महाकाव्य ‘सेवकायन’ भी उन्हें समर्पित किया।
गांव के वातावरण, लोकगीतों, लोककथाओं और भोजपुरी संस्कृति ने बचपन से ही उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में भोजपुरी समाज, गांव, लोकजीवन, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण मिलता है।
शिक्षा, अध्यापन और साहित्य साधना
विद्यार्थी जी ने शाहपुर हाई स्कूल से मैट्रिक और जैन कॉलेज, आरा से इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने शाहपुर हाई स्कूल में लगभग छह वर्षों तक अध्यापन किया। बाद में उनकी नियुक्ति बिहार सरकार के पटना सचिवालय में हुई, जहां से वे सिंचाई विभाग में उपसचिव-सह-बजट अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अध्ययन नहीं छोड़ा और भूगोल में स्नातक तथा हिन्दी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।
भोजपुरी आंदोलन और ‘अँजोर’ से जुड़ाव
वर्ष 1959 में पांडेय नर्मदेश्वर सहाय के संपर्क में आने के बाद विद्यार्थी जी भोजपुरी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अँजोर’ के सहायक संपादक बने। यहीं से भोजपुरी भाषा और साहित्य के लिए उनका आजीवन समर्पण और अधिक सशक्त हुआ। बाद में वे भोजपुरी परिवार संस्था तथा भोजपुरी अकादमी, बिहार से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे और संगठनात्मक स्तर पर भोजपुरी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गीत, गजल, कविता और महाकाव्य के सशक्त रचनाकार
इसके बाद विद्यार्थी जी ने वर्ष 1994-95 तक भोजपुरी भाषा और साहित्य की निरंतर सेवा की। इसका सबसे बड़ा प्रमाण उनकी डेढ़ दर्जन से अधिक प्रकाशित साहित्यिक कृतियां हैं। इनमें ‘जय बंगला’ (लघु काव्य), ‘सुदिन’ (प्रगतिशील गीत संग्रह), ‘पंखुरी भइल हजार’ (बरवै संग्रह), ‘लीला ई श्रीराम-श्याम के’ (गीत रूपक), ‘भोजपुरी भूँई’ (कविता संग्रह), ‘अनसाइल राग’ (कविता संग्रह), ‘पतिआत ना केहू’ (गजल संग्रह), ‘गाँव बारहो मास में’ (गीत संग्रह), ‘कौशिकायन’ (प्रबंध काव्य), ‘सेवकायन’ (प्रबंध काव्य), ‘बेटा के नइहर’ (ललित निबंध), ‘घर के गूर’ (निबंध संग्रह), ‘डागा बाज गइल’ (कहानी संग्रह) और ‘गइल घर’ (उपन्यास) जैसी महत्वपूर्ण कृतियां शामिल हैं। इन रचनाओं के माध्यम से उन्होंने भोजपुरी साहित्य की लगभग हर प्रमुख विधा को समृद्ध किया और भाषा की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाई प्रदान की।
भोजपुरी गजल को नई ऊंचाई
विद्यार्थी जी भोजपुरी के महत्वपूर्ण गजलकारों में भी गिने जाते हैं। उनका चर्चित गजल संग्रह ‘पतिआत ना केहू’ भोजपुरी गजल साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में माना जाता है। उनकी गजलों में लोकजीवन की सहजता, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

वे स्वयं लिखा करते थे—
‘गज़ल में आग बा, हमरा गज़ल में पानी बा,
धुंआत आंच के हमरा लगे कहानी बा।’
विद्यार्थी जी ने अपने गीतों, गजलों और कविताओं में तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक विद्रूपताओं तथा विसंगतियों पर भी तीखा प्रहार किया है। उनके एक गीत की यह पंक्तियां इसका सशक्त उदाहरण हैं-
‘ हमरा आम के बगइचवा में उगि रहल बबूर।
किन के कलम मँगवलीं, पाँति नापी के लगवलीं,
राते दिन अगोरीं केतने, सांढ़ भइंसवा भगवलीं,
देवता डारी देले डेरा, डाढ़ पर चढ़ल लंगूर।।‘
‘सेवकायन’ और ‘कौशिकायन’ से मिली नई पहचान
भोजपुरी महाकाव्य परंपरा में ‘सेवकायन’ और ‘कौशिकायन’ का विशेष स्थान है। इन प्रबंध काव्यों में विद्यार्थी जी ने पौराणिक चरित्रों के माध्यम से सेवा, समर्पण, भक्ति, नैतिकता और लोकमूल्यों की स्थापना का संदेश दिया। भोजपुरी के खांटी शब्दों, लोकोक्तियों और मुहावरों से सजी ये कृतियां आज भी शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

भिखारी ठाकुर की विरासत के सबसे बड़े संरक्षकों में एक
अविनाश चंद्र विद्यार्थी का नाम भिखारी ठाकुर की साहित्यिक विरासत के संरक्षण के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। बचपन से ही वे भिखारी ठाकुर के नाटक देखने जाते थे और बाद में उनके निकट संपर्क में आए। उन्होंने ‘भिखारी ठाकुर ग्रंथावली’ के दो खंडों के संपादन और संकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कार्य भोजपुरी रंगमंच और लोकसाहित्य के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है।
भोजपुरी निबंध को दी नई ऊंचाई
भोजपुरी गद्य साहित्य में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका निबंध संग्रह ‘घर के गूर’ और चर्चित निबंध ‘बेटा के नइहर’ भोजपुरी निबंध साहित्य की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं। उनकी भाषा में गांव की मिट्टी की महक, लोकजीवन की आत्मीयता और चिंतन की गहराई स्पष्ट दिखाई देती है। वे मानते थे कि भोजपुरी केवल भाषा नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान है।
भोजपुरी साहित्य के अमूल्य प्रहरी
19 जनवरी 2016 को अविनाश चंद्र विद्यार्थी का निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी भोजपुरी साहित्य और संस्कृति के मार्गदर्शक दस्तावेज हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भाषा का विकास केवल आंदोलनों से नहीं, बल्कि उन निस्वार्थ साहित्य साधकों के श्रम से होता है, जो अपना पूरा जीवन मातृभाषा की सेवा में समर्पित कर देते हैं।
क्यों हैं भोजपुरी पुरोधा?
अविनाश चंद्र विद्यार्थी को ‘भोजपुरी पुरोधा’ इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने कविता, गजल, महाकाव्य, निबंध, कहानी और संपादन जैसी अनेक विधाओं में भोजपुरी साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने भिखारी ठाकुर की साहित्यिक विरासत को संरक्षित किया, भोजपुरी गद्य और गजल को नई दिशा दी तथा भोजपुरी भाषा, लोकसंस्कृति और साहित्य को संस्थागत रूप से मजबूत बनाने में ऐतिहासिक योगदान दिया।
वे उन विरले साहित्य साधकों में हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी भोजपुरी भाषा की सेवा को समर्पित कर दिया। भोजपुरी साहित्य का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, अविनाश चंद्र विद्यार्थी का नाम भाषा की सांस्कृतिक विरासत के सबसे सशक्त संरक्षकों में हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा।


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