खेतों से साहित्यिक मंच तक, भोजपुरी के लिए समर्पित एक नाम अश्विनी द्विवेदी ‘नमन’

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भोजपुरी भाषा आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों की बोली है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी खड़ी हैं। एक ओर जहां भोजपुरी सिनेमा और संगीत ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई है, वहीं दूसरी ओर अश्लीलता और साहित्यिक उपेक्षा ने इसकी छवि को नुकसान पहुंचाया है। ऐसे समय में कुछ लोग पूरी निष्ठा के साथ भोजपुरी की अस्मिता, साहित्य और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा में जुटे हैं। कुशीनगर के साहित्यकार अश्विनी द्विवेदी ‘नमन’ उन्हीं समर्पित व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने खेती-किसानी के साथ-साथ भोजपुरी भाषा और साहित्य को अपना जीवन समर्पित कर दिया है।

मिट्टी से जुड़ा साहित्यकार

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद के नरकटिया बाजार निवासी अश्विनी द्विवेदी ‘नमन’ का जन्म 15 अक्टूबर 1983 को हुआ। इतिहास विषय में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त करने वाले नमन जी का मुख्य पेशा कृषि है। हालांकि उनकी वास्तविक पहचान एक संवेदनशील साहित्यकार और भोजपुरी भाषा के समर्पित प्रहरी के रूप में बनी है। गांव के परिवेश में रहते हुए उन्होंने लोकजीवन की भावनाओं, संघर्षों और सांस्कृतिक मूल्यों को बहुत करीब से देखा और उन्हें अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया।

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 साहित्य साधना और रचनात्मक यात्रा

हिंदी और भोजपुरी कविता लेखन में विशेष रुचि रखने वाले अश्विनी द्विवेदी ‘नमन’ की प्रकाशित कृति ‘घमछँइयाँ’ भोजपुरी गीत संग्रह है। उनकी रचनाओं में गांव की सादगी, लोकसंस्कृति की मिठास और समाज की वास्तविकताओं का जीवंत चित्रण मिलता है। उनकी कविताएं और गीत केवल मनोरंजन नहीं करते, बल्कि समाज को सोचने और अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश भी देते हैं।

उनकी साहित्यिक प्रतिभा का सम्मान आकाशवाणी, दूरदर्शन और विभिन्न साहित्यिक मंचों पर काव्य पाठ के रूप में हुआ है। इसके अलावा अनेक साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है। यह उपलब्धियां उनकी सतत साहित्यिक साधना और सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं।

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अश्लीलता के विरुद्ध भोजपुरी की स्वच्छ पहचान की लड़ाई

अश्विनी द्विवेदी ‘नमन’ की सबसे बड़ी पहचान भोजपुरी को अश्लीलता से मुक्त कराने के अभियान से जुड़ी है। उनका मानना है कि भोजपुरी भाषा की आत्मा उसके लोकगीतों, संस्कारों और सामाजिक मूल्यों में बसती है, न कि फूहड़ता और अश्लीलता में। वे लगातार मंचों और लेखन के माध्यम से इस बात को उठाते रहे हैं कि भोजपुरी की पहचान उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से होनी चाहिए।

नमन जी का कहना है कि भोजपुरी समाज को स्वयं आगे आकर भाषा की गरिमा बचाने की जिम्मेदारी निभानी होगी। यदि साहित्य, संगीत और मनोरंजन के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण रचनाओं को बढ़ावा मिले तो भोजपुरी की छवि स्वतः मजबूत होगी।

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आठवीं अनुसूची और साहित्यकारों की चिंता

भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से उठती रही है। अश्विनी द्विवेदी ‘नमन’ भी इस मुद्दे को लेकर गंभीर चिंतित हैं। उनका मानना है कि करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए। इससे भाषा के संरक्षण, अध्ययन और विकास के नए रास्ते खुलेंगे।

वे भोजपुरी साहित्यकारों की स्थिति को लेकर भी चिंता व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार भोजपुरी लेखकों और कवियों के लिए कोई ठोस कल्याणकारी योजना नहीं है। प्रकाशन की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण अनेक प्रतिभाएं सामने नहीं आ पातीं। सरकार और सामाजिक संस्थाओं को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है।

परिवार में भी जीवित है भोजपुरी संस्कृति

अश्विनी द्विवेदी ‘नमन’ केवल मंचों पर भोजपुरी की बात नहीं करते, बल्कि अपने पारिवारिक जीवन में भी इसे पूरी तरह अपनाते हैं। वे भोजपुरी खान-पान, लोक परंपराओं और पारिवारिक संवाद को विशेष महत्व देते हैं। उनका मानना है कि भाषा का वास्तविक संरक्षण घर से शुरू होता है। यदि नई पीढ़ी अपने परिवार में भोजपुरी बोलेगी और अपनी लोकसंस्कृति को समझेगी, तभी भाषा का भविष्य सुरक्षित रहेगा।

अपने आदर्श साहित्यकार चंदेश्वर ‘परवाना’ जी से प्रेरणा लेने वाले नमन जी आज भोजपुरी साहित्य की उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो भाषा को सम्मान, साहित्य को पहचान और समाज को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास कर रही है। भोजपुरी समाज को ऐसे साहित्यकारों पर गर्व है, जो बिना किसी स्वार्थ के अपनी मातृभाषा की सेवा में निरंतर लगे हुए हैं।

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