भोजपुरी भाषा और भारतीय संस्कृति के संवाहकों की जब भी चर्चा होगी, डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’ का नाम आदर से लिया जाएगा। साहित्य, संस्कृति, लोकभाषा और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान उन्हें केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के वाहक के रूप में स्थापित करता है। भोजपुरी की मिठास, हिंदी की संवेदना और भारतीय संस्कृति की आत्मा उनके लेखन में सहज रूप से दिखाई देती है। अपने गीतों, कविताओं, निबंधों और आलेखों के माध्यम से उन्होंने लोकजीवन को शब्दों में जीवंत करने का सफल प्रयास किया है।
गांव की मिट्टी से निकला साहित्य का ‘भ्रमर’
डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’ का जन्म उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले (पूर्व में गोरखपुर) के हरखा प्यास गांव में हुआ। पिता स्वर्गीय राम नरेश पाण्डेय और माता स्वर्गीय सावित्री देवी के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े डॉ. पाण्डेय ने गांव की संस्कृति, लोकगीत, प्रकृति और सामाजिक संबंधों को बहुत करीब से देखा। यही कारण है कि उनके साहित्य में गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू आज भी महसूस होती है।
शिक्षा और अध्यापन से समाज निर्माण तक
वर्तमान में डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’ श्रीनाथ संस्कृत महाविद्यालय, हाटा, कुशीनगर में आधुनिक विषय हिंदी के प्राध्यापक हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि वे विद्यार्थियों में भाषा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता भी विकसित करते हैं। अध्यापन के साथ-साथ साहित्य सृजन की निरंतर साधना उन्हें एक अलग पहचान देती है।
साहित्य सृजन की बहुआयामी यात्रा
डॉ. पाण्डेय की साहित्यिक यात्रा अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण रही है। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘प्रतीक्षा’ काव्य संग्रह, ‘ज़िन्दगी के गीत’ भोजपुरी गीत संग्रह, ‘मेघसुलोचनीयम्’ खंड काव्य, ‘वंदे मातरम्’ गीत संग्रह, ‘कठघोड़वा’ निबंध संग्रह, ‘भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म’, ‘ढाई अक्षर प्रेम का’ तथा ‘महुआ’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं।

उनकी रचनाओं में प्रेम, प्रकृति, पर्यावरण, संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और लोकजीवन की संवेदनाएं प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं। उनका प्रकाशनाधीन भोजपुरी गीत संग्रह ‘हमार गांव’ भी ग्रामीण जीवन की आत्मा को अभिव्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण कार्य माना जा रहा है।
आकाशवाणी से लेकर दूरदर्शन तक गूंजती आवाज
डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’ की साहित्यिक प्रतिभा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके काव्य पाठ ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। वर्ष 1986 में आकाशवाणी गोरखपुर से उनकी भोजपुरी कहानी ‘सफलता के कहानी’ का प्रसारण हुआ था। यद्यपि उसका रिकॉर्ड आज उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह प्रसारण उनके साहित्यिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। उनकी आवाज और अभिव्यक्ति में लोकजीवन की आत्मीयता झलकती है।
भोजपुरी आंदोलन के सजग प्रहरी
भोजपुरी भाषा के विकास और सम्मान के लिए डॉ. पाण्डेय निरंतर सक्रिय रहे हैं। उन्होंने अपने गीतों, कविताओं और आलेखों के माध्यम से भोजपुरी भाषा को नई ऊर्जा देने का कार्य किया। वे विश्व भोजपुरी सम्मेलन से जुड़े रहे हैं और भोजपुरी को साहित्यिक प्रतिष्ठा दिलाने के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी रचनाएं भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने का कार्य करती हैं।

सम्मान और उपलब्धियों से सजी साहित्यिक यात्रा
डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’ को साहित्य और भोजपुरी सेवा के लिए अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। भोजपुरी के लिए उन्हें लोक मंजरी सम्मान प्राप्त हुआ। इसके अलावा नागरी प्रचारिणी सभा, देवरिया ने उन्हें नागरी श्री सम्मान से अलंकृत किया। निराला काव्य मंच, विमर्श काव्य मंच, संदेश सहित विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं ने भी उनके योगदान को सम्मान दिया। इंदिरा नगर, हाटा, कुशीनगर में निवास करते हुए वे साहित्य साधना, अध्यापन और सांस्कृतिक जागरण के कार्यों में सक्रिय हैं। डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’ उन साहित्यकारों में हैं जिन्होंने शब्दों को समाज और संस्कृति से जोड़ा तथा भोजपुरी और हिंदी साहित्य को नई दिशा देने का सतत प्रयास किया।


भोजपुरी क्षेत्र और माटी में पले बढ़े डॉ मोहन की विभिन्न रचनाओं में गावँ की मीठी सुगन्ध वास्तविक जीवन का बोध कराती रहती है l
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