भोजपुरी जगत में मनोज भावुक एक ऐसा नाम है, जिसने साहित्य, सिनेमा, पत्रकारिता और सांस्कृतिक विमर्श- सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है। वे सिर्फ कवि या गीतकार नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता के सजग प्रहरी हैं।
उनकी छवि भोजपुरी के एक गंभीर विद्वान, शालीन ग़ज़लकार, फिल्म इतिहासकार और साफ-सुथरी सांस्कृतिक चेतना के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित है। उन्हें भोजपुरी सिनेमा का “इनसाइक्लोपीडिया” कहा जाता है। वे उन विरले रचनाकारों में हैं जिन्होंने लोकप्रियता और बौद्धिकता के बीच अद्भुत संतुलन बनाए रखा।
हाल ही में पटना के ऐतिहासिक बापू सभागार में आयोजित समारोह में उन्हें ‘भोजपुरी भाषा शिखर सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

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बिहार के सिवान जिले के कौसड़ गाँव से निकलकर अफ्रीका और लंदन तक की यात्रा करने वाले मनोज भावुक अंततः अपनी मिट्टी और मातृभाषा की सेवा के लिए लौट आए। वे कहते हैं- ‘मैंने करियर नहीं चुना, मैंने अपनी जड़ों को चुना।’
मनोज भावुक के बारे में देश की प्रसिद्ध लोकगायिका और पद्मश्री सम्मानित मालिनी अवस्थी भी कहती हैं कि भोजपुरी को लेकर बहुत कम लोग गंभीरता से काम कर रहे हैं, और उनमें मनोज भावुक प्रमुख हैं।
वहीं, उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और भोजपुरी विद्वान अजय त्रिपाठी का कहना है कि ‘मनोज भावुक भोजपुरी को जीते हैं।’ उन्होंने स्वयं को पूरी तरह भोजपुरी भाषा और संस्कृति के लिए समर्पित कर दिया है।
प्रस्तुत है भोजपुरी 24 की टीम से उनसे हुई विस्तृत बातचीत के संपादित अंश-
प्रश्न: आपकी अब तक की यात्रा को आप किस रूप में देखते हैं?
मनोज भावुक: मेरी यात्रा किसी एक उपलब्धि की कहानी नहीं है। यह निरंतर संघर्ष, सीख और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता की यात्रा है।
मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, विदेशों में नौकरी भी की – अफ्रीका और लंदन में रहा, लेकिन अंततः मुझे लगा कि मेरी असली पहचान मेरी भाषा और संस्कृति में ही है।
जब लोग भोजपुरी बोलने में संकोच करते थे, तब मैंने भोजपुरी को ही अपनी पहचान बनाया। सच कहूँ तो मैं भोजपुरी को सिर्फ बोलता नहीं, जीता हूँ। मैं भोजपुरी ही ओढ़ता-बिछाता हूँ।
मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि पुरस्कार नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास है। जब लोग मुझे भोजपुरी का सांस्कृतिक कर्मयोगी कहते हैं, तब लगता है कि मेरी मेहनत सफल हुई।
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प्रश्न: भोजपुरी भाषा के प्रति आपका यह समर्पण कहाँ से आया?
मनोज भावुक: भोजपुरी मेरे लिए केवल भाषा नहीं, भावनात्मक विरासत है। यह मेरे गाँव, मेरी मिट्टी, मेरे संस्कार और मेरी स्मृतियों की भाषा है।
मुझे हमेशा यह पीड़ा रही कि लोग अपनी मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं। इसी भावना से मैंने एक कविता लिखी थी ‘भोजपुरी के दुर्भाग्य’। यह कविता मैंने 2005 में युगांडा प्रवास के दौरान लिखी थी। उसमें एक पंक्ति है-
‘लोग त दिल्ली जाते भोजपुरी भुला जाला…’
यह केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता का आईना है। विदेशों में बसे लोग भोजपुरी को गर्व से जीते हैं, लेकिन अपने ही देश में लोग उसे छिपाने लगते हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए।
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प्रश्न: आपकी साहित्यिक कृतियों और संपादकीय कार्यों के बारे में बताइए।
मनोज भावुक: मैंने हमेशा कोशिश की कि मेरी लेखनी समाज और समय का दस्तावेज बने। मेरी रचनाएँ केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद हैं।
मेरी प्रमुख पुस्तकों में “तस्वीर जिंदगी के” (भोजपुरी ग़ज़ल-संग्रह), ‘चलनी में पानी’ (दोहा और गीत-संग्रह) और ‘भोजपुरी सिनेमा के संसार’ शामिल हैं।
‘भोजपुरी सिनेमा के संसार’ मेरे लिए सिर्फ किताब नहीं, बल्कि वर्षों के शोध और समर्पण का परिणाम है। इसमें भोजपुरी सिनेमा के 90 वर्षों की यात्रा, 250 से अधिक फिल्मों का विवरण और कई दिग्गज कलाकारों के साक्षात्कार शामिल हैं। इस पुस्तक के लिए मुझे ‘बेस्ट राइटर अवार्ड’ और ‘चौधरी कन्हैया सिंह पुरस्कार’ जैसे सम्मानों से भी नवाजा गया।
पिछले सात वर्षों से मैं ‘भोजपुरी जंक्शन’ पत्रिका का संपादन कर रहा हूँ। इसके माध्यम से भोजपुरी साहित्य, लोकसंस्कृति और समकालीन विमर्श को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास है। अब तक इसके डेढ़ सौ से अधिक अंक प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें तीन दर्जन से अधिक विशेषांक हैं, यथा – महात्मा गांधी विशेषांक ( 3 अंक ), वीर कुँवर सिंह विशेषांक, राजेन्द्र प्रसाद विशेषांक, कोरोना विशेषांक ( 5 अंक ), रूस-यूक्रेन युद्ध विशेषांक, गिरमिटिया विशेषांक, फगुआ विशेषांक, चैता विशेषांक, दियरी-बाती-छठ विशेषांक, दशहरा विशेषांक, सिनेमा विशेषांक, देशभक्ति विशेषांक, माई-बाबूजी विशेषांक (2 अंक), जन्म-मृत्यु विशेषांक (2 अंक), संस्मरण विशेषांक, समीक्षा विशेषांक ( 4 अंक, 100 किताब के समीक्षा ), भोजपुरी के गौरव विशेषांक, 101 दिवंगत भोजपुरी सेवी, खेती-बारी विशेषांक ( 4 अंक), राम विशेषांक ( 2 अंक ), कृष्ण विशेषांक ( 2 अंक ), गजल-विशेषांक, महिला कहानी-संग्रह ( 5 अंक, हर अंक में 25 महिला कथाकारों की कहानी ) व मातृभाषा विशेषांक ( 15 मातृभाषाओं की 41 कहानियाँ ) आदि शामिल हैं।
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प्रश्न: आपको भोजपुरी सिनेमा का ‘इनसाइक्लोपीडिया’ कहा जाता है। इसे कैसे देखते हैं?
मनोज भावुक: यह लोगों का प्रेम है। मैंने भोजपुरी सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन के रूप में नहीं देखा, बल्कि सांस्कृतिक इतिहास के रूप में समझने की कोशिश की।
हमारे यहाँ फिल्मों पर गंभीर शोध कम हुआ है। मैंने महसूस किया कि अगर भोजपुरी सिनेमा के इतिहास को व्यवस्थित रूप से दर्ज नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपनी विरासत से कट जाएँगी।
इसी सोच के साथ मैंने वर्षों तक शोध किया और भोजपुरी सिनेमा की यात्रा को दस्तावेज़ित किया।
प्रश्न: भोजपुरी सिनेमा की वर्तमान स्थिति पर आपका क्या कहना है?
मनोज भावुक: भोजपुरी सिनेमा में अपार संभावनाएँ हैं, लेकिन समस्या कंटेंट की नीयत में आ गई है। सस्ती लोकप्रियता ने स्थायी सम्मान को पीछे कर दिया है।
आज सोशल मीडिया और व्यूज़ की दुनिया में बहुत कुछ तुरंत वायरल हो जाता है, लेकिन हर वायरल चीज़ मूल्यवान नहीं होती।
सिनेमा समाज का आईना होता है और आईने को साफ रखना हमारी जिम्मेदारी है। अगर हम सिर्फ वायरल होने के लिए काम करेंगे, तो समाज हमें गंभीरता से नहीं लेगा।
भोजपुरी सिनेमा को फिर से संवेदनशील कहानी, पारिवारिक मूल्यों और सांस्कृतिक गरिमा की ओर लौटना होगा।
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प्रश्न: आपने हमेशा साफ-सुथरे गीत लिखे। यह निर्णय कितना कठिन था?
मनोज भावुक: बहुत कठिन था, क्योंकि बाज़ार हमेशा आसान रास्ता चुनने का दबाव बनाता है। लेकिन मैंने कभी व्यावसायिक लाभ के लिए द्विअर्थी या अश्लील गीत नहीं लिखे।
मेरा मानना है कि गीत केवल मनोरंजन नहीं, समाज की संवेदनाओं का आईना होते हैं। भोजपुरी की मिठास और गरिमा बनी रहनी चाहिए।
हाल के वर्षों में ‘आपन कहाये वाला के बा’ और ‘दुल्हिनिया नाच नचावे’ जैसी फिल्मों के गीतों को जो प्यार मिला, उससे यह भरोसा और मजबूत हुआ कि दर्शक आज भी साफ-सुथरे और भावपूर्ण गीत पसंद करते हैं। उनके गीतों के लिए मुझे ‘बेस्ट लिरिसिस्ट अवॉर्ड 2026’ से भी सम्मानित किया गया।
प्रश्न: भोजपुरी संगीत में आए बदलाव को आप कैसे देखते हैं?
मनोज भावुक: आज संगीत में व्यूज़ की होड़ बढ़ गई है। पहले गीत सुनने और महसूस करने के लिए बनते थे, अब स्क्रॉल करने के लिए बनाए जा रहे हैं।
हमने ‘व्यूज़’ की दौड़ में ‘वैल्यू’ खो दी है। लेकिन मुझे विश्वास है कि लोकसंगीत की आत्मा अभी भी जीवित है। अच्छे शब्द और सच्ची संवेदना कभी खत्म नहीं होती।
प्रश्न: विदेश यात्राओं ने आपकी सोच को किस तरह प्रभावित किया?
मनोज भावुक: विदेशों में जाकर मुझे भोजपुरी की असली ताकत समझ आई। 2014 में मॉरीशस सरकार के निमंत्रण पर गिरमिटिया मजदूरों की 180वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। वहाँ मुझे “अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी गौरव सम्मान” से सम्मानित किया गया।
2024 में अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी महोत्सव में भोजपुरी सिनेमा के इतिहास पर शोधपत्र प्रस्तुत करने का अवसर मिला। विदेशों में रहकर मैंने महसूस किया कि भोजपुरी सिर्फ गाँव की भाषा नहीं, बल्कि एक वैश्विक सांस्कृतिक शक्ति है।
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प्रश्न: फिल्मों और टेलीविजन में आपके अनुभव कैसे रहे?
मनोज भावुक: मैंने फिल्मों में अभिनय भी किया और लेखन भी। ‘सौगंध गंगा मैया के’ और ‘रखवाला’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया।
टेलीविजन में ‘सा रे गा मा पा भोजपुरी’ के प्रोजेक्ट हेड के रूप में काम करना यादगार अनुभव रहा। मैंने हमेशा कोशिश की कि भोजपुरी मंचों पर गुणवत्ता और गरिमा बनी रहे।
1999 में मैंने भोजपुरी टीवी सीरियल “तहरे से घर बसाएब” के लिए कथा, पटकथा और संवाद भी लिखे थे।
प्रश्न: आपको मिले सम्मानों और पुरस्कारों को आप किस नजर से देखते हैं?
मनोज भावुक: सम्मान प्रेरणा देते हैं, लेकिन मैं उन्हें मंज़िल नहीं मानता। वे सिर्फ यह भरोसा देते हैं कि आप सही दिशा में काम कर रहे हैं।
असल संतोष तब मिलता है जब आपकी रचना लोगों के दिलों तक पहुँचती है। प्रसिद्धि क्षणिक हो सकती है, लेकिन सम्मान स्थायी होता है।
हाल के वर्षों में मिले भोजपुरी भाषा शिखर सम्मान, भारतीय भाषा सम्मान, पाती अक्षर सम्मान और अन्य सम्मानों ने मेरी जिम्मेदारी और बढ़ा दी है।
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प्रश्न: ‘क्रिएटिव फ्रीडम’ पर आपकी राय क्या है?
मनोज भावुक: स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना नहीं है। एक रचनाकार समाज से कटकर नहीं रह सकता।
मैं मानता हूँ कि आत्म-सेंसर सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है। अगर हम खुद तय नहीं करेंगे कि क्या उचित है और क्या नहीं, तो समाज हमसे सवाल जरूर पूछेगा।
प्रश्न: आपकी व्यक्तिगत सोच और कार्य-दर्शन क्या है?
मनोज भावुक: मैं ट्रेंड के पीछे नहीं भागता। मैं ऐसी चीजें बनाना चाहता हूँ जो समय बीतने के बाद भी लोगों की स्मृतियों में बनी रहें।
नाम कमाना आसान हो सकता है, लेकिन सम्मान कमाना कठिन है। मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि लोग मुझे एक जिम्मेदार और सार्थक रचनाकार के रूप में याद रखें। मैं वायरल नहीं, यादगार बनना चाहता हूँ।
प्रश्न: युवाओं और नए क्रिएटर्स के लिए आपका संदेश?
मनोज भावुक: अपनी भाषा, अपनी मिट्टी और अपनी जड़ों पर गर्व कीजिए। सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। निरंतरता, ईमानदारी और धैर्य ही आपको अलग पहचान देते हैं। अगर आपकी जड़ें मजबूत होंगी, तो आपकी रचनात्मकता भी लंबे समय तक टिकेगी।
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प्रश्न: भोजपुरी के भविष्य को लेकर आपकी क्या उम्मीदें हैं?
मनोज भावुक: भोजपुरी को बचाने की जरूरत नहीं है, उसे उसका सम्मान लौटाने की जरूरत है। जिस दिन हम अपनी भाषा पर गर्व करना सीख जाएंगे, दुनिया खुद उसका सम्मान करेगी। भोजपुरी सिर्फ भाषा नहीं, एक समृद्ध सभ्यता है। उसकी ताकत उसकी लोकसंस्कृति, संवेदना और आत्मीयता में है।
आज दुनिया भर में भोजपुरी को लेकर नई चर्चा हो रही है। युवा पीढ़ी भी अपनी लोकभाषा और लोकसंगीत की ओर लौट रही है। यह एक सकारात्मक संकेत है।
मुझे भरोसा है कि आने वाला समय भोजपुरी का होगा- लेकिन शर्त यह है कि हम उसे सस्ती लोकप्रियता नहीं, सांस्कृतिक गरिमा के साथ आगे बढ़ाएँ।








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