तैयब हुसैन ‘पीड़ित ‘ जी के पहिलकी पुण्य तिथि (11/5/2026) पर विशेष प्रस्तुति
डॉ. सुनील कुमार पाठक
तैयब जी के एगो गीत के पंक्ति आजो हमरा मन-माथा में रहि-रहि के कौंध उठेला-
“ ए नजरिया के का हो गईल! ”
देश, समय आ समाज में आ रहल बदलाव से ताल-मेल बिठावे में मनुष्य के संवेदनशीलता के हो रहल परख आ ओकरा सोच के तौर-तरीका में आ रहल बदलाव के झलकावे में तैयब जी के ई गीत कबनो कोर-कसर नइखे छोड़ले। आज ‘कविता में विचार’ आ ‘विचार कविता’ के जवन स्वरूप सामने आ रहल बा आ कविता में खाली विचारन के जवन जुगाली दिख रहल बा ओह से अलगा हट के सत्तर के दशक के आखिरी सालन में भोजपुरी कवि अपना कविता के अलहदा भविष्य तय करे लागल रहे।

तैयब जी के जवना गीत के हम ऊपर उल्लेख कइले बानीं ऊ गीत बाद में 2011 में छपल उहाँ के गीत-ग़ज़ल संग्रह ‘सुर में सब सुर’ के गीत-खंड के चौथा गीत के रूप में हमरा संकलित बा। आज के कविता भा गीत के बहुते कम अइसन पंक्ति होत बाड़ी सन जवन पाठक के कंठ में सीधे उतरि जात होखो भा ओकरा दिमाग में कौंधे लागत होखे। कंठ में उतरे भा दिमाग में कौंधे बदे उहे काव्य-पंक्ति कामयाब होली सँ जवनन में भाव आ विचार आउर संवेदना आ सोच के साफ-सूथर संतुलित समाहार देखे के मिलत होखे।तैयब जी के एह गीत के दू गो बंध आजो हमरा इयाद बा –
“बुझल-बुझल लागत बा जियरा के जोत
दिन जनमल रात अइसन घटा के अलोत
डूब गइल सूरुज मन के कवनो घाट
अँखिया में उग आइल नदिया के पाट
ए बदरिया के का हो गइल!
चान मुअल लाश अइसन जल में दहाय
महुआ के लोर भरल हाट में बिकाय
लोहू पिअले लउके सेमर के फूल
मौसम के कपड़ा में लंगटे बबूल
ए नजरिया के का हो गइल!”
एही गीत के एगो आउरो छन्द हऽ –
“देख रंग पोखरा में भोर के नहात
पुरवइया चुनरी से फुद-फुद बतियात
गँवई गुजरिया के लट बारम्बार
ऐनक से करे रोज झगड़ा-तकरार
ए बदरिया के का हो गइल!”
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-जियरा के जोत जब बुझ-बुता जात होखे, दिन घटा के अलोत में राते लेखां जनमत होखे, मन के कवनो घाट पर सूरुज डूब गइल होखे आ अँखिया में नदिया के पाट उग आइल होखे तऽ चान मुअल लाश अइसन जल में दहात दिखबे नू करी? एह गीत में मनुष्य के सौन्दर्य-चेतना में आइल बदलाव के ई नतीजा बा कि ‘चाँद मुअल लाश’ जइसन भव-सागर भा भाव-सागर में दिख रहल बा। सेमर के फूल के ललाई में लाल लोहू के सउनाई देखे वाला तैयब जी के नजर प्रकृति के मानवीकरणो करत बा तऽ ओमें सामाजिक चेतना के धार कुंद नइखे होखे देत। सेमर के फूल ओजवा खूब खिलेला जहाँ गरमी खूब पड़त होखे ।अप्रैल के महीना में जब गरमी आपन रूप देखावल शुरू कर देले तऽ ई सेमर के फूल अपना ललाई से ना केवल प्रकृति के ताप बलुक युगतापो के झलकावे वाला सहजे एगो प्रतीक बन जाला । गरमी में छोटहन पौधा, गाछ-बिरिछ, हरियर दूब – सब मुरझाये,सूखे-झुलसे लागेला तब ई सेमर के गाछ अपना फूल के ललाई से एह सभके मुँह चिढ़ावत कवनों शोषक- जस आपन रूप प्रकट करेला।बबूलो के नंगापन आ चुभन मानव-मन के पीड़ा पहुँचावेला।
“ए नजरिया के का हो गइल ” के सवाल उठावे वाला हिन्दी-भोजपुरी के कवि डॉ. तैयब हुसैन ‘पीड़ित’ [16.04.1945 -11.05.2025] के दूगो भोजपुरी कविता-संग्रह छपल बा—‘सुर में सब सुर’ आ ‘अनसोहातो’। एह दूनू संग्रहन के शीर्षकने के जरिये तैयब जी अपना एह सवाल के जवाबो हाजिर कर देले बाड़ें कि कवि के नजर में अब कइसन-कइसन बदलाव आ गइल बा। ‘सुर में सब सुर’ शीर्षक ई स्पष्ट करत बा कि कवि के ‘सुर’ में हर तरे के सुर समाहित बा। एकरा के अइसहूँ कहल जा सकता बा कि कवि के ‘सुर’ हर तरह के सुरन से मिल के बनल बा। तैयब जी के दोसरका संग्रह के शीर्षक ‘अनसोहातो’ ई बतावत बा कि एक कविता- संग्रह में अइसनका कुछ नठइखे जवन जान-बूझ के जबरदस्ती कहे भा सुनावे के कोसिस के तहत होखे। ‘वर्ड्सवर्थ’ कविता के परिभाषित करत एकरा के ‘Spontaneous overflow of powerful feelings’ बतवले रहलन। तैयब के कवितन के संग्रह के शीर्षक बा—‘अनसोहातो ’ यानी एह में जवन कुछ बा ऊपर से थोपल-जड़ल नइखे, ऊ देश-दुनिया, समय-समाज, घर-बाहर, दिल-दिमाग सभके स्वाभाविके आ यथार्थे रूप सामने रखे वाला बा।
कार्ल मार्क्स के एगो कविता के भोजपुरी में अनुवादित पंक्ति बाड़ी सँ—
“मत बदलs यथास्थिति के अनुसार
मोड़s दुनियाँ के अपना ओर।”
सँभालs अपना भीतर सगरी ज्ञान
घुटनन के बल मत रेंगऽ उठs—
गीत, कला आ सच्चाइयन के
तमाम गहराइयन के थाह लs।
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-तैयब जी के कविता मार्क्स के एह काव्य–दर्शन के अनुगामी बाड़ी सँ। तैयब के कविता दरअसल मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्रीय निकष पर खरा उतरे वाली अइसन कविता बाड़ी सँ जवनन में मानवता आ ओकरा व्यापक कल्याण के स्वर प्रखर बा। मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र दरअसल कला ना ‘कलावाद’ के विरोधी होला, कवनो शैली ना बलुक ‘शैलीवाद’ के विरोधी रहल बा। ई कवनों प्रकृत सत्य के विरोधी ना होके ‘प्रकृतिवाद’ के विरोधी होला।मार्क्सवादी सौन्दर्य-दृष्टि अतीन्द्रियता आ अमूर्तन से दूर रहला के बावजूद
कला–साहित्य खातिर सौन्दर्य–तत्व के अपरिहार्य मानेले। तैयब के कविता में जीवन, समय आ समाज खातिर जवन जन–पक्षधरता दिखाई पड़ रहल बा ऊ ओकर व्यापक संवेदना ,सोच आ समझदारी के परिचायक बा ।
तैयब जी अपना काव्य-संग्रह ‘सुर में सब सुर’ के पहिलका गीत जवना के ऊ पहिले-पहिल एह किताबे में परोसले बाड़ें,ओकरा के अपना कवि-कर्म के पहिलकी सिरिजना बतवले बाड़न।एही गीत के कुछ पंक्तियन में तैयब जी के काव्य-चेतना के साफ-साफ झलक मिल रहल बा –
“परदेश पिया के ना धारे
केहू खाये लडुआ–बिस्कुट
हम खायब सतुये पीस–कूट
बाकी केहू के अन-धन से
ना बदलब आपन भाग–खूँट
देखब निसदिन मुख -चनवा रे!
परदेश पिया के ना धारे।
-इहाँ नायिका कहत बिया कि चरमहला ओकरा अचिको ना भावेला,ऊ अपना मड़इये में मोद-मंगल मना ली । विरही प्रियतम के पातियो ओकरा के कमजोर नइखे बनावत ,पाती से आपन दिल पथराये नइखे देत ,कहत बिया -नींन त पपिहरो के ना आवे । विरहो में संघर्ष के एह तरे के क्षमता भोजपुरिये क्षेत्र के कवनों नायिका में हो सकत बा,जवन श्रम से कबो मुँह ना मोड़े,बिकट से बिकट कठिनाई आ मुसीबत में अपना सँवाग के बराबरे सहयोग देले आ खुद अपनो धीरज कबो चूके ना देले।
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अपना संग्रह ‘सुर में सब सुर’ के ‘भूमिका’ में डॉ. तैयब जी साफ तरे लिखले बाड़ें कि—
“कवनो रचना के गीत होखे खातिर ओह में भाव के
तीव्रता आ ओकरा एकांतता के भइल जरूरी बा ,काहे कि एही से ओह ‘ मनोलय ‘ के जनम होले जवन गीत के प्राण तत्व बा ।” ऊ शब्दन के लय आ अर्थन के लय के उल्लेख करत ‘मनोलय’ के गीत के मूलभूत ऊर्जा मनले बाड़न । तैयब के गीतन में ई मनोलय जहाँ-जहाँ अपना पूरा मधुरई ,कांति आ दीप्ति के साथे मौजूद बा ,ओजवा गीतन के गति आ गरिमा देखे लायेक बा।तैयब जी के कहनाम बा कि “जवानी नैसर्गिक रूप से या त रूमानियत पसंद करेले भा क्रांतिकारिता।समझदारी के बिना क्रांतिकारिता टिकाऊ ना होय।हमहूँ शुरुआती सृजन में प्रकृति के आलम्बन लेके अधिकतर संयोग -वियोग के श्रृंगारिक गीत रचना गावत रहनीं बाकिर
जइसे- जइसे प्रतिकूल परिस्थितियन से साबका पड़ल, कारण आ निवारण तलाशे के क्रम में प्रगतिशील होत
गइनीं।फेर त इहो महसूस भइल कि अइसन चेतना के ना खाली बुद्धिजीवी आ मध्यम वर्ग तक सीमित राखल अन्याय कहाई बलुक बिना पढ़ुआ -लिखुआ वाला एह से बड़ समुदाय तक एके बाँटल समय के माँग बा।अइसन में सुभावत: लोकराग के राहे समीचीन बुझाइल। ”
– तैयब जी के एह लम्बा वक्तव्य के हम एह से उद्धृत कइले बानीं ताकि एकरा जरिए उनका काव्य-प्रक्रिया आ शैली के पहचाने – परखे के सहजे सूत्र भेंटा जात बा।
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तैयब जी श्रृंगारिकता से उबरि के समझदारी भरल क्रांतिकारिता का ओरि डेग बढ़ावल मुनासिब समझले बाड़ें।कविता के देश-काल आ समय-समाज से जुड़ाव बहुत जरूरी होला आ ओकरे बल पर ऊ आपन उपयोगिता आ प्रासंगिकता विकसित करेले।कवनों रचना के कालजयी होखे खातिर ई जरूरी होला कि ऊ कालजीवियो होखे।जवन रचना कालजीवी ना होखे ,अपना समकाल के सुख-दुख ,पुलक-पीड़ा , चिंता आ चुनौतियन से विरत रहिके खाली खयाली पुलावे पकावे में लागलि रह गइल होखे,ओकर अरदोआय बहुत कम दिन के होला।
‘प्रगतिशीलता ‘ बहुत बढ़िया राजनीतिक विचार,चिंतन आ दर्शन हटे। राजनीति आज समय आ समाज के चप्पा-चप्पा में अइसन पइठल बिया कि ओकरा से अपना के विमुख बतावत कवनों साहित्यकार अपना रचनात्मक ईमानदारी के परिचय नइखे दे सकत।बेशक तैयब जी राजनीति से नकली परहेज करे वाला रचनाकार नइखन । उनकर कवितो कवनों अराजनीतिक कविता नइखे।बाकिर तैयब जी के ई विशेषता बा कि ऊ राजनीतिक एजेन्डो के अपना कविता में एह रूप में हाजिर कइले बाड़ें कि शुद्ध आ खाँटी कविता के वोकालत करे वाला फरछीनो लोग उनका कविता से नाक-भौं नइखे सिकोड़ सकल । अपना एह स्थापना के तिखार में हम तैयब जी के एगो गीत के कुछ पंक्तियन के राखे के चाहब-
पटना सहरिया से अइले रंगरेजवा हो राम!
अरे राम! रंगी देते लाल रंग बसनवा हो राम!
काहे तूहूँ देवरा निहारेल बदनवा हो राम!
अरे रामा! लाले रंग में बसे मोरे परनवा हो राम!
लाले रंग सुग्गा-ठोढ़, तोर-मोर खुनवा हो राम!
अरे रामा! लाले रंगवे सँझिया-बिहनवा हो राम!
अबकी सवनवा में अइहें जो सजनवा हो राम!
अरे रामा! लेले अइहें लाले अभरनवा हो राम!
मोर नइहरवा में मजूरा-किसनवा हो रामा !
अरे रामा! लेके चले ललके निसनवा हो राम!
-एह गीत में गाँव के कवनो गुजरिया अपना सजनवा से ई उमेद लगवले बिया कि ऊ ओकरा खातिर अबकी सवनवा में धानी रंग चुनरिया ना, बलुक लाले अभरनवा लेके उतरस, रंगरेजों से ओकर इहे चाहना बा कि ऊ लाल रंग बसन रंग देस । सुग्गा के लाल ठोढ़ के ललाई ऊ अपना पियो के होठन में देखे के चाहत बिया।साँझ-सबेरे के आसमान के ललाई ओकरा नीक लागत बा।ऊ साफे सँकार लेत बिया कि ” लाले रंग में बसे मोर परनवा हो राम! ” कम्युनिस्ट पार्टी के लाल-झंडा आ लाल सलाम के राजनीतिक एजेण्डा के तैयब साहेब अपना एह नायिका के कजरी धुन में जवन झलकवले बाड़े,ओह में उनकर राजनीतिक प्रतिबद्घता अइसनका काव्यात्मक अवलेह में सउनाइल -परोसाइल बा कि उनकरा पर खाली राजनीतिक प्रोपेगेंडा के आरोप नइखे जड़ल जा सकत।
तैयब जी के एगो आउरो गीत के हम उल्लेख करे के चाहब जवना में ऊ बड़ी बारीकी से अपना जनवादी स्वर के साहित्यिक संचेतना के साथ मुखरित कइले बाड़ें—
दिनवा ना कटे, ना ओराय रात ननदी!
केकरा से कहीं पतियाय बात ननदी!
आर पार धनिया डँड़ेर पर होरी
तरवा के तरे से जमीन गइल चोरी
गोबर सहर जाए पछतात, ननदी!
भारत भइल बाटे सोनपुर के मेला
डेगे-डेगे होता नौटंकियन के खेला
सिधुआ हीरामन रोज खाय मात, ननदी!
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-प्रेमचंद के कथा-चरित्रन के प्रतीकन के जरिए भारत के ‘सोनपुर मेला’ से तुलना गजबे व्यंग्यमिश्रित यथार्थमूलक चित्र प्रस्तुत कर रहल बा।
तैयब जी खातिर धर्मनिरपेक्षता आ लोकतंत्र कवनो राजनीतिक नारा भा फैशनिया ओढ़ल विचार के लबादा भर नइखे, ऊ धार्मिक आडम्बर से विमुख रहे वाला एगो अइसन अमनपसंद इंसान बाड़ें जे साफ-साफ अपना अपना एगो ग़ज़ल में कह रहल बाड़ें–
तू ना अमरित के पियाला द हमें
रोजी-रोटी के नेवाला द हमें
जेह में हो एक साथ पूजा आ नमाज
अइसन महजिद आ सिवाला द हमे
मन द अइसन साफ जइसन आईना
तन तू गोरा द कि काला द हमें
ए खुदा, ए गॉड, ए ईश्वर सुनऽ
दिल द तऽ इंसान वाला द हमें।
कबो ‘ सोना के चिड़िया ‘ कहाये वाला भारत के आज के तसवीर पेश करत अपना ‘चइता’ के लोकधुन में तैयब जी के रचना बिया–
आव तोके भारत घुमाईं हो भाई
देश देखलाईं।
कल-कारखाना बंद, छटनी के लंद-फंद
बाँचल आज-काल्ह में बिकाई हो भाई
देश देखलाईं।
आम जनता के घरे चूहा दंड पेले
नेता लोग के हगे के हवाई हो भाई
देश देखलाईं।
-‘चइता’ के लोकधुन में देश-दुरदसा के ई चित्र पूंजीवादी व्यवस्था के प्रकोप के सामने खड़ा कर देत बा।
‘सुर में सब सुर’ के गजल/गजलनुमा खंड के नामकरणे बतावत बा कि ‘गजल के ग्रामर ‘ पर पीड़ित जी बहुत धेयान नइखन देले लेकिन मौजूदा देश-दुनिया के हकीकत, तंगिश आ तबाही के साथे-साथे ओकरा सपनन के साकार करे के बेचैनी के चित्र उरेहे में ऊ काफी तत्पर रहल बाड़ें । तैयब जी के कविता अपना सामाजिक जिम्मेवारी से किनाराकशी करत एजवो नइखे दिखत।कुछ उदाहरण देखे लायेक बा-
(1) “ईश्वर अल्ला चुप-चुप बाड़न
भक्तन में तकरार बा बाबा।
संविधान केकरा खातिर बा
केकर ई सरकार बा बाबा।
हाथी के दू दाँत हुकूमत
कहल -सुनल बेकार बा बाबा।”
(2) “जब परिन्दा उड़ान पर होई
तीर कोई कमान पर होई।
देश के सब मजूर छँटनी पर
कर्ज़ हर एक किसान पर होई।”
(3) “लोग ओढ़ले बा लोकतंत्र इहाँ
पुजारी के रामनामी जइसन।
शब्द बानर ह, छंद डोरी हऽ
शायरी खेल मदारी जइसन।
– ‘सुर में सब सुर’ कविता संग्रह के आखिरी कविता तैयब जी के ऐतिहासिक कविता बिया जवना के शीर्षक बा-‘किसान गाथा’।आल्हा छंद में लिखल एह कविता के पाट एतना चौड़ा बा कि एह में स्वतन्त्रता संघर्ष काल से लेके आज तक ले के किसान के जिनिगी के कहानी के पीड़ा के उकेरत आगाही के स्वर में कवि ई बतावल नइखे भूलत कि
उठजा पट्ठे! दउड़ पकड़ ले
जे तोहरा कइलक हलकान
हरबऽ त ई बेड़ी टूटी
जीते ला बा सकल जहान।
अब हम कुछ बात कवि के दोसरका कविता -संग्रह ‘अनसोहातो ‘ के बारे में रखे के चाहब।
‘अनसोहातो’ के कविता तीन खंड में बँटल बाड़ी सँ — श्रद्धांजलि, छन्दबद्ध आ छन्दमुक्त।
‘श्रद्धांजलि’ खंड में पं. धरीक्षण मिश्र, भिखारी ठाकुर, मनोरंजन प्रसाद सिन्हा, आचार्य महेन्द्र शास्त्री, बाबू रघुवंश नारायण सिंह आ मुँहदुब्बर जी जइसन महत्वपूर्ण भोजपुरी साहित्यकारन पर मुक्त छंद के कविता बाड़ी सँ तऽ एगो रचना एह खंड के शहीद भगत सिंह के जन्म–शताब्दी वर्ष के अवसर पर लिखाइल बिया।
संग्रह के छन्दबद्ध खंड में कुछ समकालीन भाव–बोध आ देश पर केंद्रित 70 गो दोहा संकलित बाड़े सँ।बतौर बानगी —
कफनो बेचत में जहाँ काँपत नइखे पाँव
चलऽ देखाईँ हम तोहे गाँधी जी के गाँव।
पूछी नयका आदमी पढ़-पढ़ के इतिहास
कुछ अधिनायक देश के बाकी काहे दास?
कहाँ अबीर – गुलाल – रंग ,कहाँ सती शिव संग
होरी दूर असाम में ,धनिया घर में तंग।
एक संग्रह के जवन छन्दबद्ध रचना विशेष रूप से ध्यान खींचत बाड़ी सँ ओमें ‘जा रहल बा रेलगाड़ी’, ‘हमार गाँव’, ‘गइल कला बबुरा बूंट लादे ‘ , ‘हो गइल होई ’, ‘विषखोंपड़ा के मंतर’, ‘उलटबाँसी’, ‘राजा’, ‘कॉरपोरेटी सीख’ आदि प्रमुख बाड़ी सँ आ छन्दमुक्त रचनन में —
‘भूख’, ‘बुधिया के अखियान ‘, ‘आखिर कब ले ’, ‘अठगोरवा ’, ‘चिऊँटी’, आ ‘मरल एगो फूलकुमारी के भूख से ‘ आदि अइसन रचना बाड़ी सन जवनन से समकालीन भोजपुरी कविता के पुरहर रूप सामने आ जाता बा।
एक संग्रह के पहिलका ‘श्रद्धांजलि’ खंड में भिखारी ठाकुर के समर्पित एगो कविता ‘दु टुक्की बात’ के पंक्तियन में कवि भिखारी ठाकुर के प्रति जवन संवेदना आ सोच के अभिव्यक्ति प्रदान कइले बा,
ओमें जथारथ जादा भक्ति आ अतिरंजना बिल्कुल
नइखे मिलत-
“घर में बेमार छोड़ आयेल बाल–बच्चा वालू /
एह सरंगी–सितार पर ताल तुड़त बुढ़ऊ के /
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दरद अंगेजी/ ना तऽ /ना तऽ भिखारी ना रहिंहन, ना रहिंहन, ना रहिंहन /चाहे तू उनका के मंदिर में कैद कऽ दऽ /भा उनका पुतरा के /जयंती के बहाने बटोराइल लोगन के गोल में /साले–साल जेतना जगेह खोलऽ–तोपऽ।”
‘अनसोहाते ‘ के एगो कविता बिया-‘खास बात ‘।एमें नया सोच आ संवेदना के तार्किक आ विचारपूर्ण ढंग से राखे के कोसिस कइल गइल बा।कविता में मिथकीय आ पौराणिक कथो के आधुनिक विचार-प्रवाह में लपेट के परोसल गइल बा।कवि के जनवादी सोच एजवा मुखर होके हाजिर बा-
“मजहब के आँख आदमी में
का लगल कि अब
अपना जगह प लोग के
अनका जनात बा
कमजोर जन के तोख ला ईश्वर गढ़ल गइल
बा साफ कि बरियार से ऊ मात खात बा।”
-बरियार से ईश्वरो डेरात बाड़ें आज,ई आम सोच बन गइल बा समाज में।जे पहुँच, पैरवी आ पइसा वाला बा, ऊ अपना पूंजी के बल पर पशुपतियो भगवान के अपना वश में कर लेले बा-अइसनका बोध आज
सरेआम हो गइल बा।
‘अन सोहातो’ के एगो बहुत सुंदर कविता बिया—‘हमार गाँव’। एह नवगीतमें आज के गाँव के अइसन फोटोग्राफिक चित्र प्रस्तुत भइल बा जवना से ग्रामीण जीवन में आइल नीरसता, एक दोसरा से अलगाव, शोषण आ साँसत के एगो समहर रूप देखे के मिलत बा-
“झाँक रहल खिड़की से
आँख-आँख
हर कदम फुलात
झटहा से आम गिरे
निमकउड़ी आप भड़भड़ात
पसगयबत पाहुन के आगम में
छप्पर पर कउआ के काँव
हमार गाँव!”
एह नवगीत में गाँव खातिर जवन प्रतीक आ बिंब रचल गइल बाड़ें सँ टेक के पंक्तियन में, यथा—‘अंगना में हारल हियाव हमर गाँव’, ‘साँसत के पहिला पड़ाव हमर गाँव’, ‘जुआ में पांडव के दाँव हमर गाँव’, ‘हिकमत से लीलल बउसाव हमर गाँव’, ‘छप्पर पर
कउआ के काँव हमर गाँव!’— ओह से ग्राम-बोध के छरन, गाँव में लगातार सांसत में पड़त जा रहल जिनिगी के तबाही आ तंगिश , आपन सब वैभव जुआ में हार के पांडव सभे जइसन दमन आ अन्याय झेले के लाचारी का बीच अभियो ‘छप्पर पर कउआ के काँव’ मतिन एगो उमग-उछाह के अवसर जोगवले रहे वाली लोक-संस्कृति के जगवले रहे वाला गाँव आजो एह देश के वास्तविक पहचान बाड़ें सँ।
‘अनसोहातो’ के ओह कवितन में जवना में सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियन आ दुरभिसंधियन पर कवि आपन लेखनी उठवले बा ओकरा स्वर में व्यंग्य के धार देखे लायक बा—‘हो गइल होई’, ‘विषखोंपड़ा के मंतर’, ‘अपनो विकास होत बा’, ‘उलटबाँसी’, ‘राजा’ आदि कवितन में एह बात के तिखार हो सकत बा । ‘राजा’ कविता के पंक्तियन पर गौर कइल जरूरी बा-
“राजा भोज इले नंग -धडड़ंग
दरबारी सुहरावे अंग
कहस कि ई हऽ वस्त्र वैश्विकी
भारतीय के लागी तंग।”
-एह कविता के विस्तार चार खंड में बा आ एकर वर्ण्य-विषय एतना व्यापक बा कि एह में मौजूदा व्यवस्था के हर तरह के खामी ,लाचारी ,बेबसी ,तिलिस्म, विद्रूपता सबकुछ तार-तार होके सामने आ जात बा ।
‘राजा के चेहरा पर चेहरा’ , ‘राजा केतना बेचारा बा ‘ , ‘राजा खाये में अलसाला ‘ जइसन टेकन के जरिए पूरा गीत में देश में धर्म ,राजनीति ,समाज-दर्शन, अर्थतंत्र में उदारीकरण आ वैश्वीकरण के नाम पर आम गरीब जनता के पेराई -गराई आ एह सब के पीछे नेतृत्व के मुग्धकारी आलस, भटकाव आ नंगापन – एह सगरी स्थितियन के कवि अपना कविता के भिन्न-भिन्न आयामन के जरिए समेटत चेतावनी आ प्रेरणा के स्वर बनि के उतरल बा।आउर- त -आउर आदिवासी विमर्शो के भोजपुरी में विकसित करे के लिहाज से कवि के पंक्ति गौर करे लायेक बाड़ी सँ जवना में उपदेशात्मक तऽ बा बाकिर एकरा चलते कविता कमजोर पड़त नइखे दिखत-
“मत आपन तजिहऽ
मत चाल-चलन बहकईहऽ तू
जल ,जंगल,जमीन के चक्कर में
मत आपन जान गँवईहऽ तू ।
आपन झंडा तीनपटिया हऽ
ललकी हऽ नक्सलवासी
आपन लोहा -सन पाहुँच में
मत बनूक लऽ वनवासी ।”
– कवि एह पंक्तियन में आदिवासी समस्या के उल्लेख करत बनूक ना उठावे के आ जान ना गँवावे के निहोरा करत बा।शांति आ सद्भावना के ई स्वर तैयब जी के राजनीतिक कविता खातिर भोजपुरी माटी के देन बा जवन कबो हिंसा में विश्वास ना करेले।
तैयब जी के छंदमुक्त भोजपुरी कविता समकालीन हिन्दी कविते लेखाँ सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति आ वैश्विक समस्यन के दिसाँई जागरूक रहत प्रतिरोध रचे वाली कविता बाड़ी सँ।एह में कवि के जुझारूपन आ संघर्षशीलता के साथे-साथे मानवता के पक्ष में बराबर एगो संवाद बनवले राखे के समझदारियो भरल बा।आज बचपने से कइसे हर तरे के रंगीनी आ तिलिस्म भा सुख-सुविधा देखा के मूल समस्यन के अनदेखी करे आ आपन मस्ती आ आनंदे के पूरा दुनिया के खुशहाली मान लेबे के फुसिलउवल आ भरम सिखावल जात बा -एकरा के ‘का बाँचल रहे’ कविता में देखल जा सकत बा –
“जब हम /सात साल के पोता के /ब से बाईस्कोप /समुझावे चहलीं/त/ऊ /हैरत से /हमार मुँह तकलक/फेर/प से पिक्चर/फ से फ्रीज / ब से ब्रोकर/म से मोटर आ भ से भोंपू मारत /चल गइल/टी.वी. में कारटून देखे।”
-कुल मिला-जुलाके देखल जाव तऽ कवि तैयब के कविता के बारे में एक बात साफ-साफ कहल जा सकत बा कि ऊ देश, समाज आ समय से जुड़ल एगो अइसन जागरूक भोजपुरी कवि शुरुए से रहल बाड़ें जिनका कविता में भोजपुरी क्षेत्र के आम मनई के पीड़ा, दुःख, बेचैनी, विकलता, संघर्ष, तेवर आ मुठभेड़ -सब के स्वर मिलत बा। तैयब जी के शुरुवाती दौर के कवितो में सामाजिक चेतना के स्वर प्रखर बा। तैयब के कविता में जनवादी राजनीतिक विचारधारा के स्पष्ट छाप देखल जा सकत बा। ई प्रभाव नाराबाजी के सकल-सूरत में कमे जगह उतरल बा एह से उनका कविता के ‘पोलिटिकल प्रोपगेंडा’ कहल नादानी होई। ऊ सांगोपांग कवि बाड़न, सामाजिक-राजनीतिक रूप से परिपक्व एगो संववेदनशील जोरदार कवि बाड़न । देश-दुनिया के मौजूदा हालात से पूरा तरे वाकिफ एगो सजग रचनाकार। तैयब जी के काव्य-यात्रा गीत -गजल आ लोकरागिनी पर आधारित गीति-चेतना से गुजरत समकालीन कविता के ओह मुकाम पर पहुँच पावे में पूरा तरे कामयाब रहल बिया जहाँ ऊ कवनों भी दोसरा भारतीय भाषा के कविता के तुलना में अपना के हीन भा कमतर ना समझे।
दरअसल, कवनों बड़ कवि के ई पहचान होला कि ऊ समय-समाज आ देश-दुनिया से केतना करीबी आ गहिर जुड़ाव रखले बा।ऊ अपना समय के चुनौतियन से मुठभेड़ करे में केतना ले सक्षम बा। समय आ समाज के परखे के ओकरा प्रयासन में केतना ले ईमानदारी बा -इहो बात ओकरा श्रेष्ठता के प्रमाणित करे के दिसाँई निकष बनिके सामने आवेला।समय के जथारथ जेतना सामने दिखाई पड़ेला ओह से जादे ऊ भीतर दबल-छिपल रहेला ,जवना के परत-दर-परत उटकेर के कवनों बड़े कवि सभका सोझा ले आ पावेला।समय आ समाज के ई सच्चाई आ जथारथ एतना गज्झिन आ अझुराइल रहेला कि ओकरा से जुड़ल अनुभूतियन के अभिव्यक्ति खातिरो नया-नया शैली ,कथन के भंगिमा आ शिल्प अपनावे के पड़ेला।तैयब जी भोजपुरी के निश्चित रूप से एगो अइसनका श्रेष्ठ कवि बाड़ें जेकर कविता भाव,विचार, वस्तु आ रूप सगरी दिसाँई काल्ह आवे वाली भोजपुरी कविता खातिर एगो ठोस जमीन तइयार करत दिख रहल बिया।कवनों बात के कहे के प्रभावकारी ढंग हो भा अपना भाषा के निजता,लोक सौन्दर्य के सूक्ष्म परख आ कविता के साथ ट्रीटमेंट के आपन खास तरीका के सवाल होखे -तैयब जी भोजपुरी कविता के दुनिया में हर तरे से आपन एगो महत्वपूर्ण पहचान बनावे में कामयाब रहल बाड़ें। तैयब जी के एह कामयाबिये के बदौलत भोजपुरी समकालीन कविता आज एगो ताक़तवर कविता के रूप में सभका सोझा मजबूती से ठाड़ बिया।


तैयब जी के सर्वांगपूर्ण विवेचन | हार्दिक बधाई |