डॉ. जौहर साफियाबादी के भोजपुरी उपन्यास ‘पूर्वी के धाह’, एक गंभीर, विस्तृत एवं आलोचनात्मक समीक्षा

Date:

कृष्ण कुमार

भोजपुरी साहित्य की समृद्ध परंपरा में कुछ ऐसी कृतियाँ समय-समय पर सामने आती हैं, जो केवल साहित्यिक सृजन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि अपने समाज, संस्कृति और युगबोध की प्रतिनिधि रचनाओं के रूप में स्थापित होती हैं। डॉ. जौहर साफियाबादी का उपन्यास ‘पूर्वी के धाह’ ऐसी ही महत्वपूर्ण कृति है। यह उपन्यास पूर्वांचल के लोकजीवन, सामाजिक अंतर्विरोधों, मानवीय संवेदनाओं और बदलते समय की चुनौतियों का सशक्त आख्यान प्रस्तुत करता है।

यथार्थ की धरती पर खड़ा उपन्यास

उपन्यास का शीर्षक ‘पूर्वी के धाह’ अपने भीतर गहन प्रतीकात्मक अर्थ समेटे हुए है। भोजपुरी में ‘धाह’ का अर्थ केवल जलन या पीड़ा नहीं, बल्कि भीतर तक झुलसा देने वाली उस अनुभूति से है, जो व्यक्ति और समाज दोनों को प्रभावित करती है। यहाँ ‘पूर्वी’ केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक संसार का प्रतिनिधित्व करती है।

ये भी पढ़ें-भाषाओं की भीड़ में भोजपुरी ही क्यों बाहर? करोड़ों की जुबान के सवाल पर सरकार मौन

उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी यथार्थपरकता है। कथानक में कृत्रिम नाटकीयता के बजाय जीवन की स्वाभाविक गति और परिस्थितियों का चित्रण है। खेत-खलिहान, चौपाल, परिवार, रिश्ते, आर्थिक संघर्ष, बेरोजगारी, पलायन और बदलती जीवनशैली जैसे तत्व कथा में स्वाभाविक रूप से उपस्थित हैं। एक ओर लोकसंस्कृति की गहरी जड़ें हैं, तो दूसरी ओर आधुनिकता का प्रभाव। यही द्वंद्व उपन्यास की मूल संवेदना बन जाता है।

पूर्वांचल का सामाजिक दस्तावेज

‘पूर्वी के धाह’ को केवल साहित्यिक कृति कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह अपने समय के समाज का समाजशास्त्रीय दस्तावेज भी है। इसमें जातिगत विभाजन, आर्थिक विषमता, राजनीतिक अवसरवादिता, सामाजिक शोषण और ग्रामीण युवाओं के पलायन जैसी समस्याओं को उभारा गया है। रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में गांव छोड़ते युवाओं तथा इससे पैदा होने वाली सामाजिक रिक्तता का चित्रण विशेष रूप से मार्मिक है।

मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण

इस उपन्यास की आत्मा इसकी मानवीय संवेदनाएँ हैं। प्रेम, करुणा, त्याग, विश्वास, संघर्ष, निराशा और उम्मीद जैसे भाव सहज रूप में अभिव्यक्त हुए हैं। पात्रों की पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती, बल्कि सामूहिक अनुभव का हिस्सा बन जाती है।

ये भी पढ़ें-भाषा, बाज़ार और अश्लीलता: भोजपुरी ही क्यों गुनहगार?

चरित्र-चित्रण की विशेषताएँ

डॉ. जौहर साफियाबादी की रचनात्मक शक्ति का प्रभावशाली पक्ष उनका चरित्र-चित्रण है। उपन्यास के पात्र जीवंत और विश्वसनीय हैं। उनके भीतर के द्वंद्व, इच्छाएँ, कमजोरियाँ और संघर्ष पाठक को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से स्त्री पात्रों के माध्यम से ग्रामीण स्त्री जीवन की वास्तविकताओं और चुनौतियों को प्रभावशाली ढंग से सामने लाया गया है।

उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति

‘पूर्वी के धाह’ की भाषा इसकी प्रमुख उपलब्धियों में से एक है। डॉ. साफियाबादी ने भोजपुरी की सहज, प्रवाहपूर्ण और लोकधर्मी भाषा का प्रयोग किया है। मुहावरों, लोकोक्तियों, लोकप्रचलित शब्दों और ग्रामीण अभिव्यक्तियों का सुंदर इस्तेमाल उपन्यास को प्रामाणिकता प्रदान करता है।

लोकसंस्कृति का जीवंत संसार

उपन्यास में भोजपुरी अंचल की लोकसंस्कृति पूरे वैभव के साथ उपस्थित है। पर्व-त्योहार, विवाह संस्कार, लोकगीत, पारंपरिक रीति-रिवाज, सामुदायिक संबंध और सामाजिक व्यवहार का सजीव चित्रण मिलता है। यह सांस्कृतिक संसार पाठक को भोजपुरी समाज की जड़ों और उसकी पहचान से जोड़ता है।

शिल्प की दृष्टि से भी उपन्यास उल्लेखनीय है। कथा का प्रवाह संतुलित और रोचक है। वर्णन और संवाद के बीच अच्छा संतुलन दिखाई देता है। छोटे-छोटे प्रसंग भी व्यापक सामाजिक अर्थ ग्रहण करते हैं। प्रतीकों और बिंबों का प्रयोग कथा को और प्रभावशाली बनाता है।

महेंद्र मिश्र के व्यक्तित्व का नया पाठ

‘पूर्वी के धाह’ का एक महत्वपूर्ण पक्ष महेंद्र मिश्र के व्यक्तित्व का पुनर्पाठ है। उपन्यास में उन्हें केवल लोकगायक या ‘पूर्वी’ के जनक के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्त और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कलाकार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनकी गायकी को राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले माध्यम के रूप में देखा गया है। बनारस, मुजफ्फरपुर, बलिया, देवरिया और कलकत्ता जैसे स्थानों के माध्यम से भोजपुरी समाज की व्यापक सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों को कथा में जोड़ा गया है।

ये भी पढ़ें-‘भोजपुरिया बवाल’ और भोजपुरी की छवि, नाम-भाषा और पहचान पर उठे सवाल

गणिका संस्कृति और स्त्री-शक्ति

उपन्यास की उल्लेखनीय विशेषताओं में गणिका संस्कृति का पुनर्पाठ भी शामिल है। ढे़लाबाई जैसे पात्रों के माध्यम से लेखक स्वतंत्रता आंदोलन में गणिकाओं की भूमिका को सामने लाते हैं। ढे़लाबाई का चरित्र त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बनकर उभरता है। इस तरह उपन्यास स्वतंत्रता आंदोलन के उन उपेक्षित पक्षों पर भी ध्यान आकर्षित करता है, जिनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है।

लोकगीत, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना

महेंद्र मिश्र के गीत उपन्यास की आत्मा हैं। लेखक ने गीतों को कथानक के विकास का हिस्सा बनाया है। इनके माध्यम से पात्रों की मनःस्थिति, सामाजिक वातावरण और राष्ट्रीय चेतना को अभिव्यक्ति मिलती है। इतिहास, लोककथा, जीवनी और कथा-साहित्य का समन्वय उपन्यास को विशिष्ट बनाता है।

समकालीन प्रासंगिकता

आज जब ग्रामीण जीवन तेजी से बदल रहा है और पारंपरिक मूल्य संकट में हैं, ऐसे समय में ‘पूर्वी के धाह’ की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। यह कृति याद दिलाती है कि विकास केवल आर्थिक प्रगति का नाम नहीं है। सामाजिक संबंध, सांस्कृतिक मूल्य और मानवीय संवेदनाएँ कमजोर पड़ जाएँ तो विकास अधूरा रह जाता है।

भोजपुरी साहित्य में स्थान

‘पूर्वी के धाह’ भोजपुरी साहित्य में ऐतिहासिक-चरितात्मक उपन्यासों की परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह आंचलिकता, यथार्थवाद और सामाजिक चेतना का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। कृति यह भी रेखांकित करती है कि स्वतंत्रता का इतिहास केवल राजनीति और संघर्ष का इतिहास नहीं, बल्कि गीत, संस्कृति, त्याग और लोकचेतना का भी इतिहास है।

‘पूर्वी के धाह’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि पूर्वांचल की मिट्टी, संस्कृति, संघर्ष और संवेदनाओं का व्यापक आख्यान है। डॉ. जौहर साफियाबादी ने अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से भोजपुरी समाज के जीवन-सत्य, लोकचेतना और राष्ट्रीय भावना को शब्द दिए हैं। इसमें लोकजीवन की सुगंध, मानवीय संवेदनाओं की ऊष्मा और सामाजिक यथार्थ की तीखी अनुभूति दिखाई देती है। निस्संदेह, ‘पूर्वी के धाह’ भोजपुरी साहित्य की एक महत्वपूर्ण, शोधोपयोगी और संग्रहणीय कृति है, जो पाठकों, शोधार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए समान रूप से मूल्यवान सिद्ध होती है।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

भोजपुरी के सोहर में आजो जनमेलन बनवारी, नंद के लाला से मन के कन्हैया तक

-डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी कुछ दृश्य उम्र के साथ धुँधले...

लोक-संस्कृति की अमर धरोहर, जनवादी कविराज-गीतकार शैलेंद्र

 डॉ. संतोष पटेल जन्मदिन विशेष: शैलेंद्र ने भारत की पहली...

‘गंगा रतन बिदेसी’ भोजपुरी उपन्यास में प्रवासी जीवन की पीड़ा

समीक्षक: प्रकाश प्रियांशु भोजपुरी साहित्य धारा में उपन्यास विधा अपेक्षाकृत...