समीक्षक : कनक किशोर
भोजपुरी ग़ज़ल की दुनिया में सूफी संत जौहर शाफियाबादी एक नामचीन ग़ज़लकार के रूप में अपनी अलग पहचान रखते हैं। भोजपुरी ग़ज़ल की विकास-यात्रा में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने न केवल भोजपुरी ग़ज़ल को मजबूती प्रदान की, बल्कि उसे जीवन, समाज, मानवीय संवेदना, प्रेम, आध्यात्मिकता और सामाजिक विसंगतियों से जोड़कर उसकी अभिव्यक्ति का दायरा भी व्यापक किया है।
डॉ. जौहर शाफियाबादी का ग़ज़ल-संग्रह ‘रंगमहल’ जिंदगी के विविध रंगों से सराबोर रचनाओं का ऐसा संसार है, जिसमें प्रेम है, विरह है, सूफियाना भाव है, गांव की मिट्टी की खुशबू है, सामाजिक पीड़ा है, राजनीतिक विडंबनाओं पर व्यंग्य है और बदलते समय के प्रति सजग दृष्टि भी है। संग्रह की ग़ज़लें इस बात की गवाही देती हैं कि जौहर केवल ग़ज़ल लिखने वाले रचनाकार नहीं, बल्कि जिंदगी को बहुत करीब से देखने और उसके विभिन्न रूपों को शब्द देने वाले सजग कवि हैं।
ग़ज़ल के इस जौहरी की रचनाओं पर बातचीत शुरू हो चुकी है तो उनके ग़ज़लों की दुनिया से गुजरना स्वाभाविक है। ग़ज़ल क्या है और इस संग्रह की ग़ज़लें कैसी हैं-इसका उत्तर स्वयं ग़ज़लकार अपनी रचनाओं के माध्यम से देते हैं। फिर सवाल उठता है कि जब रचनाकार ने स्वयं अपनी रचनाओं के माध्यम से इतना कुछ कह दिया है तो उन पर दोबारा बातचीत की जरूरत क्या है? जरूरत इसलिए है कि दृष्टिकोण और कसौटी बदलने पर, अथवा किसी रचना के पुनर्पाठ पर कई बार कुछ नई बातें सामने आती हैं। विमर्श का दायरा बढ़ता है और वे बातें भी चर्चा में आती हैं जो पहली नजर में छूट गई थीं।
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सूफियाना संवेदना और जीवन-दर्शन
सूफी परंपरा एक ईश्वर में विश्वास, धार्मिक सहिष्णुता, मानव-प्रेम, भाईचारे और समष्टि के कल्याण पर बल देती है। जौहर शाफियाबादी की ग़ज़लों में सूफी दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। लेकिन उनका सूफीवाद केवल आध्यात्मिक अनुभूति तक सीमित नहीं है। उसमें जिंदगी के पन्नों पर फैले रंग-बदरंग, सामाजिक विकृतियां, मनुष्य की पीड़ा, सामाजिक बदलाव और बेहतर भविष्य की आकांक्षा भी शामिल है।
टेढ़ी-मेढ़ी राहों पर भागती जिंदगी में मिलने वाले सुख-दुख, छांव-धूप और संघर्ष के विविध रूपों को ग़ज़लकार ने बड़ी सहजता से प्रस्तुत किया है। जिस तरह स्याही अक्षरों का आकार लेकर ज्ञान की सर्जक बन जाती है, उसी तरह जौहर जिंदगी के विविध रंगों को ग़ज़ल का रूप देते हैं और उन पर सूफियाना सुगंध छिड़ककर ‘रंगमहल’ का निर्माण करते हैं।
कई भाषाओं के विद्वान जौहर के इस संग्रह में भोजपुरी ग़ज़ल की सात्विकता, सामाजिकता, मानवता और विकृत मानसिकताओं के प्रति प्रतिरोध को बेहद सहज और सरल भाषा में देखते हैं। यहां विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अनुभव की सच्चाई और लोकजीवन की सहज अभिव्यक्ति है।
डॉ. ब्रजभूषण मिश्र ने जौहर की भोजपुरी ग़ज़लों के संदर्भ में कहा है कि उनकी ग़ज़लों में जहां जीवन-दर्शन और जीवन-मूल्य हैं, वहीं समाज के बदलते स्वरूप से आहत मन की छटपटाहट भी है। भोजपुरी साहित्य के प्रमुख समीक्षक भगवती प्रसाद द्विवेदी के अनुसार जौहर की ग़ज़लों में इश्क-ए-मजाज़ी, इश्क-ए-हकीकी और जदीद शायरी—तीनों रंग एक साथ दिखाई देते हैं। ‘रंगमहल’ में इन सभी विशेषताओं को सहज रूप से देखा जा सकता है।
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ग़ज़ल की अपनी परिभाषा
ग़ज़लकार स्वयं अपनी रचना के माध्यम से ग़ज़ल की प्रकृति और प्रभाव को रेखांकित करते हैं—
असरदार बहुत है, नाजुक विधा यह।
जमाना के सुर इसमें, तेवर में भर दें।।
ग़ज़ल को परिभाषित करते हुए वे कहते हैं—
‘जौहर’ है इतिहास समय के।
जिंदगी के व्यापार ग़ज़ल है।।
दुख की अंधियारी कोठरी में।
आशा का उजियार ग़ज़ल है।।
समय का इतिहास, जिंदगी का व्यापार और आशा का उजाला—इन तीनों को अपने भीतर समेटे ग़ज़ल इस संग्रह की मूल संवेदना बन जाती है। ‘रंगमहल’ केवल प्रेम और सौंदर्य की ग़ज़लों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह समय और समाज को देखने वाली सजग रचनात्मक दृष्टि भी है।
प्रेम और परम तत्व का दर्शन
संग्रह की शुरुआत भजन से होती है, जिसमें सूफियाना भाव की सुंदर अभिव्यक्ति मिलती है—
चकित बानी हम देख के तहरे लीला।
संवरिया में तू हीं, गुजरिया में तू हीं।।
बनल बारऽ मंदिर आ मस्जिद के सोभा।
सुरतिया में तू हीं, मुरतिया में तू हीं।।
यहां ईश्वर किसी एक धर्म, संप्रदाय या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। वह मंदिर में भी है और मस्जिद में भी; सूरत में भी है और मूर्ति में भी। इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए ग़ज़लकार कहते हैं—
मंदिर-मस्जिद, गिरजाघर बा।
कवन परम सबकर बा।।
‘जौहर’ जी बस प्रेम धरम है।
और करम सब व्यर्थ बा।।
एक अन्य रचना में यही विचार और अधिक स्पष्ट होकर सामने आता है—
मंदिर-मस्जिद, चर्च, शिवाला।
कवनो में भगवान कहां बा।।
सबके एके तार बा जौहर।
प्रेम धरम है, प्रेम करम है।
बाकी सब बेकार बा, जौहर।
जे जाने एह सांच के भाई,
बेड़ा ओकर पार बा जौहर।।
इन पंक्तियों में धार्मिक कट्टरता के स्थान पर प्रेम और मानवीय एकता का संदेश है। यही जौहर के सूफियाना चिंतन की सबसे बड़ी ताकत है।
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धर्म के नाम पर पाखंड के विरुद्ध आवाज
धर्म और मजहब के नाम पर होने वाले पाखंड से ग़ज़लकार असहमत हैं। उनका स्वर कबीर की परंपरा से संवाद करता दिखाई देता है—
मजहब-धरम के कारगुजारी के हाय-हाय।
मुल्ला के हाय-हाय, पुजारी के हाय-हाय।।
आज के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण पर टिप्पणी करते हुए वे सवाल करते हैं—
मजहब-धर्म के नाम का नफरत का विष है।
ई आज के सवाल बा लमहर जमीन पर।।
जौहर की दृष्टि में धार्मिक पहचान से अधिक महत्त्व मनुष्यता का है। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों में बार-बार प्रेम, परहित और मानव धर्म की बात आती है—
सांच अतने बा कि परहित ह धरम के जौहर।
प्रीत के रीत मोहब्बत जगा के खेलऽ।।
और—
मजहब-धरम से ऊंच है मानव धर्म की बात।
अब ले बा रउवा मन में कटारी के मोल-भाव।।
आदमियत का सवाल
‘रंगमहल’ की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक है—आदमियत की तलाश। आधुनिक समाज में बढ़ती संवेदनहीनता पर ग़ज़लकार का व्यंग्य बेहद मार्मिक है—
खोजलीं काल्ह गांव में, शहर में हम।
लोग शहरी मिलल, आदमी ना मिलल।।
एक दूसरी रचना में वे कहते हैं—
आदमियत बा आदमी में अब।
ईद के नू चांद हो गइल।।
और आगे—
हो गइल आदमी जानवर।
ई रपट हम लिखाईं कहां।।
इन पंक्तियों में आज के समय की सबसे बड़ी त्रासदी दिखाई देती है—मनुष्य का तकनीकी और भौतिक रूप से आगे बढ़ना, लेकिन मानवीय संवेदना में पीछे छूट जाना।
मनुष्य की शक्ति और कर्म का विश्वास
जौहर केवल सामाजिक विसंगतियों की आलोचना नहीं करते, बल्कि मनुष्य को अपनी परिस्थितियों को बदलने के लिए प्रेरित भी करते हैं—
दुख-सुख साइत, सांचे चाक।
रोज समय के नाचे चाक।।
जइसन चाहीं, वइसन गढ़लीं।
हाथे में रउवा बाटे चाक।।
यहां चाक जीवन का रूपक बन जाता है। मनुष्य स्वयं अपने जीवन को अपनी इच्छानुसार आकार दे सकता है। यह दृष्टि संग्रह को निराशा का दस्तावेज बनने से रोकती है।
राष्ट्र और समाज के प्रति प्रतिबद्धता
जौहर की ग़ज़लों में राष्ट्रप्रेम भी दिखाई देता है। देश के लिए समर्पण की भावना को वे इस तरह व्यक्त करते हैं—
ओकरे पथ पर आंख बिछाईं, अर्पित कर पूजा के फूल।
देश के नइया जान पर खेली, जे भी पार उतारे नांव।।
यह राष्ट्रभक्ति किसी आक्रामक राष्ट्रवाद की नहीं, बल्कि समर्पण और सेवा की भावना से जुड़ी है।
गांव, गरीबी और पलायन की पीड़ा
‘रंगमहल’ का एक महत्वपूर्ण पक्ष ग्रामीण जीवन है। ग़ज़लकार गांव की गरीबी, भूख और अभाव को बहुत करीब से देखते हैं—
भूख से केल्हवा काटत लइका, माड़ के झगड़ा ठांव के लोग।
जेठ के तलफत दुपहरिया में, छप्पर पर खपड़ा नरिया में।
खून-पसीना एक बनाके, अधपेटा बा गांव के लोग।।
इन पंक्तियों में गांव का वह चेहरा सामने आता है, जो विकास के चमकते आंकड़ों से अक्सर छूट जाता है।
पलायन की पीड़ा भी उनकी ग़ज़लों में मार्मिक रूप से दर्ज है—
गांव के छोड़ के हम त अइलीं शहर।
का मिलल, बस किराया के दमघोंटू घर।।
गांव से शहर की ओर पलायन करने वाला व्यक्ति केवल भौगोलिक दूरी तय नहीं करता, बल्कि अपने सामाजिक परिवेश, रिश्तों और पहचान से भी दूर होता जाता है। जौहर इस पीड़ा को बहुत सहजता से शब्द देते हैं।
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वे गांव को भारत की आत्मा के रूप में देखते हैं—
भारत देश हऽ गांव के।
तबहूं ना केहू साजल गांव।।
यहां ग्रामीण विकास के प्रति हमारी उपेक्षा पर गंभीर सवाल खड़ा होता है।
गरीब और व्यवस्था की विडंबना
गरीब को हर व्यवस्था में सबसे कमजोर कड़ी के रूप में देखा जाता है। ग़ज़लकार इस विडंबना को तीखे अंदाज में दर्ज करते हैं—
हर युग आ हर चाल के चेहरा बनल गरीब।
बाटे धरन न्याय के बकरा बनल गरीब।।
नौकरशाही पर भी उनका व्यंग्य कम प्रभावशाली नहीं है—
नगरी-नगरी घूम के ‘जौहर’ देखत बानीं आंखिन से।
जनसेवक दरबार के मालिक, जनजीवन चौराहे पर।।
इन पंक्तियों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर आम आदमी की स्थिति पर सवाल उठता है।
राजनीति और बाजारवाद पर प्रहार
जौहर की ग़ज़लों में राजनीति के प्रति भी सजग और आलोचनात्मक दृष्टि है—
प्रेम-लता के नेह-कला में, श्रद्धा की गंगा नाच।
बाकी सियासत के दंगल में, होखत बा नंगा नाच।।
राजनीतिक जुमलों और खोखले वादों पर वे कहते हैं—
जुमला-बाजी आम भइल बा।
बातन में कुछ जान कहां बा।।
सियासत की अवसरवादी प्रवृत्तियों पर उनका व्यंग्य कई जगह तीखा हो जाता है। लेकिन यह तीखापन व्यक्तिगत आक्रोश नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकार से पैदा हुआ है।
साहित्य और शिक्षा पर बढ़ते बाजारवाद को भी ग़ज़लकार ने नहीं छोड़ा है—
विद्वान के कलम अब बिकाता बाजार में।
बिगड़ल बा चारु ओर दशा का लिखल गइल।।
और शिक्षा की स्थिति पर—
शिक्षा-दीक्षा आजकाल का।
बनिया के दुकान हो गइल।।
इन पंक्तियों में ज्ञान के बाजार में बदलने की चिंता स्पष्ट दिखाई देती है।
बदलता समाज और अपराध
समय के बदलते सामाजिक संबंधों पर भी जौहर की दृष्टि है—
नाता-रिश्ता, माया-मोह।
अब हो गइलें सकरा खंड।।
बढ़ते अपराध पर वे कहते हैं—
बढ़त जात रोजे निर्वाधऽ।
थम्हल कहां बाटे अपराधऽ।।
इन पंक्तियों में आधुनिक समाज की असुरक्षा और विघटन की चिंता दिखाई देती है।
प्रेम, विरह और ग़ज़ल की मूल संवेदना
ग़ज़ल मूलतः प्रेम की काव्य-विधा रही है और जौहर इस परंपरा से भी गहरे जुड़े हुए हैं। उनके यहां प्रेम केवल रोमांटिक अनुभूति नहीं, बल्कि जीवन का आधार है—
जेकरा मनवा पर पड़ल बा सुरतिया के छाप।
ओकरे दिलवा पर होई प्रीतिया के छाप।।
प्रेम की कोमल अनुभूति में वे लिखते हैं—
चांदनी गुदगुदावत रहल रात भर।
आग मन में लगावत रहल रात भर।।
कोरा सपना नयनवा में लचकत रहल।
नेह बेना डोलावत रहल रात भर।।
और प्रेम के अचानक जीवन में प्रवेश को वे इस तरह व्यक्त करते हैं—
दिल के धड़कन भइल बाटे तूफान जस।
मन के बगिया में अचके केहू आ गइल।।
प्रेम के साथ विरह स्वाभाविक रूप से आता है। जौहर के यहां विरह भी अत्यंत संवेदनशील रूप में सामने आता है—
दर्द के बदरा उमड़ल-घुमड़ल, गरजल हमरा आंखिन में।
सपना से जब अकुताइल मन, साजन आधी रात के बाद।।
विरह की पीड़ा को प्रकृति के प्रतीकों से जोड़ते हुए वे कहते हैं—
कबो लोर बिरहा के, पतझर के साखी।
कबो गंगा-यमुना के जल बन के आइल।।
पपीहा के बोली ना, बिरहा के भावे।
कोइलिया के कुहुकल, गरल बन के आइल।।
भाषा और शिल्प की सहजता
जौहर की ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा की सहजता है। उन्होंने कठिन शब्दावली या विद्वत्ता के प्रदर्शन के बजाय लोकभाषा, मुहावरों और प्रतीकों का सहारा लिया है। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें सीधे लोकमानस से संवाद करती हैं।
चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह का यह कथन यहां प्रासंगिक है कि साहित्य में शब्द और वाक्य केवल पहनावा हैं, शरीर नहीं; बात को संकेत और इशारे में कहना अधिक प्रभावी होता है। जौहर की ग़ज़लों में इस दृष्टि का सुंदर निर्वाह दिखाई देता है।
ठेठ भोजपुरी मुहावरों के रंग में रंगी उनकी सांकेतिक और प्रतीकात्मक शैली ग़ज़ल को लोकजीवन से जोड़ती है। लोक-संवेदना से यह गहरा जुड़ाव ही जौहर की ग़ज़लों की विशिष्ट पहचान बनकर सामने आता है।
विरोध है, लेकिन विद्रोह में भी शालीनता
जौहर की ग़ज़लों में विरोध है, विद्रोही तेवर है, लेकिन यह विद्रोह अराजक नहीं है। वे बगावत के बजाय बदलाव के पक्षधर हैं। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विसंगतियों पर सवाल उठाते हुए भी उनका स्वर मानवीय और संयमित रहता है।
वे परिवर्तन की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं—
सांच पर बा आंच, खाली जी-हुजूरी बा इहां।
चाहे जइसे होखे, परिवर्तन जरूरी बा इहां।।
लेकिन परिवर्तन के प्रति उनकी दृष्टि निराशावादी नहीं, बल्कि आशावादी है—
अन्हरिया रात लंबा चाहे, जतना भी घना होखे।
फजिर होई, चढ़ी सूरज, उजाला ताजगी तय बा।।
यही आशावाद ‘रंगमहल’ को केवल शिकायतों का संग्रह बनने से बचाता है।
परंपरा से संवाद, अपनी अलग तासीर
तुलसी, कबीर, रहीम, रसखान और सूर के काव्य का रस तथा दुष्यंत की ग़ज़लों की सामाजिक चेतना जौहर की रचनाओं में कहीं न कहीं दिखाई देती है। लेकिन उनकी ग़ज़लों की अपनी अलग तासीर है।
उनके यहां कबीर जैसा सवाल है, सूफियों जैसा प्रेम है, लोकजीवन की सहजता है और आधुनिक समय की विडंबनाओं पर दुष्यंत जैसी सामाजिक दृष्टि है। फिर भी जौहर किसी की अनुकृति नहीं बनते। उनकी भाषा, भोजपुरी लोक-संवेदना और जीवनानुभव उन्हें एक अलग रचनात्मक पहचान देते हैं।
डॉ. अर्जुन तिवारी ने ‘रंगमहल’ को ‘भोजपुरी ग़ज़ल का ताजमहल’ कहा है। इस संग्रह से गुजरने के बाद इस कथन में अतिशयोक्ति की गुंजाइश बहुत कम दिखाई देती है। ग़ज़लों की कसी हुई बुनावट, सहज भाषा, संक्षिप्तता और गहरे अर्थ पाठक को अपने साथ बांधे रखते हैं।
छोटी-छोटी ग़ज़लों में बड़ी-बड़ी बातें कह देना जौहर की विशेषता है। उनकी ग़ज़लें प्रवाहमयी हैं और उनमें पठनीयता बनी रहती है। वे जिंदगी के दृश्य और परिदृश्य खोलती हैं—कभी प्रेम के, कभी विरह के, कभी गांव के, कभी राजनीति के, कभी भूख के और कभी मनुष्य की तलाश के।
‘दीवाने जौहर बनाम रंगमहल’ को केवल ग़ज़ल-संग्रह के रूप में पढ़ना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह संग्रह दरअसल जिंदगी के विविध रंगों का दस्तावेज है। इसमें सूफियाना प्रेम है तो सामाजिक सरोकार भी; आध्यात्मिकता है तो यथार्थ की कठोर जमीन भी; गांव की मिट्टी है तो शहर की घुटन भी; प्रेम की कोमलता है तो व्यवस्था पर तीखा प्रहार भी।
जौहर शाफियाबादी ने भोजपुरी ग़ज़ल को लोकजीवन से जोड़ते हुए यह साबित किया है कि भोजपुरी में भी जीवन के बड़े सवालों को गंभीरता, सौंदर्य और कलात्मकता के साथ अभिव्यक्त किया जा सकता है। उनकी ग़ज़लें केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि अपने आसपास की जिंदगी को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती हैं।
ग़ज़लकार का आत्मविश्वास—
भोजपुरी में हमरो बा।
‘गालिब’ जइसन चोख ग़ज़ल।।
‘रंगमहल’ की ग़ज़लों से गुजरने के बाद सहज ही स्वीकार करना पड़ता है। संग्रह में मौजूद ग़ज़लें स्वयं इसकी सबसे बड़ी गवाह हैं। ‘रंगमहल’ सचमुच जिंदगी के रंगों, संवेदनाओं, सवालों और उम्मीदों का ऐसा काव्यलोक है, जहां जौहर की सूफियाना दृष्टि भोजपुरी ग़ज़ल को एक विशिष्ट ऊंचाई प्रदान करती है।
पुस्तक : दीवाने जौहर बनाम रंगमहल
विधा : ग़ज़ल
ग़ज़लकार : डॉ. जौहर शाफियाबादी
प्रकाशक : शिवालिक प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 300 रुपये

