भोजपुरी में हैं दर्जनों शब्दकोश, कृषि से लेकर लोकजीवन तक की समृद्ध शब्द संपदा का भंडार

Date:

अष्टम अनुसूची में भोजपुरी को शामिल करने के विरोध में उठ रहे सवालों का जवाब: शब्दकोश और साहित्यिक समृद्धि पर भोजपुरी का पक्ष

Bhojpuri24.com, विशेष। भोजपुरी को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल करने की मांग के बीच समय-समय पर इस भाषा को लेकर कई सवाल और आरोप भी उठाए जाते रहे हैं। इनमें एक प्रमुख तर्क यह दिया जाता है कि भोजपुरी में पर्याप्त शब्दकोश और भाषाई संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। भोजपुरी भाषा के पक्षकारों का कहना है कि यह आरोप वास्तविक तथ्यों से परे है। भोजपुरी में लंबे समय से शब्दकोश निर्माण, भाषाई शोध और शब्द संपदा के संरक्षण का कार्य होता रहा है।

भोजपुरी भाषा एवं संस्कृति के जानकारों के अनुसार, अष्टम अनुसूची में शामिल होने के लिए भोजपुरी की भाषाई क्षमता, साहित्यिक परंपरा और शब्द संपदा पर सवाल उठाना उचित नहीं है। उनका कहना है कि भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की लोक परंपरा, सामाजिक अनुभव और समृद्ध शब्द भंडार वाली भाषा है।

हिंदी शब्दकोशों में भी शामिल रहे भोजपुरी के शब्द

भाषाविदों के अनुसार हिंदी के प्रारंभिक शब्दकोशों के निर्माण में भी भोजपुरी सहित हिंदी पट्टी की लोकभाषाओं से शब्द लिए गए हैं। हिंदी का पहला प्रमुख शब्दकोश वर्ष 1922 से 1929 के बीच तैयार हुआ था, जिसके मुख्य संपादक बाबू श्याम सुंदर दास थे। इस शब्दकोश में देशज शब्दों को स्थान दिया गया, जिनमें भोजपुरी क्षेत्र के अनेक शब्द भी शामिल थे।

ये भी पढ़ें- क्या भोजपुरी की जड़ ऋग्वेद तक? शोध में सामने आए भाषा के हजारों साल पुराने प्रमाण

भोजपुरी समाज की विविधता और पेशागत परंपराओं ने इसकी शब्द संपदा को और समृद्ध किया है। कृषि प्रधान समाज होने के कारण भोजपुरी में खेती-किसानी से जुड़े हजारों शब्द मौजूद हैं। इसके अलावा लोककलाओं, रीति-रिवाजों, पारंपरिक व्यवसायों और सामाजिक जीवन से जुड़ी विशिष्ट शब्दावलियां भी भोजपुरी की भाषाई संपन्नता को दर्शाती हैं।

भोजपुरी में तैयार हुए हैं कई महत्वपूर्ण शब्दकोश

भोजपुरी में शब्दकोश निर्माण की एक लंबी परंपरा रही है। भाषा विशेषज्ञों के अनुसार भोजपुरी के प्रमुख शब्दकोशों में शामिल हैं-

ये भी पढ़ें- भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में मिले स्थान, तो बदल सकती है करोड़ों लोगों की तकदीर
  • भोजपुरी शब्दकोश – मिस एल. सेंट जोसेफ, मिशनरी हाउस, मोतिहारी (1940)। इसमें लगभग साढ़े तीन सौ भोजपुरी शब्दों और उनके अर्थों का संग्रह है।
  • कृषिकोश (प्रथम और द्वितीय खंड)– डॉ. विश्वनाथ प्रसाद, श्रुति देव शास्त्री एवं राधा बल्लभ शर्मा के संपादन में प्रकाशित। इसमें कृषि से जुड़े शब्दों का संग्रह किया गया।
  • भोजपुरी-हिंदी कोश– ब्रज बिहारी कुमार (1978)। इसे भोजपुरी का पहला विस्तृत कोश माना जाता है, जिसमें लगभग दस हजार शब्द शामिल हैं।
  • भोजपुरी शब्द संपदा– डॉ. हरदेव बाहरी (1981)। इसमें ठेठ भोजपुरी के हजारों शब्दों का संकलन किया गया है।
  • भोजपुरी शब्द सागर -सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी एवं ब्रज किशोर दुबे (1983)। इसमें लगभग तीस हजार शब्दों का संग्रह है।
  • भोजपुरी-हिंदी कोश -पं. गणेश चौबे, डॉ. उमाशंकर सिंह एवं डॉ. ब्रजभूषण मिश्र द्वारा संपादित (1998)। इसमें लगभग बीस हजार लोकप्रचलित भोजपुरी शब्दों को शामिल किया गया है।
  • सरल भोजपुरी शब्दकोश– शिवभजन प्रसाद ‘वैरागी’ (2004)।
  • भोजपुरी-हिंदी-अंग्रेजी लोक शब्दकोश -अरविंद कुमार, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा (2009)।
  • भोजपुरी-हिंदी शब्दकोश– चंदेश्वर परवाना (2023)।
  • प्रज्ञा भोजपुरी-भोजपुरी-नेपाली-अंग्रेजी शब्दकोश -प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू (2016)।
  • भोजपुरी-हिंदी-अंग्रेजी कोश– डॉ. अरुणाचल नीरज के संपादन में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली (2018)।

भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि इन शब्दकोशों की मौजूदगी यह साबित करती है कि भोजपुरी में भाषाई संसाधनों का अभाव नहीं है।

ये भी पढ़ें- विश्व मंच पर बुलंद भोजपुरी, संविधान में अब भी क्यों नहीं मिली जगह?

मुहावरों और लोककथनों की भी समृद्ध परंपरा

भोजपुरी की शब्द संपदा केवल शब्दकोशों तक सीमित नहीं है। इसमें कहावतों, मुहावरों और लोकोक्तियों की भी समृद्ध परंपरा मौजूद है। डॉ. मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध’ की पुस्तक ‘भोजपुरी लोकोक्तियां और मुहावरे’ तथा डॉ. शशि शेखर तिवारी की ‘भोजपुरी कहावतें’ जैसी कृतियां भोजपुरी लोकज्ञान और भाषाई समृद्धि का प्रमाण हैं।

भोजपुरी के समर्थकों का कहना है कि किसी भाषा की समृद्धि केवल सरकारी मान्यता से तय नहीं होती, बल्कि उसके साहित्य, शब्द भंडार, लोक परंपरा और सामाजिक प्रयोग से होती है।

ये भी पढ़ें- भोजपुरी के पास है आठवीं अनुसूची में शामिल होने ले लिए समृद्ध व्याकरण परंपरा, विरोध गलत

सिर्फ भोजपुरी से ही क्यों मांगे जाते हैं अतिरिक्त प्रमाण?

भोजपुरी समर्थकों का सवाल है कि जब बोडो, संथाली, डोगरी जैसी भाषाओं को अष्टम अनुसूची में शामिल किया गया, तब क्या इन भाषाओं के पास भोजपुरी के समान या उससे अधिक विकसित शब्दकोश, व्याकरण और साहित्य उपलब्ध था? उनका कहना है कि किसी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने के लिए मानक एक समान होने चाहिए।

भोजपुरी भाषा के पक्षकारों का तर्क है कि भोजपुरी में व्याकरण, शब्दकोश, साहित्य, लोकपरंपरा और आधुनिक लेखन की मजबूत परंपरा मौजूद है। इसलिए केवल संसाधनों की कमी का तर्क देकर भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता से दूर रखना उचित नहीं है।

भोजपुरी की मांग: भाषा को मिले संवैधानिक सम्मान

भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से चली आ रही है। समर्थकों का कहना है कि संवैधानिक मान्यता मिलने से भोजपुरी के संरक्षण, शोध, शिक्षा और विकास को नई दिशा मिलेगी।

उनके अनुसार भोजपुरी केवल करोड़ों लोगों की बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और लोक चेतना की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। शब्दकोश, साहित्य और भाषाई संसाधनों की उपलब्धता इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी एक समृद्ध और सक्षम भाषा है।

1 COMMENT

  1. बहुत ढंग से मेरी बातों को रखने के लिए आभार।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

लोकगीतों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली बिहार कोकिला विंध्यवासिनी देवी

पल्लवी कश्यप की रिपोर्ट Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला...

डॉ. सुनील कुमार पाठक: भोजपुरी साहित्य को वैचारिक ऊंचाई देने वाले साहित्य साधक

Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला 'भोजपुरी धुरंधर' में आज परिचय...