भाषा आयोग, नेपाल के अध्यक्ष रहे भाषाविद् डॉ. गोपाल ठाकुर के शोध में भोजपुरी भाषा की प्राचीनता से जुड़े कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण सामने आए हैं। उनके शोध-पत्र ‘भोज, भोजपुर आ भोजपुरी : प्राचीनतम दस्तावेजीकरण’ में ऋग्वेद, प्राचीन अभिलेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर भोजपुरी के विकास और उसके इतिहास का विश्लेषण किया गया है। यह शोध भाषालोक शोध-पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। आइए, इस शोध के प्रमुख तथ्यों को विस्तार से जानें।
क्या भोजपुरी सिर्फ कुछ सौ साल पुरानी भाषा है? क्या इसका इतिहास केवल भोजपुर जिले से शुरू होता है? या फिर इसकी जड़ें भारतीय सभ्यता के सबसे प्राचीन ग्रंथों तक फैली हुई हैं?
भोजपुरी भाषा को लेकर हुए एक महत्वपूर्ण भाषावैज्ञानिक शोध ने कई पुराने सवालों के नए जवाब दिए हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि भोजपुरी केवल एक आधुनिक लोकभाषा नहीं, बल्कि उसकी भाषाई संरचना और सांस्कृतिक पहचान हजारों वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा का परिणाम है। इतना ही नहीं, शोध में ऋग्वेद, प्राचीन ताम्रपत्रों, अपभ्रंश साहित्य और 18वीं शताब्दी के दस्तावेजों तक के प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं, जो भोजपुरी के विकास की कहानी को नई दिशा देते हैं।
भोजपुरी आखिर कितनी पुरानी है?
आज तक अधिकांश लोग यही मानते रहे हैं कि भोजपुरी का नाम बिहार के भोजपुर जिले से पड़ा और इसका विकास मध्यकाल में हुआ। यह बात काफी हद तक सही भी है, लेकिन नया शोध बताता है कि भोजपुरी नाम भले बाद में प्रचलित हुआ हो, इसकी भाषाई संरचना उससे कहीं अधिक प्राचीन है।
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शोध के अनुसार भोजपुरी हिंद-यूरोपीय भाषा परिवार की नई इंडो-आर्य शाखा की महत्वपूर्ण भाषा है। यह नेपाल के मधेश, बागमती, गंडकी और लुंबिनी क्षेत्रों से लेकर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों तक बोली जाती है। करोड़ों लोगों की मातृभाषा होने के बावजूद इसके इतिहास पर अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है।
भोजपुर से पड़ा भोजपुरी नाम
जॉन बीम्स, जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन, उदय नारायण तिवारी तथा आचार्य रामदेव त्रिपाठी सहित अब तक के अधिकांश विद्वानों की सहमति है कि वर्तमान भारत के बिहार राज्य के भोजपुर जिले में स्थित भोजपुर नगर, जो कभी भोजवंशी राजाओं की राजधानी था, उसी के नाम पर इस विशाल भाषा का नाम ‘भोजपुरी’ पड़ा।
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हालांकि, इनमें से किसी भी विद्वान ने इसके नामकरण का सटीक काल नहीं बताया है। बीम्स, ग्रियर्सन और तिवारी के विवरण से यह संकेत मिलता है कि यह घटना मध्यकाल में हुई, जब मालवा के भोजवंशी ‘उज्जैनी’ राजपूतों ने 10वीं शताब्दी में चेरो शासकों को पराजित कर वहां अपना शासन स्थापित किया।
इस प्रकार भोजवंशी राजाओं के नगर ‘भोजपुर’ के नाम में ‘-ई’ प्रत्यय जुड़ने से ‘भोजपुरी’ और ‘-इआ’ प्रत्यय जुड़ने से ‘भोजपुरिया’ शब्द बने। इस बात पर विद्वानों में सामान्य सहमति है।
‘भोजपुरी’ और ‘भोजपुरिया’ दोनों शब्दों का प्रयोग भाषा के संदर्भ में होता है, लेकिन ‘भोजपुरिया’ शब्द का प्रयोग अधिकतर भोजपुर क्षेत्र के निवासियों या भोजपुरी बोलने वाले लोगों के लिए किया जाता है।
कुछ लोगों का मानना है कि ‘भोजपुरिया’ शब्द का प्रयोग कभी-कभी निरादर के भाव में होता है, लेकिन यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। जिस प्रकार कोलकाता से ‘कोलकातिया’ और जनकपुर से ‘जनकपुरिया’ शब्द बनते हैं और उन्हें अपमानजनक नहीं माना जाता, उसी तरह ‘भोजपुरिया’ शब्द को भी निरादर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
वैदिक काल तक पहुंचती है भाषा की यात्रा
शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि भोजपुरी की भाषाई जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं। अलग अलग शोधकर्ताओं के अनुसार सबसे पहले प्रथम प्राकृत और फिर वैदिक भाषा और संस्कृत का। इसके बाद द्वितीय प्राकृत, पाली, अपभ्रंश और अवहट्ट जैसी भाषाई अवस्थाओं से होते हुए आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ। भोजपुरी भी इसी विकास क्रम का हिस्सा है। यानी भोजपुरी अचानक पैदा हुई भाषा नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों के भाषाई विकास और परिवर्तन का परिणाम है।
ऋग्वेद में मिलता है ‘भोज’ शब्द
शोध में ऋग्वेद के कई मंत्रों का उल्लेख किया गया है, जिनमें ‘भोज’ शब्द का प्रयोग मिलता है। इन मंत्रों में ‘भोज’ शब्द का अर्थ दानी राजा, यजमान या संरक्षक के रूप में किया गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यही ‘भोज’ आगे चलकर भोजपुर और फिर भोजपुरी की ऐतिहासिक पहचान का आधार बना। हालांकि यह दावा नहीं किया गया कि ऋग्वेद में सीधे ‘भोजपुरी’ शब्द मिलता है, लेकिन यह अवश्य कहा गया है कि भोज समुदाय और उसके सांस्कृतिक क्षेत्र का उल्लेख अत्यंत प्राचीन है।
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ताम्रपत्र में भी दिखती है भोजपुरी की झलक
शोध में गोरखपुर के पास मिले प्रसिद्ध सोहगौरा ताम्रपत्र का भी विश्लेषण किया गया है। यह ताम्रपत्र भारतीय इतिहास के सबसे पुराने अभिलेखों में माना जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार इसमें प्रयुक्त कुछ व्याकरणिक संरचनाएं आज की भोजपुरी से काफी मिलती-जुलती हैं।
जैसे बहुवचन और विभक्ति के कुछ रूप भोजपुरी की वर्तमान संरचना से मेल खाते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि भोजपुरी की कई व्याकरणिक विशेषताएं बहुत प्राचीन हैं।
अपभ्रंश साहित्य में भी मिलते हैं प्रमाण
शोध में बताया गया है कि सिद्ध और नाथ परंपरा के संतों की रचनाओं, पंडित दामोदर की रचनाओं, ज्योतिरीश्वर ठाकुर के “वर्णरत्नाकर” तथा विद्यापति की कृतियों में भोजपुरी के प्रारंभिक स्वरूप की झलक मिलती है। इन साहित्यिक कृतियों से यह स्पष्ट होता है कि भोजपुरी बोलचाल की भाषा के रूप में काफी पहले विकसित हो चुकी थी।
1781 का दस्तावेज देता है बड़ा प्रमाण
भोजपुरी नाम के दस्तावेजी प्रमाणों को लेकर शोध में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखा गया है। आमतौर पर कुछ विद्वान भोजपुरी भाषा के उल्लेख के लिए 1789 का संदर्भ देते रहे हैं, लेकिन शोध के अनुसार 1781 में ही ‘भोजपुरी जुबान’ शब्द का उल्लेख मिलता है। यह संदर्भ वॉरेन हेस्टिंग्स और बनारस के राजा चेत सिंह के बीच हुए संघर्ष से जुड़ा है। उस समय लिखे गए विवरण में ‘भोजपुरी जुबान’ शब्द का प्रयोग किया गया है।
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यह उल्लेख मोती चंद की पुस्तक ‘काशी का इतिहास’ में भी मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि 18वीं शताब्दी तक भोजपुरी अपनी अलग भाषाई पहचान बना चुकी थी और इसे एक विशिष्ट भाषा के रूप में पहचाना जाने लगा था।
भाषा नहीं, पूरी संस्कृति है भोजपुरी
भोजपुरी केवल बोलचाल का माध्यम नहीं है। इसके साथ लोकगीत, लोकनाट्य, बिरहा, कजरी, चैता, सोहर, विवाह गीत, निर्गुण, भक्ति साहित्य और लोक परंपराओं का विशाल संसार जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि आज मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, गुयाना और नेपाल सहित दुनिया के कई देशों में भोजपुरी सांस्कृतिक पहचान का माध्यम बनी हुई है।
शोध क्यों है महत्वपूर्ण?
भाषाविज्ञान में किसी भाषा की प्राचीनता केवल लोकविश्वास से तय नहीं होती। उसके लिए लिखित दस्तावेज, अभिलेख, साहित्य, व्याकरण और ध्वनि संरचना जैसे प्रमाण जरूरी होते हैं। यह शोध इन्हीं प्रमाणों के आधार पर भोजपुरी के इतिहास को समझाने का प्रयास करता है। इससे भविष्य में भोजपुरी पर और गंभीर शोध का रास्ता खुल सकता है।
भोजपुरी को चाहिए अकादमिक सम्मान
आज भोजपुरी करोड़ों लोगों की मातृभाषा है, लेकिन उच्च शिक्षा, शोध और सरकारी संस्थानों में अभी भी इसे वह स्थान नहीं मिला है जिसकी वह हकदार है। यदि इस तरह के शोध लगातार सामने आते रहे, तो भोजपुरी को केवल लोकभाषा नहीं बल्कि एक समृद्ध ऐतिहासिक और वैज्ञानिक भाषा के रूप में नई पहचान मिल सकती है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह समाज की स्मृति, संस्कृति और इतिहास को भी संजोकर रखती है। भोजपुरी का इतिहास जितना गहराई से सामने आएगा, उतना ही उसकी वैश्विक पहचान मजबूत होगी।


मेरे आलेख की काफी हद तक समीचीन समालोचनाई दृष्टि को अभिनंदन करता हूँ।
इस उपलब्धि के लिए भाषाविद् डा .
गोपाल ठाकुर को तहे दिल से हार्दिक
बधाई और शुभकामनाएं।
आदरणीय श्री गोपाल ठाकुर जी को इस शोध के लिए हार्दिक बधाई ।
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