सवाल बा भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता अब ले काहे ना ? दोषी के ?

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कनक किशोर, राँची ( झारखंड )

जन कवि विजेंद्र अनिल के एगो कविता के लाइन ह- ‘लाली हम भोर के, गीत हम अंजोर के’। जन कवि के पांच दशक पहिले के सपना के भोर के लाली आ अंजोर आजु ले ना भेंटाइल ओह लोगिन के, जेकरा खातिर गीत लिखले रहन। आजुओ अन्हरिया उन्हीं लोगिन के घर-आंगन में बइठल बा, जे शुकवा उगे के इंतजार करत बा।

भोजपुरी भाषा के संवैधानिक मान्यता के सवाल के हाल आजु कुछ अइसने बा। पांच दशक पहिले शुरू भइल भोजपुरी मान्यता के आंदोलन राजनीति के जाल में अइसन अझुराइल बा कि भोजपुरी माई के आंचर मान्यता के लाली से ना रंगाइल। संवैधानिक मान्यता के अंजोर भोजपुरी के आंगन में ना उतर पाइल।

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भाषा, संविधान के आठवीं अनुसूची, चौदह भाषा, बाइस भाषा के इतिहास पर बात ना करब, एहिजा सभे अवगत बा। भोजपुरी में सब कुछ रहत आठवीं अनुसूची में स्थान ना देल भोजपुरी आ भोजपुरिया समाज के साथ अन्याय बा।

एक लाइन में कहल चाहब त इहे कहे के पड़ी कि राजनीति आ स्वार्थ के शिकार भोजपुरी आजुओ संवैधानिक पहचान के मोहताज बा। अइसन काहे? के जिम्मेवार बा भोजपुरी के साथ सौतेला व्यवहार खातिर? पच्चीस करोड़ लोगिन के भाषा के मान्यता के आंदोलन काहे मंजिल पर ना पहुंच पावल? एह बिंदुअन पर विचार करे के होखी, इतिहास में भी झांके के होखी।

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सवाल बा-भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता अब ले काहे ना?

दोषी के?

ई दूनो सवाल विचारणीय बा। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मातृभाषा के महत्ता आ ओकर पहचान बचावे के उद्देश्य से मनावल जाला। मातृभाषा मनई के अस्तित्व आ अस्मिता के पहचान ह। मशहूर भाषाविद् नोम चॉम्स्की कहले बाड़ें कि भाषा मनई के अस्तित्व के मूल ह। आपन मातृभाषा में सबसे बढ़िया सोचल, समझल आ अभिव्यक्त करे के ताकत होला।

राजकीय पोषण के अभाव आ आपन भाषा के तिरस्कार, कवनो भाषा भा बोली के विलुप्ति के कगार पर ले जाए खातिर जिम्मेदार होला। राजकीय पोषण खातिर मान्यता जरूरी बा। एकरा खातिर प्रयास होत रहे के चाहीं, बाकिर मान्यता मिल जाए से भाषा के रातों-रात तकदीर ना बदल जाई। सूर, कबीर आ तुलसी के भाषा के कवन संवैधानिक मान्यता रहे? बाकिर आज हर भाषा ओकरा के अपना में समाहित करे खातिर लालायित बा। कवनो भाषा साहित्यिक दृष्टिकोण से समृद्ध रही, त ओकर पूछ हर काल में होई।

भोजपुरी के लगे बहुत कुछ अइसन बा, जे आज ना त काल राजसत्ता के बाध्य करी कि संवैधानिक मान्यता के पगड़ी भोजपुरी के माथे बाँधो। बाकिर भोजपुरी के मान्यता के लेके एह दिशा में हमनी के कइल गइल प्रयास यथेष्ट ना कहल जा सके। काहे कि सार्थक प्रस्तुति के कमी, लोक-जागरण के अभाव आ लोक-प्रतिनिधियन के चुप्पी रहल बा। ई बात स्वीकार करे में हिचक ना होखे के चाहीं।

दूसर बात, ‘आपन डफली, आपन राग’ बेसी बाजत बा। भोजपुरी माई के माथ से बेसी लोग अपना माथ पर पगड़ी बाँधे के होड़ में लागल बा। कुकुरमुत्ता जइसन रोज एगो नया संस्थान खड़ा हो जात बा, जे बगली में लेके घूमे वाला आदमी जइसन बा। हालत ई बा कि भेड़ से बेसी गड़ेरिया हो गइल बा। अइसना में आंदोलन बिखर जाला।

सरकार पर दोष लगावे से पहिले अपना भीतर झाँकल ठीक होई। तबे एह दूनो सवाल के जवाब अपने-आप सामने आ जाई।

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1969 में पहिला बेर मैथिली भाषी सांसद भोगेंद्र झा भोजपुरी के संवैधानिक दर्जा खातिर प्राइवेट मेंबर बिल संसद में ले अइले। का बिहार आ पूर्वांचल के भोजपुरी क्षेत्र से सांसद भा मंत्री ना रहलें, जे भोजपुरी के मान्यता के बात उठावे खातिर आगे आवतें? भारतीय राजनीति में बिहार आ पूर्वांचल के, देश आजाद भइला के बाद से, विशेष दखल रहल बा। संविधान निर्माता लोग में भी एह क्षेत्र के प्रतिनिधि रहलें। वरीय मंत्री आ प्रधानमंत्री के रूप में एह क्षेत्र के लोक प्रतिनिधियन के नाम संसद के इतिहास में दर्ज बा। बाकिर इतिहास एह बात के गवाह बा कि भोजपुरी के मान्यता के सवाल पर ओह लोग के चुप्पी बनल रहल।

अगर केहू एह मुद्दा के उठवले बा, त दोसरा के छोड़ दीं, कुछ अपना लोगे विरोध में खड़ा रहल बा। त बताईं, भोजपुरी के मान्यता के सवाल काहे ना लटकी? आजुओ कम-बेसी इहे हाल बा। भोजपुरी के उपयोग वोट लेवे आ सांसद बने खातिर जरूर हो रहल बा, बाकिर मान्यता के सवाल पर मुंह बंद बा। एह क्षेत्र के अधिकांश जनप्रतिनिधियन में भाषाई अस्मिता के भावना, एका-दुक्का अपवाद छोड़ दीं, कबो मजबूत ना रहल। एह चलते भोजपुरी के मान्यता के सवाल भोजपुरिया आम जन से व्यापक रूप से ना जुड़ पावल।

ओकरे नतीजा बा कि मैथिली, संथाली, डोगरी, बोडो, नेपाली, कोंकणी आ मणिपुरी जइसन अपेक्षाकृत कम संख्या में बोले जाए वाली भाषाएं संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल हो गइलें, बाकिर करीब बीस करोड़ लोगन के भाषा भोजपुरी, जेकर लगभग पंद्रह सौ बरिस के साहित्यिक इतिहास मौजूद बा, आजुओ अपना देश में संवैधानिक दर्जा के राह देखत बा। दूसर देश, जइसे नेपाल आ मॉरीशस, में भोजपुरी के मान्यता मिल चुकल बा, बाकिर अपना देश में भोजपुरी आजुओ उपेक्षित बा।

2012 में जगदंबिका पाल, सांसद के कॉलिंग अटेंशन मोशन पर तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम कहलें कि हम रउआ सभे के भावना समझत बानीं आ भोजपुरी के मान्यता देवे खातिर जल्दी बिल ले आईब। वर्तमान प्रधानमंत्री, जे भोजपुरी क्षेत्र से सांसद बानीं, आ सरकार के कुछ मंत्रीगण भोजपुरी मान्यता के झुनझुना चुनावी बिगुल के साथ बजवले, बाकिर नतीजा ढाक के तीन पात रहल।

सरकार पाहवा भा महापात्र समिति, जे भाषा के मान्यता खातिर गठित कइल गइल रहे, के प्रतिवेदन पर आजुओ कवनो निर्णय ना ले सकल। सूचना के अधिकार के तहत दिहल जवाब में ई स्वीकार कइल गइल बा कि भाषा के मान्यता खातिर कवनो तय मापदंड नइखे।

तब सवाल उठत बा कि भोजपुरी जइसन समृद्ध भाषा, जे मान्यता खातिर तय लगभग सभे शर्त पूरा करे में सक्षम बा, ओकरा के आज ले आठवीं अनुसूची में दर्जा काहे ना मिलल?

एह सत्य के खोज में झाँकल जाए त दू-तीन गो बात साफ-साफ सामने आवेली। पहिला, सरकारी तंत्र के अड़ंगाबाजी आ महापात्र समिति के रिपोर्ट के आड़ में भोजपुरी के मान्यता के सवाल आगे ना बढ़ पावल। दूसरका, हिंदी के कुछ तथाकथित विद्वानन के खुला विरोध, जिनकरा मन में ई डर घर कइले बा कि भोजपुरी के बढ़ावा मिले से हिंदी के विकास बाधित हो जाई। तीसरका, भोजपुरी के लिपि आ व्याकरण नइखे, जइसन काल्पनिक आ आधारहीन बातन के आड़ लेके मान्यता के राह में बाधा खड़ा कइल जात बा।

भोजपुरी के मान्यता खातिर भोजपुरी साहित्यकार आ भोजपुरी के अनेक संगठन अपना-अपना ढंग से, अपना गठन काल से ही हाथ-गोड़ मार रहल बाड़ें। कुछ धरातल पर काम करत बाड़ें, कुछ कागजी बाड़ें, त कुछ हवा में “हम केहू से कम नइखी” के तर्ज पर सक्रिय बाड़ें। ई सभे भोजपुरी के संवैधानिक दर्जा खातिर अपना-अपना ढंग से पाँच दशक से अधिक समय से आपन बात रखत आ रहल बा, बाकिर सरकार के कान पर जूं नइखे रेंगत।

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एहिजा एह सत्य के स्वीकार करे के पड़ी कि चाहे लोक प्रतिनिधियन के प्रयास होखे भा भोजपुरी के अनेक संगठनन के, ऊ भोजपुरिया जनता के असली आवाज ना बन पवले। इहे भोजपुरी मान्यता आंदोलन के सबसे कमजोर कड़ी ह। जब तक ई कड़ी मजबूत ना होई, तब तक सरकार भोजपुरी के ताकत ना समझी आ मान्यता खातिर फैलल हाथ सरकार के रहमो-करम पर निर्भर रही।

जेह दिन भोजपुरी के मान्यता के सवाल भोजपुरिया जनता के अस्तित्व आ अस्मिता से जुड़ जाई, आ एहके भीख ना, अधिकार समझ के मांगल जाई, ओह दिन सरकार घुटना टेक के, झुक के मान्यता भोजपुरिया समाज के हाथ पर रख दी। ई बात हम पूरा विश्वास के साथ कह सकीलें।

डॉ. जयकांत सिंह कहले कि जतना दोसर मान्यता प्राप्त भाषा के बोले वाला लोग बा, ओतने त भोजपुरी के संगठन आ पदाधिकारी के संख्या बा। अब राज्य भा केंद्र सरकार मान्यता देवे कि ना देवे, ई ओकरा पर निर्भर बा।

एहिजा इहो देखे के होई कि एह में काम करे वाला संस्था कवना-कवना बा आ खाली मुंह बजावे वाला कवना-कवना। एही से हम कहींला कि जतना भोजपुरिया संगठन आ पदाधिकारी लोग बा, अगर ओतने संख्या में भोजपुरी साहित्य पर व्याख्यान आयोजित कर दिहल जाव, त सरकार खुद बुला के मान्यता दे दी।

ई बात हम एह से कहींला कि ढोलक, तबला आ हारमोनियम पर संगत करे वाला संस्था कम बा, बाकिर भोजपुरी के साथे खाली झाल बजावे वाला लोग बेसी बा।

नाम केकर-केकर लिहीं? गंगाजल के हर बूंद जइसे पावन होला, ओसहीं भोजपुरी के मान्यता खातिर काम करे वाला, भोजपुरी संस्कृति के बढ़ावा देवे वाला हर मनई, साहित्यकार, कलाकार आ संगठन के काम पूज्य बा आ भोजपुरी समाज सबके खातिर आभारी बा।

भोजपुरी पत्रकारिता से जुड़ल सभे संपादक भोजपुरी के मान्यता के आंदोलन के अपना-अपना ढंग से शुरू से बढ़ावे के काम कइले बाड़ें आ आजुओ करत बाड़ें। अगर कुछ नाम गिनावल जरूरी होखी, त कहब कि भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता खातिर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, विश्व भोजपुरी सम्मेलन, भोजपुरी जन जागरण अभियानआखर आपन काम इमानदारी से अंजाम दे रहल बाड़ें।

कबीर आ गोरख के वंशज, भोजपुरी आ भोजपुरियत में अतना दम बा कि हमरा बिसवास बा, भोजपुरी अपना दम पर संविधान के आठवीं अनुसूची में आपन नाम जल्दी दर्ज करावे में सफल होखी।

बाकिर, अगर सरकार भोजपुरी के मान्यता के सवाल पर आन्हर-बहीर बनल रही, त अंगुरी टेढ़ करे के पड़ी। ओहू खातिर तइयार रहे के बा, काहे कि सीधा अंगुरी से घीव ना निकले।

कुंवर सिंह आ मंगल पांडे के धरती लाठी, गोली आ तलवारो से जवाब देवे जानेला। भोजपुरी के मान्यता खातिर बढ़ल हाथ भीख खातिर ना ह, बलुक अपना अधिकार खातिर बा। ई बात सरकारो के समझे के होखी। ना तऽ जे बा, से बा—भोजपुरिया हूंकार भरे खातिर तइयार बा। जय भोजपुरी।

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