गोरखपुर/पटना: आज जब दुनिया ‘मिनिमलिस्ट टैटू’ की बात करती है, तब भोजपुरी गोदना याद दिलाता है कि भारत ने यह कला हजारों साल पहले ही जी ली थी। भोजपुरी क्षेत्रों यानी पूर्वांचल, बिहार और झारखण्ड में गोदना सिर्फ शरीर का सजावट नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी पहचान, प्रतिरोध और स्मृति की अमिट किताब है। प्राचीन गुफा चित्रों से शुरू होकर आज कागज और कैन्वास पर पहुंची यह परंपरा, दादी की फीकी लकीरों से पोती की आधुनिक कलाई तक जीवित है, जहां शरीर पर गुदा चिन्ह अब सांस्कृतिक गर्व बन गया है।
माना जाता है कि गोदना की शुरुआत नियोलीथिक काल (लगभग 10,000 साल पहले) की गुफा चित्रकला से है। सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तियों और 200 ईसा पूर्व की भड़हुत स्तूप की स्त्री मूर्तियों में भी हाथों-चेहरों पर गोदना के निशान साफ दिखते हैं। भोजपुरी लोकगीतों में इसका सीधा जिक्र है परदेश गए पति से पत्नी कहती है, ‘अपनी सुरतिया मोरे बहियां पर लिखाय जाब’। यानी गोदना पति की याद, पहचान और सुरक्षा का प्रतीक था।
भोजपुरी-बिहारी क्षेत्र के धनुक, दुसाध, मलार और नटिन समुदायों में यह परंपरा खासतौर पर मजबूत रही। गरीबी में गहने न होने पर गोदना ही ‘स्थायी आभूषण’ बन गया। महिलाएं विवाह, प्रसव या किशोरावस्था जैसे जीवन चक्र के अवसरों पर इसे गुदवाती थीं। प्राकृतिक स्याही (काजल का धुआं + तेल) और सुई की जगह कांटे या सींक से बनाया जाता था। यह सजावट के साथ-साथ रोग निवारण और सुरक्षा का भी विश्वास था।
पहचान, प्रतिरोध और अमरता
भोजपुरी क्षेत्र में गोदना कई स्तरों पर काम करता था। ऊंची जातियों की नजर से बचाने के लिए कभी ‘विद्रूप’ रूप में इस्तेमाल होता, तो कभी पति की याद में ताकि बिछोह के दिनों में भी चेहरा साथ रहे। कुछ वर्गों में यह मृत्यु के बाद भी आत्मा के साथ जाने वाला ‘गहना’ माना जाता था। लोक मान्यताओं में कृष्ण ने राधा के हाथ पर नाम गुदवाया था, ऐसा भी जिक्र मिलता है। भोजपुर के खेतों में रोपनी गाते हुए गोदनारी (तट्टू करने वाली औरत) सुई चलाती और गीत गाती। यह मात्र सौंदर्य नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिरोध भी था, दलित और पिछड़े समुदायों ने इसे अपनी स्वतंत्र पहचान के रूप में अपनाया, जबकि ब्रिटिश काल में कैदियों की ब्रांडिंग से यह कलंकित भी हुआ। फिर भी लोक संस्कृति में यह जीवित रहा।
शरीर से कागज तक
आज भोजपुरी क्षेत्रों में पारंपरिक गोदना तेजी से कम हो रहा है। शहरों में माइग्रेशन, आधुनिक फैशन और सामाजिक दबाव ने इसे पीछे धकेला। लेकिन कुछ ही समुदाय की महिलाओं ने इसे नया रूप दिया है गोदना पेंटिंग। शरीर की लकीरें अब कागज, कपड़े और कैन्वास पर उतर रही हैं।
मधुबनी क्षेत्र से शुरू होकर भोजपुरी गांवों तक यह बदलाव चला। जहां पहले सुई से त्वचा चुभती थी, वहां अब ब्रश से काला-सफेद डिजाइन बनते हैं। युवा पीढ़ी इसे सांस्कृतिक गर्व के रूप में देख रही है। दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में भोजपुरी मूल की लड़कियां छोटे-छोटे गोदना मोटिफ्स को डिजिटल आर्ट या हल्के टैटू के रूप में अपना रही हैं लेकिन फैशन नहीं, विरासत के तौर पर।
स्मृति से सशक्तिकरण तक
कुशीनगर की 72 साल की फूलमती देवी अपने हाथ की फीकी लकीरें दिखाती हैं और कहती हैं, ‘एह गोदना में हमार इतिहास बा।’ उनकी पोती सोनम दिल्ली में ग्राफिक डिजाइनर है। दादी की फोटो देखकर उसने पहला भोजपुरी गोदना आर्ट बनाया। अब वह अपनी कलाई पर छोटा फुलवारी मोटिफ गुदवा चुकी है। यह कहानी सिर्फ गोदना की नहीं, भोजपुरी संस्कृति की जीवित धड़कन की है। प्राचीन गुफा से आधुनिक स्टूडियो तक, लकीरें मिटती नहीं, बस रूप बदलती हैं।

