त्रेता युग से जुड़ा है चैता के तार

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नई दिल्ली/पटना: भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में चैता (या चइता/चैती) सिर्फ एक मौसमी गीत नहीं बल्कि यह चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) की बसंत ऋतु, राम नवमी, प्रेम की लहर और बिछोह के दर्द की पूरी कहानी है। प्राचीन लोक परंपरा से शुरू होकर आज भी गांवों के खेतों, चैता उत्सवों और यूट्यूब ज्यूकबॉक्स में जीवित यह गीत प्रकृति की हरियाली, प्रेम की मिठास और विरह की पीड़ा को एक साथ गाता है। भोजपुरी भाषा में गाया जाने वाला यह अर्ध-शास्त्रीय लोकगीत हजारों साल पुरानी स्मृति को नए गायकों ने भी अपने स्वरों में जीवंत रखता है।

त्रेता युग से चैत्र मास तक
चैता गीतों की शुरुआत भोजपुरी क्षेत्र की लोक परंपरा में चैत्र मास से जुड़ी मानी जाती है। कुछ लोक मान्यताओं के अनुसार यह त्रेता युग से चली आ रही है, क्योंकि भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र मास में हुआ था। राम नवमी के अवसर पर राम कथा, सीता-राम विवाह और होली का जिक्र चैता गीतों में बार-बार आता है।
भोजपुर-बिहार के खेतों और गांवों में यह गीत महिलाओं द्वारा खेतों में काम करते हुए, घरों में या चैता उत्सव में गाया जाता था। यह कजरी, सोहर और फागुआ जैसी अन्य भोजपुरी लोक शैलियों से अलग है, बसंत की खुशी, फूलों की महक, कोयल की कूक और प्रेमी की याद को मिलाकर। ब्रिटिश काल और मध्यकाल में भी यह गीत जीवित रहा, क्योंकि यह प्रकृति और मानवीय भावनाओं का सीधा प्रतिबिंब था। विदुषी गिरिजा देवी जैसी शास्त्रीय गायिकाओं ने इसे अर्ध-शास्त्रीय रूप दिया, जिससे यह उपशास्त्रीय बंदिशों में शामिल हो गया।

प्रसिद्ध चैता गीत और उनके बोल
भोजपुरी चैता के सबसे लोकप्रिय गीतों में ‘हे रामा चइत महीनवा’ सदाबहार है। इसके बोल गहरी भावुकता से भरे हैं:
हे रामा चइत महीनवा
बहे लगल झिरी झिरी पुरवा बयार
लंबी कारी केसिया झरली लगाई तेल महकउआ
लाली बिंदिया सटली कजरा आँखी लहकउआ
हिया मोर डहके उठे हुकवा हजार
हे रामा चइत महीनवा
यह गीत बसंत की बहार और प्रेमी की अनुपस्थिति दोनों को दर्शाता है।
एक और प्रसिद्ध गीत ‘चैत मासे राम के जनमिया हो रामा’ राम कथा को लोक स्वर में गाता है, जो गांवों में राम नवमी पर खासतौर पर गाया जाता है। आधुनिक दौर में प्रमोद प्रेमी यादव और गोलू राजा जैसे गायकों ने चैता को नया रूप दिया जैसे ‘चइत में चोन्हाली’ या ‘खाटी देहाती चईता’। शारदा सिन्हा और कल्पना पटौरी जैसी गायिकाओं ने इसे शास्त्रीय छाप दी। ये गीत आज भी चैता उत्सवों और यूट्यूब पर लाखों बार सुने जाते हैं।

प्रेम, बिरहा और स्नेह की लहर
चैता गीतों का सबसे गहरा पहलू बिरहा (viraha) और स्नेह है। बसंत की ऋतु में प्रकृति खिल उठती है फूल, बयार, कोयल, लेकिन प्रेमी परदेश (मुंबई, दिल्ली) में होता है तो गांव की स्त्री का मन डहक उठता है। गीत में प्यार की मिठास, इंतजार का दर्द और मिलन की आस एक साथ झलकती है। यह स्नेह सिर्फ रोमांटिक नहीं, बल्कि पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका और राम-सीता जैसे दिव्य प्रेम का भी प्रतीक है। महिलाएं खेतों में रोपनी या घर के आंगन में गाती हुई अपनी उदासी को गीत में ढालती थीं। ‘सेजिया से सइयाँ रूठि गइले हो रामा’ जैसे बोल बिछोह की पीड़ा को इतना जीवंत बनाते हैं कि सुनने वाला खुद भावुक हो जाता है। चैता, लगाव/जुड़ाव का वह रूप है जो प्रकृति से प्रेम को जोड़ता है, बसंत का आगमन मानो प्रेमी की वापसी का संकेत हो।

गांव से स्टेज तक
आज भोजपुरी चैता लुप्त नहीं हुआ, बल्कि नया रूप ले रहा है। गांवों में चैता उत्सव अभी भी आयोजित होते हैं, जहां दादी-नानी पुराने गीत गाती हैं और युवा पीढ़ी मोबाइल पर खेसारी-पवन के वर्जन सुनती है। सोशल मीडिया और यूट्यूब ने इसे वैश्विक बना दिया, विदेश में बसे भोजपुरिया भी चैता सुनकर घर की याद ताजा करते हैं। यह गीत अब सिर्फ मौसमी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। आधुनिक गायक इसे डिजिटल बीट के साथ मिलाकर नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं, लेकिन मूल भाव, बसंत, प्रेम और राम भक्ति वही है। चैता याद दिलाता है कि भोजपुरी संस्कृति में संगीत जीवन का हिस्सा है खुशी हो या दर्द, गीत हमेशा साथ रहता है। यह कहानी चैता की नहीं, भोजपुरी दिल की धड़कन की है। चइत महीनवा आता है तो प्रकृति खिलती है, लेकिन चैता गीत सुनकर दिल भी खिल उठता है।

भोजपुरी चइता की अमर धुन
चैता की जड़ें भोजपुरी-पूर्वी लोकगीत में हैं, लेकिन इसे शास्त्रीय स्तर पर ऊंचा उठाने का श्रेय विदुषी गिरिजा देवी (1929-2017) को जाता है। वाराणसी की इस महान ठुमरी गायिका ने चैता को पुरब अंग गायकी का हिस्सा बनाया। उन्होंने ‘येही थैयां मोतिया हरय गइली हो रामा’ जैसी अमर चैती प्रस्तुत कीं, जिसमें लोक की मिट्टी और शास्त्रीय की सूक्ष्मता का अनोखा मेल था। गिरिजा देवी चैता को सिर्फ मौसमी गीत नहीं, बल्कि एक पूर्ण रागदारी वाली शैली मानती थीं।
इसी परंपरा में शोभा गुर्टू (1925-2004) ने भी चैता को अपने रेपर्टरी में शामिल किया। वाराणसी के पंडित छन्नूलाल मिश्रा ने चैता को लोक का स्वाद बनाए रखते हुए शास्त्रीय विरुवोसिटी दी। इन गायकों ने चैता को महफिलों और रेडियो से आगे ले जाकर इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

शारदा सिन्हा भोजपुरी लोकगीत की ‘ठुमरी क्वीन’ के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने चैता, कजरी, सोहर और छठ गीतों को अपनी मधुर आवाज दी। शारदा जी ने चैता को देहाती भावना के साथ गाया, जिससे गांव की महिलाओं की उदासी और बसंत की खुशी दोनों झलकती है। उनकी चैता प्रस्तुतियां आज भी सदाबहार मानी जाती हैं।
कल्पना पटौरी (कल्पना पटौरी) ने पुरवी, पचरा, कजरी, सोहर, विवाह गीत और चैता सभी शैलियों में गाया। चैता में उनका योगदान खास है क्योंकि उन्होंने पुरानी लोक शैली को संरक्षित रखते हुए नई पीढ़ी तक पहुंचाया। कल्पना पटौरी ने चैप्रहिया पुरवी शैली में भी महिलाओं के लिए रास्ता खोला, जो पहले पुरुष-प्रधान था। उनकी चैता गीतों में प्रेम, विरह और राम भक्ति का गहरा मेल सुनाई देता है।
गोलू राजा: चैता महा मुकाबला और ‘आईल चईतवा’ जैसे गीतों से मशहूर।
व्यास अरुण कुमार: पुराने सदाबहार चैता ज्यूकबॉक्स के साथ जाना जाता है।
विनय मिश्रा: भोजपुरी क्षेत्र में राम नवमी और चैता परंपरा को जीवित रखने वाले गायक। अन्य गायकों में प्रियंका, शिल्पी राज, समर सिंह, कविता यादव, अविनाश मगहिया आदि नए गायक चैता को आगे बढ़ा रहे हैं।

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