राजगीर का प्रसिद्ध मलमास मेला 17 मई से 15 जून तक आयोजित हो रहा है。 तीन साल में एक बार आने वाले इस भव्य मेले में शामिल होने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु बिहार के राजगीर पहुंचते हैं
पल्लवी कश्यप की रिपोर्ट
बिहार की पावन और ऐतिहासिक धरती पर बसे राजगीर का नाम सुनते ही जहन में आध्यात्म, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास की एक अद्भुत तस्वीर उभर आती है। पांच रमणीय पहाड़ियों से घिरा यह प्राचीन नगर कभी शक्तिशाली मगध साम्राज्य की राजधानी ‘राजगृह’ के नाम से जाना जाता था। यह वही पवित्र भूमि है जहां भगवान बुद्ध ने शांति का संदेश दिया, जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी ने कठिन तपस्या की और महाभारत काल में राजा जरासंध ने शासन किया। लेकिन राजगीर की वैभवशाली गाथा केवल इसके अतीत तक सीमित नहीं है। हर तीन वर्ष में एक बार यहां आयोजित होने वाला ऐतिहासिक ‘मलमास मेला’ पूरे देश की आस्था, लोक-संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है। मान्यता है कि इस विशेष अवधि में साक्षात 33 करोड़ देवी-देवता स्वर्ग लोक का परित्याग कर राजगीर की इस पावन धरा पर वास करते हैं। यही कारण है कि एक महीने तक चलने वाले इस महासमागम में देश के कोने-कोने से लाखों-करोड़ों श्रद्धालु, साधु-संत और सैलानी यहां खिंचे चले आते हैं। वे यहां के चमत्कारी गर्म जलकुंडों में डुबकी लगाते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति यानी मोक्ष की कामना करते हैं। बिहार सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए भी यह आयोजन राज्य के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सवों में से एक माना जाता है, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है।
हिंदू पंचांग में मलमास का महत्व और इसका खगोलीय आधार
धार्मिक दृष्टिकोण से मलमास को बेहद पवित्र और आत्म-शुद्धि का महीना माना जाता है। हिंदू पंचांग की गणना सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित होती है। सूर्य वर्ष लगभग 365 दिन और 6 घंटे का होता है, जबकि चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है। इस प्रकार हर साल दोनों कैलेंडरों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है। इसी समयांतराल को संतुलित और ठीक करने के लिए हर तीन साल में चंद्र महीने में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, जिसे ‘अधिक मास’, ‘मलमास’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है। चूंकि इस महीने में सूर्य की संक्रांति (एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) नहीं होती, इसलिए इसे मलमास नाम दिया गया। इस पूरे महीने में हिंदू धर्म में होने वाले तमाम मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत, गृह प्रवेश और नए व्यापार की शुरुआत पूरी तरह से वर्जित हो जाती है। हालांकि, भौतिक कार्यों के लिए निषेध होने के बावजूद आध्यात्मिक उन्नति के लिए इसे सर्वोत्तम माना गया है। इस दौरान किए गए जप, तप, दान-पुण्य और तीर्थ स्नान का फल आम दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी और अक्षय माना जाता है।
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पौराणिक कथा और भगवान विष्णु का वरदान
राजगीर में ही इस मेले के आयोजन के पीछे एक बेहद दिलचस्प और प्राचीन पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। शास्त्रों के अनुसार, जब समय की गणना को ठीक करने के लिए इस अतिरिक्त महीने का निर्माण हुआ, तो इसे ‘मलमास’ (दूषित महीना) कहकर पुकारा गया। स्वामीविहीन होने के कारण कोई भी देवी-देवता इस महीने का अधिपति बनने को तैयार नहीं थे और सर्वत्र इसकी निंदा होने लगी। इस बात से दुखी होकर मलमास ने भगवान विष्णु की शरण ली और अपनी व्यथा सुनाई। मलमास की पीड़ा देखकर भगवान नारायण ने उसे अपना अत्यंत प्रिय नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया और कहा कि अब से मैं ही इस महीने का स्वामी रहूंगा। इसके साथ ही भगवान विष्णु ने सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं के साथ यह वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति इस पुरुषोत्तम मास में राजगीर की पवित्र धरती पर आकर स्नान और ध्यान करेगा, उसे साक्षात बैकुंठ धाम की प्राप्ति होगी। माना जाता है कि तभी से इस मलमास की अवधि में सभी देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व और ऋषि-मुनि स्वर्ग छोड़कर राजगीर में वास करते हैं, और इसी के साथ इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत हुई।

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राजगीर के गर्म जलकुंड और उनका दिव्य रहस्य
मलमास मेले का सबसे प्रमुख और केंद्रीय आकर्षण राजगीर के प्राकृतिक गर्म जलकुंड हैं, जो श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का केंद्र हैं। इन कुंडों में सबसे पवित्र और बड़ा ‘ब्रह्मकुंड’ को माना जाता है, जिसका तापमान हमेशा लगभग 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। इसके अलावा यहां सप्तधारा, सूर्यकुंड, व्यासकुंड, मार्कंडेयकुंड और गंगा-यमुना कुंड जैसे कई पौराणिक जलस्रोत मौजूद हैं। कड़ाके की ठंड हो या सामान्य मौसम, इन कुंडों से हमेशा खौलता हुआ पानी निकलता रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र राजा बसु ने राजगीर में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था और उसी समय उन्होंने इन कुंडों का निर्माण करवाया था ताकि देवताओं को स्नान में कोई असुविधा न हो। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इन जलकुंडों का पानी बेहद खास माना जाता है, क्योंकि इसमें गंधक (सल्फर) की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। यही वजह है कि इन कुंडों में स्नान करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि त्वचा संबंधी रोग और गठिया जैसी कई शारीरिक बीमारियां भी हमेशा के लिए दूर हो जाती हैं।
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ऐतिहासिक पन्नों में दर्ज त्रिवेणी धर्मों की यह पावन भूमि
राजगीर केवल सनातनी आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह भारत के समृद्ध इतिहास और तीन महान धर्मों की साझा विरासत का एक जीवंत दस्तावेज है। प्राचीन काल में जरासंध की यह नगरी मगध साम्राज्य का गौरवशाली केंद्र थी। महाभारत काल में भीम और जरासंध के बीच हुआ ऐतिहासिक मल्ल युद्ध इसी धरती पर लड़ा गया था, जिसके साक्ष्य के रूप में ‘जरासंध का अखाड़ा’ आज भी यहां मौजूद है। इसके साथ ही, बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष राजगीर के ‘गृद्धकूट पर्वत’ पर व्यतीत किए थे और यहीं पर तथागत ने अपने शिष्यों को उपदेश दिए थे। भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध धर्म की ‘प्रथम संगीति’ (First Buddhist Council) का आयोजन भी राजगीर की ही सप्तपर्णी गुफा में हुआ था। वहीं दूसरी तरफ, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने भी इस पावन भूमि पर अपनी कठिन तपस्या की थी और चौदह वर्षावास व्यतीत किए थे। इस प्रकार, हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों का यह त्रिवेणी संगम राजगीर को वैश्विक स्तर पर एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक पर्यटन स्थल बनाता है।
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मेले में उमड़ता आस्था का सैलाब और साधु-संतों की छावनी
जैसे ही मलमास मेले का शंखनाद होता है, पूरी राजगीर नगरी भगवान विष्णु और महादेव के जयकारों से गुंजायमान हो उठती है। देश के कोने-कोने से विभिन्न अखाड़ों के नागा साधु, तपस्वी, महामंडलेश्वर और कल्पवासी श्रद्धालु यहां डेरा जमा लेते हैं। ब्रह्ममुहूर्त में, यानी तड़के सुबह से ही ब्रह्मकुंड और अन्य प्रमुख जलकुंडों के बाहर स्नान के लिए किलोमीटर लंबी कतारें लग जाती हैं। साधु-संतों के शाही स्नान का दृश्य बेहद विहंगम और अलौकिक होता है। मेला क्षेत्र में चारों तरफ विशाल टेंट सिटी और छावनियां बनाई जाती हैं, जहां चौबीसों घंटे अखंड कीर्तन, भागवत कथा, भव्य यज्ञ और संतों के प्रवचन चलते रहते हैं। श्रद्धालु इन शिविरों में जाकर संतों का आशीर्वाद लेते हैं और कल्पवास (एक महीने तक सात्विक जीवन जीना) करते हैं। रात के समय जब हजारों दीपों के साथ जलकुंडों की आरती की जाती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात स्वर्ग ही राजगीर की धरती पर उतर आया हो।
लोक-संस्कृति, हस्तशिल्प और मनोरंजन का अनूठा समागम
धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ यह मलमास मेला बिहार की समृद्ध लोक-संस्कृति और ग्रामीण जीवन का एक बहुत बड़ा उत्सव भी है। मेले के मैदान में आधुनिक और पारंपरिक मनोरंजन के साधनों का एक अनोखा तालमेल देखने को मिलता है। बड़े-बड़े आकाश झूले, मौत का कुआं, सर्कस, जादू के शो, पारंपरिक नौटंकी और लोकनृत्यों के मंचन ग्रामीण और शहरी पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करते हैं। इसके अलावा, मेला क्षेत्र स्थानीय और कुटीर उद्योगों के लिए एक विशाल बाजार बन जाता है। बिहार के कोने-कोने से आए कारीगर अपने हस्तशिल्प, मिट्टी के खूबसूरत बर्तन, पारंपरिक खादी के वस्त्र, लकड़ी के खिलौने और सजावटी सामानों की दुकानें सजाते हैं। खाने-पीने के शौकीनों के लिए राजगीर का विश्वप्रसिद्ध पारंपरिक ‘खाजा’ (एक प्रकार की परतदार मीठी मिठाई) और तिलकुट इस मेले का मुख्य स्वाद होते हैं। यह मेला छोटे व्यापारियों, स्थानीय रेहड़ी-पटरी वालों और शिल्पकारों के लिए साल का सबसे बड़ा रोजगार का जरिया बनता है।
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क्राउड मैनेजमेंट और प्रशासन के सामने सुरक्षा की बड़ी चुनौती
हर तीन साल में एक बार आयोजित होने वाले इस महामेले में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा को सुनिश्चित करना बिहार सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होता है। इतनी विशाल भीड़ में भगदड़ जैसी किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए बेहद कड़े इंतजाम करने पड़ते हैं। आधुनिक दौर में प्रशासन ने इस मेले की व्यवस्था को काफी हाई-टेक और सुव्यवस्थित बना दिया है। पूरे मेला क्षेत्र, रेलवे स्टेशन और जलकुंडों के आसपास सैकड़ों की संख्या में नाइट विजन सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं और ड्रोन के जरिए भीड़ पर पैनी नजर रखी जाती है। जगह-जगह वॉच टावर, अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती, महिला पुलिस कर्मियों की विशेष टीमें और चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाले मेडिकल कैंप स्थापित किए जाते हैं। पेयजल की आपूर्ति, अस्थाई शौचालयों का निर्माण और बड़े पैमाने पर साफ-सफाई की व्यवस्था की जाती है ताकि बाहर से आने वाले तीर्थयात्रियों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
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आधुनिक पर्यटन को बढ़ावा और व्यावसायीकरण की नई राहें
सोशल मीडिया और डिजिटल कनेक्टिविटी के इस आधुनिक दौर में राजगीर के मलमास मेले की ख्याति अब केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। इस मेले के बहाने राजगीर आने वाले पर्यटक यहां के नए और अत्याधुनिक आकर्षणों का भी जमकर आनंद लेते हैं। बिहार सरकार द्वारा निर्मित देश का बेहद प्रसिद्ध ‘राजगीर ग्लास स्काईवॉक’ (शीशे का पुल), अत्याधुनिक ‘जू सफारी’, ‘नेचर सफारी’ और पहाड़ियों के बीच चलता हुआ आधुनिक ‘रोपवे’ पर्यटकों के लिए रोमांच का नया केंद्र बन चुके हैं। इससे राज्य के पर्यटन उद्योग (Tourism Industry) को एक बहुत बड़ा आर्थिक बूस्ट मिलता है। स्थानीय होटलों, गाइडों, टैक्सी ऑपरेटरों और रेस्टोरेंट मालिकों का व्यवसाय इस दौरान अपने चरम पर होता है। हालांकि, इस बढ़ती आधुनिकता के साथ व्यावसायीकरण, प्रदूषण, गंदगी और ट्रैफिक जाम जैसी नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं, जिनका स्थायी समाधान ढूंढना प्रशासन और सजग नागरिकों के लिए बेहद जरूरी हो गया है ताकि इस पावन स्थली की प्राचीन पवित्रता और प्राकृतिक सुंदरता हमेशा अक्षुण्ण बनी रहे।

