पटना: अंधेरी रात में अचानक एक नन्ही किलकारी गूंज उठती है। जच्चा की थकान भरी आँखों में खुशी की चमक आ जाती है। घर के आंगन में महिलाएँ इकट्ठी हो जाती हैं, ढोलक की थाप शुरू होती है और गूंज उठता है सोहर ‘जुग जुग जियसु ललनवा, कुलवा के दीपक जगल हो…’ यह सिर्फ गीत नहीं, बल्कि उत्तर भारत की सबसे पुरानी और भावुक परंपरा है जो जन्म के पल को पूरे परिवार और समुदाय के लिए उत्सव में बदल देती है।
उत्पत्ति और प्राचीन जड़ें
सोहर शब्द शोभन से निकला है, जिसका अर्थ है शुभ, सुंदर और मंगलमय। समय के साथ यह शोभन → सोहिलो → सोहर बन गया। भोजपुरी, अवधी और बुंदेली भाषाओं में यह जन्म के समय गाए जाने वाले मंगल गीतों का सबसे लोकप्रिय रूप है। वैदिक काल से ही स्त्रियाँ जन्मोत्सव पर मंगल गान गाती थीं। रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने ‘सोहिलो का उल्लेख किया है। राम और कृष्ण के जन्म की कथाएँ सोहर में घुल-मिल गईं, जिससे यह और भी पवित्र हो गया। अवध, भोजपुर, मगध और बुंदेलखंड में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। सोहर दरअसल भारतीय लोक-संस्कृति का वह प्रथम संस्कार है जो जन्म को धार्मिक और भावुक उत्सव बना देता है।
रोचक तथ्य
महिलाओं का अपना लोकसाहित्य: सोहर मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से चले आते हैं। लेखक अज्ञात होते हैं, लेकिन भावनाएँ अमर हैं।
बारह दिन तक का उत्सव: पुत्र जन्म पर सोहर 6 से 12 दिनों तक चलता है, सतमासा, छठी, पालना, चरुआ, भौ लोटन जैसे अवसरों पर अलग-अलग सोहर गाए जाते हैं।
राम-कृष्ण से तुलना: अधिकांश सोहर में नवजात को राम या कृष्ण कहा जाता है , अवध में जन्मे राम सलोना… या देवकी के लाल यशोदा जच्चा बनी…। इससे बच्चे को दिव्य आशीर्वाद मिलता है।
क्षेत्रीय विविधता: भोजपुरी सोहर में हास्य भरा होता है, बुंदेली सोहर में ढोलक की तेज थाप, जबकि अवधी सोहर में गहरी भावुकता। आज सोशल मीडिया पर नए वर्जन युवाओं को भी आकर्षित कर रहे हैं।
आधुनिक स्पर्श: छन्नू लाल महाराज जैसे कलाकारों ने सोहर को राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
भावुकता और हृदयस्पर्शी भावनाएँ
सोहर सिर्फ खुशी का गीत नहीं है, बल्कि मातृत्व की पीड़ा, परिवार की खुशी और नई जिंदगी के प्रति आशा का संगम है। गीत में जच्चा की थकान, सास की बधाई, ननद की चंचलता और बाबा की मुस्कान सब झलकते हैं। एक पंक्ति में पूरा परिवार जुड़ जाता है ‘सासु सुहागिन बड़ भागिन, अन धन लुटावेली हो…’। गीत बच्चे की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और कुल का दीपक बनने की कामना करते हैं। प्रसव की पीड़ा के बाद जब पहली किलकारी सुनाई देती है, तो सोहर उसे मंगल में बदल देता है।
ये गीत स्त्री-जीवन के हर पहलू को छूते हैं गर्भ की तकलीफ, जन्म की खुशी और माँ बनने का गर्व। सुनने वाला ठिठक जाता है क्योंकि इसमें पीढ़ियों की उम्मीद, ममता और पारिवारिक बंधन छिपे होते हैं। आज के छोटे परिवारों के दौर में सोहर हमें याद दिलाता है कि जन्म कोई व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि पूरा समुदाय साझा करता है।
आज का सोहर और भविष्य
आज गांवों में ढोलक-मंजीरा के साथ सोहर अभी भी गाया जाता है, लेकिन शहरी जीवन और छोटे परिवारों ने इसकी परंपरा को चुनौती दी है। फिर भी सोशल मीडिया, यूट्यूब और नए गायकों ने सोहर को नया रूप दिया है। युवा पीढ़ी अब इन गीतों को शादी, नामकरण और जन्म पर रिकॉर्ड करके शेयर करती है।
सोहर हमें सिखाता है कि जीवन का सबसे बड़ा मंगल जन्म है। बेटा हो या बेटी, नई किरण का स्वागत गाकर करना हमारी सबसे पुरानी और प्यारी परंपरा है।
अगली बार किसी घर में नवजात की किलकारी गूंजे तो कान लगाकर सुनिए। उसमें सिर्फ ताल नहीं, बल्कि सदियों की आशा, माँ की ममता और परिवार की खुशी छिपी होगी। जुग जुग जियो ललनवा… भवनवा के भाग जागल हो!
सोहर अमर रहे, और नवजीवन का यह मंगल गान सदैव गूंजता रहे।

