पीड़ा की विरह वेदना को अमर कर देता है बिरहा

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वाराणसी के ठठेरी बाजार और चौखम्भा इलाके में श्रमिकों के बीच गया गया था पहला

पटना/ गोरखपुर: रात का अंधेरा घना हो चुका है। कलकत्ता की किसी फैक्ट्री से लौटे मजदूर आंगन में बैठे हैं। थकान भरी आँखों में गांव की याद, बीवी-बच्चों की तस्वीर। अचानक एक ऊँचा स्वर गूंज उठता है ‘बस लै हिरदया में हो राम… जब तुम गैले तब गाव…’ ढोलक की थाप शुरू होती है, करताल बजती है और पूरा समूह गले मिलकर गा उठता है। यह है बिरहा, भोजपुरी का वह लोकगीत जो विरह की पीड़ा को अमर बना देता है। पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार) का यह गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि पलायन की पीड़ा, प्रेम की तड़प और जीवन की सच्चाई का आईना है।

उत्पत्ति और प्राचीन जड़ें
बिरहा शब्द संस्कृत के विरह से निकला है, जिसका अर्थ है वियोग या जुदाई। इसकी जड़ें 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में मिलती हैं, जब ब्रिटिश काल में ग्रामीण इलाकों से लोग रोजी-रोटी के लिए कलकत्ता, बम्बई जैसे शहरों में पलायन करने लगे। परिवार से दूर रहने वाले इन मजदूरों की वेदना ने बिरहा को जन्म दिया।
कहते हैं बिरहा का जनक बिहारी लाल यादव (जन्म 1837) हैं, जिन्हें आदि गुरु कहा जाता है। वाराणसी के ठठेरी बाजार और चौखम्भा इलाके में श्रमिकों के बीच उन्होंने पहला बिरहा गाया। शुरू में यह खड़ी बिरहा के रूप में था, बिना किसी वाद्य यंत्र के, सिर्फ दो पंक्तियों का दोहा, जो तार सप्तक में ऊँचे स्वर में गाया जाता था।
अहीर (यादव) समुदाय के पशुपालकों और किसानों में यह खासा लोकप्रिय हुआ। समय के साथ यह पूर्ण विकसित गायकी बन गया। राम-कृष्ण की विरह कथाएँ, ग्वाल-गोपियों का वियोग और सामाजिक वेदना इसमें घुल-मिल गए। आज भी बिरहा भोजपुरी संस्कृति का वह प्राचीन रूप है जो पलायन की कहानी को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखता है।

रोचक तथ्य जो हैरान कर दें
बिरहा मुख्य रूप से अहीर समुदाय का गीत माना जाता है। यह मनोरंजन के साथ थकावट मिटाने और गांव की एकरसता दूर करने का साधन था। शुरुआती खड़ी बिरहा में कोई ढोलक-हारमोनियम नहीं होता था। गायक अकेला ऊँचे स्वर में गाता और अंतिम शब्द को खींच-खींचकर गाता जैसे ‘बेद, हकीम बुलाओ कोई…’। बाद में ढोलक, हारमोनियम और करताल जुड़े। बिरहा गायन में दो टीमों का मुकाबला होता है। एक गायक सवाल पूछता, दूसरा जवाब देता और कटाक्ष करता। यह घंटों चलता है और आशु कवि को खूब सम्मान मिलता है। इंडेंटर्ड मजदूरों के साथ बिरहा मॉरीशस, गुयाना, सूरीनाम और ट्रिनिडाड तक पहुँचा, जहाँ आज भी इंडो-कैरेबियन समुदाय इसे गाता है। आधुनिक कलाकारों में इंजीनियर सुनील यादव, हीरा लाल यादव, अखिलेंद्र प्रताप सिंह, आँचल राघवानी जैसे गायक आज बिरहा को स्टेज और यूट्यूब पर नया रूप दे रहे हैं। कभी-कभी हास्य, व्यंग्य या सामाजिक मुद्दे भी इसमें शामिल हो जाते हैं।

भावुकता और हृदयस्पर्शी भावनाएँ
बिरहा सिर्फ गीत नहीं, बल्कि दिल की चीख है। इसमें प्रेमिका की बिछोह की तड़प, बीवी का इंतजार, माँ-बाप की याद और गांव की मिट्टी की खुशबू सब घुली होती है। मजदूर जब दिन भर की मेहनत के बाद रात में गाता है तो विरह की पीड़ा साझा हो जाती है। गीतों में प्रेमिका को नागिन की तरह चुभन कहा जाता है, दबी हुई कामना और यौन पीड़ा का प्रतीक। एक गीत में पत्नी कहती है कि अंगूरी में दस ले बिया नागिनिया…। पलायन के कारण टूटते परिवार, मिसमैच मैरिज, सामाजिक अन्याय सब इसमें झलकते हैं। बिरहा सुनते ही श्रोता ठिठक जाता है क्योंकि यह उसकी अपनी कहानी लगती है।लौंडा नाच 11वीं सदी में शुरू हुआ था, भिखारी ठाकुर ने पहुँचाया था जन जन तक

यह गीत स्त्री-पुरुष दोनों की भावनाओं को जगह देता है। पुरुष की मजदूरी की थकान और स्त्री की अकेली रातों की कसक दोनों को एक सूत्र में बांधता है। भोजपुरी लोक-जीवन में बिरहा वह पुल है जो दूर बैठे प्रियजन को पास ला देता है। यह सिर्फ वियोग नहीं, बल्कि उम्मीद, धैर्य और प्रेम की जीत का गान भी है।

आज का बिरहा और भविष्य
आज गांवों में बिरहा अभी भी अखाड़ों में गाया जाता है, लेकिन शहरी जीवन और डिजिटल युग ने इसे नया रूप दिया है। यूट्यूब, स्टेज शो और फिल्मों में बिरहा अब घंटों के मुकाबले के रूप में देखा जाता है। नए गायक पुरानी परंपरा को बनाए रखते हुए सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे, हास्य और यहां तक कि पटाखे भी जोड़ रहे हैं। फिर भी चुनौतियां हैं। छोटे परिवार, पलायन की नई लहर और आधुनिक संगीत के बीच बिरहा को बचाना जरूरी है। युवा पीढ़ी अब इसे शॉर्ट वीडियो और ऑडियो ज्यूकबॉक्स के जरिए अपना रही है। बिरहा हमें सिखाता है कि विरह कितना भी दर्द दे, प्रेम और स्मृति हमेशा जीवित रहती है। अगली बार जब कोई बिरहा गायक रात के सन्नाटे में गूंजे तो कान लगाकर सुनिए। उसमें सिर्फ ताल नहीं, बल्कि सदियों के पलायन की पीड़ा, प्रेम की तड़प और भोजपुरी आत्मा की पुकार छिपी होगी। बिरहा अमर रहे… विरह की यह अमर धुन सदैव गूंजती रहे! भोजपुरियों का परदेस में पसीना से देश में समृद्धि 2 लाख करोड़ से अधिक की तरक्की

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