नई दिल्ली/पटना: भोजपुरी भाषी क्षेत्र (पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और झारखंड के कुछ हिस्से) से निकले प्रवासी न केवल अपनी संस्कृति और भाषा को संजोए हुए हैं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। गिरमिटिया (अनुबंधित श्रमिक) के रूप में 19वीं सदी से शुरू हुई उनकी यात्रा आज रेमिटेंस (विदेश से भेजा गया धन), कौशल हस्तांतरण और सांस्कृतिक सेतु के रूप में फली-फूली है।
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भोजपुरी प्रवासियों की कहानी ब्रिटिश काल की गिर्मिट प्रथा से जुड़ी है। 1830 के दशक में दास प्रथा समाप्त होने के बाद ब्रिटिश, फ्रेंच और डच उपनिवेशों में श्रम की कमी पूरी करने के लिए मुख्य रूप से भोजपुर क्षेत्र (बिहार-यूपी) से लाखों लोग मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद एंड टोबैगो और दक्षिण अफ्रीका भेजे गए। इनमें से अधिकांश किसान, मजदूर और कारीगर थे, जिन्होंने वहां चीनी के खेतों में काम किया। आज भोजपुरी भाषा और संस्कृति इन देशों में जीवित है। मॉरीशस में भोजपुरी बोलने वाले इंडो-मॉरीशियंस की संख्या काफी है, जहां यह अल्पसंख्यक भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। फिजी, गुयाना और सूरीनाम में भी भोजपुरी बोलियां (जैसे गुयानी भोजपुरी, सरनामी भोजपुरी) लोकप्रिय हैं। इन देशों में भारतीय मूल के लोग राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। आधुनिक काल में भोजपुरी क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों (सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर) में निर्माण, औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में काम कर रहे हैं। बिहार अकेले देश के कुल अंतरराष्ट्रीय प्रवास का करीब 15-18% योगदान देता है, जिसमें भोजपुरी भाषी जिलों की प्रमुख भूमिका है।
अर्थव्यवस्था (रेमिटेंस) का बड़ा हिस्सा
भारत दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्तकर्ता देश है। वित्त वर्ष 2024-25 में प्रवासी भारतीयों ने रिकॉर्ड 135.46 बिलियन डॉलर (करीब 11.60 लाख करोड़ रुपये) देश भेजे, जो पिछले वर्ष से 14% अधिक है। यह आंकड़ा आठ साल पहले (2016-17) के 61 बिलियन डॉलर से दोगुने से भी ज्यादा है। रेमिटेंस भारत की जीडीपी का लगभग 3-4% योगदान देते हैं और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करते हैं। ये फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) और विदेशी सहायता से भी ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। भोजपुरी/बिहारी प्रवासियों का इसमें महत्वपूर्ण हिस्सा है। NSSO और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, बिहार में रेमिटेंस प्राप्त करने वाले ग्रामीण परिवारों का प्रतिशत सबसे ऊंचा है (लगभग 74.5%)। गरीब परिवारों में रेमिटेंस भोजन सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होता है, जबकि बेहतर स्थिति वाले परिवार कृषि, संपत्ति और व्यवसाय में निवेश करते हैं।
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सऊदी अरब, यूएई आदि में काम करने वाले बिहारी/भोजपुरी मजदूरों की रेमिटेंस स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देती है। हालांकि कुल रेमिटेंस में केरल, पंजाब आदि का हिस्सा ज्यादा दिखता है, लेकिन बिहार जैसे राज्यों में यह गरीबी उन्मूलन और उपभोग बढ़ाने में निर्णायक है। कार्बिबियन और अन्य डायस्पोरा भी हैं काफी महत्वपूर्ण। गिरमिटिया वंशज अब व्यवसाय, राजनीति और पेशेवर क्षेत्रों में सक्रिय हैं। वे भारत में निवेश और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं।
रेमिटेंस न केवल परिवारों का स्तर ऊंचा उठाते हैं, बल्कि सामाजिक रेमिटेंस (कौशल, विचार और प्रौद्योगिकी) के रूप में भी विकास में योगदान देते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि ये प्रवासी स्थानीय अर्थव्यवस्था में खपत बढ़ाते हैं, कृषि को मजबूत करते हैं और युवाओं की शिक्षा में निवेश करते हैं।
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श्रम शोषण, सांस्कृतिक अलगाव और कभी-कभी विदेशी देशों में भेदभाव। फिर भी, भोजपुरी समुदाय अपनी भाषा (भोजपुरी गीत, लोकगीत, रामलीला) और त्योहारों (फागवा, दिवाली) को संरक्षित रखे हुए है, जो भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करता है। बिहार सरकार और केंद्र द्वारा प्रवासी भारतीय दिवस जैसे कार्यक्रमों के जरिए इन डायस्पोरा को जोड़ने की कोशिशें जारी हैं। विश्व भोजपुरी सम्मेलन (मॉरीशस, नीदरलैंड आदि में आयोजित) आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ाने का मंच बन चुके हैं।
देश के विकास के सेतु हैं भोजपुरिया के लोग
विदेशों में बसे भोजपुरी लोग न केवल अपनी जड़ों से जुड़े हैं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को रेमिटेंस, निवेश और कौशल के जरिए सपोर्ट कर रहे हैं। बिहार और पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्रों में इनके योगदान से घरों में पक्के मकान बन रहे हैं, शिक्षा का स्तर सुधर रहा है और स्थानीय बाजार सक्रिय हो रहे हैं। यदि नीतियां इन प्रवासियों के कौशल और नेटवर्क को बेहतर तरीके से जोड़ सकें, तो यह योगदान और बढ़ सकता है।

