क्या भोजपुरी मजबूरी की भाषा बन रही है?

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नई दिल्ली/पटना। भोजपुरी बोलने वाले करोड़ों लोग रोजगार की तलाश में गांव छोड़ शहरों की ओर पलायन करते हैं। दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात या दक्षिण भारत के कारखानों-निर्माण स्थलों पर ये मजदूर अपनी मातृभाषा में गाते-बोलते दिखते हैं, लेकिन घर लौटकर परिवार को वही पुरानी मजबूरी का सामना करना पड़ता है। सवाल उठता है कि क्या भोजपुरी अब सिर्फ़ प्रवासी मजदूरों की भाषा बनकर रह गई है, या यह अपनी सांस्कृतिक पहचान और विकास की राह पर आगे बढ़ रही है?


संख्या में मजबूत लेकिन मजबूर
भारत के 2011 जनगणना के अनुसार, देश में लगभग 5.05 करोड़ लोग भोजपुरी को अपनी मातृभाषा बताते हैं। यह आंकड़ा हिंदी के अंतर्गत आता है, लेकिन स्वतंत्र रूप से भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बिहार में 2.58 करोड़ से अधिक और पूरे देश में 5 करोड़ के पार है। कुछ अनुमानों और राजनीतिक दावों में इसे 20-30 करोड़ तक बताया जाता है, जिसमें दूसरे भाषा के रूप में बोलने वालों और विदेशी डायस्पोरा को शामिल किया जाता है। विश्व स्तर पर भोजपुरी बोलने वालों की संख्या 20-25 करोड़ के आसपास मानी जाती है, जिसमें नेपाल, फिजी, मॉरिशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद जैसे देश शामिल हैं जहां यह औपनिवेशिक काल के गिरमिटिया मजदूरों के साथ पहुंची थी।

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भोजपुरी क्षेत्र (पूर्वांचल उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और झारखंड के कुछ हिस्से) से पुरुष-प्रधान पलायन की परंपरा सदियों पुरानी है। ब्रिटिश काल में लाखों भोजपुरिया मजदूर चाय बागानों, जूट मिलों और विदेशी प्लांटेशनों में काम करने गए। आज भी बिहार और पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में युवा निर्माण कार्य, ईंट भट्ठों, सुरक्षा गार्ड या फैक्टरियों में काम करने दिल्ली-मुंबई-लुधियाना पहुंचते हैं। अलग अलग अध्ययनों के मुताबिक, बिहार के कई जिलों में घरों का 40-70% हिस्सा प्रवास से जुड़ा है। कोरोना के लॉकडाउन के दौरान ये प्रवासी ट्रेनों और सड़कों पर लौटते दिखे, जब उनकी मजबूरी साफ़ झलकी।

भोजपुरी लोकगीत और बिदेसिया परंपरा इसी प्रवास की कहानी कहते हैं कि पत्नी का विरह, घर की याद, शहर की कठिनाइयां। आधुनिक भोजपुरी गानों और फिल्मों में भी यही थीम प्रमुख है: मजदूर की पीड़ा, परिवार से दूरी और संघर्ष। भोजपुरी सिनेमा (जिसमें पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, प्रवेश लाल यादव जैसे सितारे चमकते हैं) मुख्य रूप से इन प्रवासी दर्शकों के लिए बनती है। सौ से ज्यादा फिल्में हर साल बन रही हैं, लेकिन इन्हें अक्सर “वल्गर” या कम बजट वाली कहकर खारिज किया जाता है।

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शैक्षिक और सरकारी उपेक्षा:
भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग दशकों से चल रही है, लेकिन यह अभी तक पूरी नहीं हुई। झारखंड में इसे द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिला है, नेपाल में संवैधानिक मान्यता है, लेकिन भारत में हिंदी की “उपभाषा” माना जाता है। इससे साहित्य पुरस्कार, शिक्षा माध्यम, सरकारी नौकरियों में उपयोग और मीडिया सहायता जैसी सुविधाएं सीमित रहती हैं।
सामाजिक धारणा: कई जगहों पर भोजपुरी को “गंवारों की भाषा” या सिर्फ़ मजदूरों की बोली समझा जाता है। शहरों में हिंदी-अंग्रेजी का दबदबा बढ़ने से नई पीढ़ी घर में भोजपुरी बोलती कम हो रही है।
आर्थिक मजबूरी: क्षेत्र में उद्योगों की कमी के कारण युवा मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं। अध्ययन दिखाते हैं कि प्रवासी ज्यादातर कम पढ़े-लिखे, निम्न वर्ग और पिछड़े समुदायों से आते हैं।

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भोजपुरी सिर्फ़ मजबूरी नहीं है। यह समृद्ध लोक परंपरा, साहित्य, नाटक और फिल्म इंडस्ट्री का आधार है। भोजपुरी अकादमियां सक्रिय हैं और लेखक-कवि लगातार योगदान दे रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नई जनगणना में आंकड़े अलग से लिए जाएं तो भोजपुरी गुजराती-उर्दू जैसे भाषाओं को पीछे छोड़ सकती है। रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं (जैसे रवि किशन) ने भी भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा देने की मांग उठाई है। वे कहते हैं कि यह करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान है, न कि सिर्फ़ एक बोली।

भोजपुरी मजबूरी की भाषा बन रही है या नहीं
यह आंशिक रूप से सही है। पलायन की मजबूरी ने इसे प्रवासी मजदूरों से जोड़ दिया है, लेकिन साथ ही इसने भोजपुरी सिनेमा और गीतों को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया है। असली चुनौती विकास की है: शिक्षा, साहित्य और मीडिया में इसका इस्तेमाल बढ़ाना, आठवीं अनुसूची में शामिल करना और क्षेत्र में रोजगार सृजन ताकि लोग मजबूरी नहीं, अपनी भाषा के गौरव से जुड़ सकें। जब तक पूर्वांचल और बिहार के गांवों में विकास नहीं होगा, भोजपुरी गीतों में ‘बिदेसिया’ का दर्द जारी रहेगा। लेकिन भाषा की ताकत उसके बोलने वालों में है, अगर वे खुद इसे मजबूत रखेंगे, तो यह मजबूरी से ऊपर उठकर सांस्कृतिक शक्ति बन सकती है।

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