भोजपुरी भाषी क्षेत्रों का बदलता फूड हैबिट, ‘मॉडर्न’ Food का कहर

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नई दिल्ली/पटना/गोरखपुर/वाराणसी: भोजपुरी भाषी क्षेत्र जैसे पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश), पश्चिमी बिहार (भोजपुर, सारण, सीवान आदि) और झारखंड के कुछ हिस्से परंपरागत रूप से अपनी मिट्टी से जुड़े, सरल और पौष्टिक भोजन के लिए मशहूर रहे हैं। सत्तू, लिट्टी-चोखा, ठेकुआ, चावल-दाल, पंचफोरन वाली सब्जियां, मक्का-ज्वार आधारित रोटी और स्थानीय सब्जियां (लौकी, कुम्हड़ा, नेनुआ) इन इलाकों के खान-पान की पहचान रही हैं। ये भोजन खेतिहर जीवनशैली के अनुकूल थे, कम तेल-मसाले, ज्यादा फाइबर और स्थानीय सामग्री से बने, जो किसानों को पूरे दिन ऊर्जा देते थे।
लेकिन पिछले 20-25 सालों में यह फूड हैबिट तेजी से बदल रहा है। शहरों में लिट्टी-चोखा और सत्तू पराठा की जगह पैकेज्ड फूड, फास्ट फूड (नूडल्स, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक्स, बर्गर) और प्रोसेस्ड आइटम्स ले रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी माइग्रेशन, टीवी- सोशल मीडिया और बढ़ती आमदनी के चलते पारंपरिक व्यंजनों का स्थान कम हो रहा है। यह बदलाव सिर्फ स्वाद का नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था का है। यह लेख गहराई से विश्लेषण करता है कि यह बदलाव कैसे हो रहा है, इसके पीछे की बड़ी वजहें क्या हैं, इससे क्या नुकसान हो सकते हैं और बचाव के रास्ते क्या हैं।

खानपान में बदलाव कैसे हो रहा है लौंडा नाच 11वीं सदी में शुरू हुआ था, भिखारी ठाकुर ने पहुँचाया था जन जन तक
भोजपुरी क्षेत्रों में फूड ट्रांजिशन (पोषण संक्रमण) स्पष्ट दिखता है। NFHS-5 (2019-21) के अनुसार बिहार में महिलाओं में ओवरवेट/ओबेसिटी 12% से बढ़कर 16% हो गई है, जबकि 26% अभी भी पतली (अंडरवेट) हैं। पुरुषों में भी यही ड्यूल बर्डन (दोहरी समस्या) है। बच्चों में 5-9 साल के आयु वर्ग में ओवरवेट दोगुना हो गया है (1.2% से 2.4%)। शहरी बिहार और पूर्वांचल के छोटे कस्बों में पैकेज्ड फूड पर खर्च 20 साल पहले के 4% से बढ़कर 9.84% हो गया है। युवा पीढ़ी नूडल्स, चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स और बाहर का खाना पसंद कर रही है। माइग्रेंट परिवारों में शहर से लौटे लोग अब घर पर भी ‘मॉडर्न’ खाना बनाते हैं जैसे मैदा आधारित पराठे, फ्राइड आइटम्स। सत्तू, जो कभी किसानों का सुपरफूड था, अब सिर्फ बुजुर्गों या त्योहारों तक सीमित हो रहा है। लिट्टी-चोखा अभी भी सांस्कृतिक प्रतीक है, लेकिन रोजमर्रा के भोजन में उसकी जगह घट रही है।

क्या है बदलाव के पीछे
यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि कई संरचनात्मक वजहों से हुआ है। जानते हैं इसको क्रमवार-

माइग्रेशन और रेमिटेंस का प्रभाव भोजपुरी की ‘खोई हुई’ लिखावट थी कैथी और फिर धीरे धीरे मर गई 4 hours ago
भोजपुरी क्षेत्र से लाखों लोग दिल्ली, मुंबई, गुड़गांव और खाड़ी देशों में काम करते हैं। रेमिटेंस (पैसे का घर भेजना) से परिवार की आय बढ़ी है, लेकिन खान-पान भी बदल गया। माइग्रेंट घर लौटकर ‘शहरी स्वाद’ लाते हैं जैसे प्रोसेस्ड फूड, चाइनीज या फास्ट फूड। अध्ययनों में पाया गया कि माइग्रेशन डाइट पैटर्न को ‘अनहेल्दी’ दिशा में ले जाता है।

शहरीकरण, मीडिया और ग्लोबलाइजेशन
टीवी, यूट्यूब, इंस्टाग्राम पर फास्ट फूड का प्रचार युवाओं को आकर्षित करता है। ‘आसान और स्टेटस सिंबल’ खाना (जैसे कोल्ड ड्रिंक्स, पैकेट वाले स्नैक्स) अब आकांक्षा का प्रतीक बन गया है। सुपरमार्केट और फास्ट फूड चेन छोटे शहरों तक पहुंच चुके हैं।

आर्थिक विकास और समय की कमी
महिलाओं की नौकरी बढ़ने और न्यूक्लियर फैमिली से पारंपरिक खाना बनाना मुश्किल हो गया। पैकेज्ड फूड सुविधाजनक है। ग्रीन रेवोल्यूशन के बाद पारंपरिक फसलें (ज्वार, बाजरा) कम हो गईं, जबकि चावल-गेहूं पर जोर बढ़ा है।

फूड इंडस्ट्री का विस्तार करोड़ों बोलते हैं, फिर भी ‘भाषा’ नहीं भोजपुरी
ल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) का बाजार तेज़ी से विस्तार कर रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, भारत का पैकेज्ड फूड बाजार सालाना 10–12% की दर से बढ़ रहा है, जिसमें UPF की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। पहले यह शहरी क्षेत्रों तक सीमित था, लेकिन अब बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी इसकी खपत तेजी से बढ़ी है। सस्ते, आसानी से उपलब्ध और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले इन खाद्य पदार्थों में अधिक शुगर, नमक और ट्रांस-फैट होते हैं, जो डायबिटीज के खतरे को बढ़ाते हैं। भारत में पहले से ही 10 करोड़ से अधिक लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, और UPF इस संकट को और गहरा कर रहा है।

स्वास्थ्य, संस्कृति और पर्यावरण पर असर

ड्यूल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रिशन: बिहार में अभी भी स्टंटिंग 42% के आसपास है, लेकिन ओबेसिटी बढ़ रही है। इससे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ा। NFHS डेटा दिखाता है कि एनसीडी (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज) तेजी से बढ़ रहे हैं।

माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी: पारंपरिक डाइट में सत्तू, दाल, हरी सब्जियां थीं। अब शुगर-फैट वाले प्रोसेस्ड फूड से विटामिन-मिनरल्स कम हो रहे हैं।
बच्चों में मोटापा: स्क्रीन टाइम, फास्ट फूड और कम शारीरिक श्रम से किशोरों में ओबेसिटी दोगुना हो गया।

सांस्कृतिक नुकसान
भोजपुरी खाना सिर्फ भोजन नहीं, संस्कृति का हिस्सा है त्योहारों में ठेकुआ, शादी में लिट्टी-चोखा। युवा पीढ़ी इसे ‘पुराना’ मान रही है। इससे भाषा, लोकगीत और रीति-रिवाजों से जुड़ी खान-पान की विरासत कमजोर हो रही है।

पर्यावरण और आर्थिक नुकसान
प्रोसेस्ड फूड ज्यादा पैकेजिंग, ऊर्जा-गहन प्रोसेसिंग और लंबी सप्लाई चेन के कारण कार्बन फुटप्रिंट तथा पानी की खपत बढ़ाता है। इससे प्लास्टिक प्रदूषण भी बढ़ता है। सत्तू, ज्वार जैसे पारंपरिक उत्पादों की मांग घटने से भोजपुरी क्षेत्र के छोटे किसान संकट में हैं, कम दाम, घटती खेती और आय में कमी आ रही है।

परिवार का बजट बर्बाद
परिवारों का बजट तेजी से जंक फूड की ओर झुक रहा है, जिससे आर्थिक और स्वास्थ्य दोनों पर असर पड़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार शहरी भारत में लगभग 25-30% खाद्य खर्च अब प्रोसेस्ड और फास्ट फूड पर हो रहा है। ये खाद्य पदार्थ महंगे होने के साथ पोषणहीन होते हैं, जिससे मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोग का खतरा बढ़ता है। WHO भी चेतावनी दे चुका है कि अस्वस्थ खानपान गैर-संचारी रोगों का प्रमुख कारण है। विशेषज्ञ मानते हैं कि घर का बना संतुलित भोजन 30-40% तक सस्ता और अधिक पौष्टिक होता है, जिससे परिवार का बजट और स्वास्थ्य दोनों सुरक्षित रह सकते हैं।

कैसे संरक्षण करें और अनुकूलन?

पारंपरिक भोजन को बचाना केवल संस्कृति नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा मुद्दा है। भारत में बढ़ते जंक फूड उपभोग के बीच यह जरूरी हो गया है कि संरक्षण (preservation) और अनुकूलन (adaptation) साथ-साथ चलें। इसके लिए बहु-स्तरीय प्रयास आवश्यक हैं-

व्यक्तिगत और परिवार स्तर
घर से ही बदलाव की शुरुआत होती है। रोजाना के भोजन में सत्तू, लिट्टी-चोखा, दाल-भात, हरी सब्जियां जैसे पारंपरिक व्यंजन शामिल करें। सत्तू शेक या सत्तू पराठा जैसे विकल्प 10-15 मिनट में तैयार हो जाते हैं और प्रोटीन-फाइबर से भरपूर होते हैं। बच्चों को बचपन से ही इनका स्वाद देने से उनकी खानपान आदतें बेहतर बनती हैं। साथ ही, किचन गार्डन में टमाटर, भिंडी, हरी मिर्च जैसी स्थानीय सब्जियां उगाकर ताजा और सस्ता भोजन सुनिश्चित किया जा सकता है।

समुदाय और सांस्कृतिक स्तर
समुदाय में जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। स्थानीय शेफ और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर पारंपरिक व्यंजनों को ‘हेल्दी ट्विस्ट’ देकर युवाओं में लोकप्रिय बना सकते हैं जैसे बेक्ड लिट्टी या सत्तू स्मूदी। बिहार की जेईवीका (JEEViKA) जैसी स्वयं सहायता समूहों ने पहले ही महिलाओं को पोषण शिक्षा देकर डाइट विविधता बढ़ाने में सफलता पाई है। ऐसे मॉडल को अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।

सरकारी और नीतिगत स्तर
सरकार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। 2023 को ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स’ घोषित करने के बाद मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी) को बढ़ावा देने की पहल हुई है, जिसे भोजपुरी क्षेत्रों में और तेज किया जा सकता है। सत्तू, ज्वार जैसे पोषक खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी दी जाए और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में शामिल किया जाए। साथ ही, बच्चों को लक्षित जंक फूड विज्ञापनों पर सख्त नियंत्रण, स्कूलों में पोषण शिक्षा और मिड-डे मील में पारंपरिक व्यंजन जोड़ना जरूरी है। माइग्रेंट वर्कर्स के लिए ‘घर का खाना अपनाओ’ जैसे अभियान भी प्रभावी हो सकते हैं।

उद्यमिता का रास्ता
पारंपरिक भोजन को बाजार से जोड़ना संरक्षण का मजबूत तरीका है। सत्तू ड्रिंक, ठेकुआ, मखाना जैसे उत्पादों की पैकेजिंग और ऑनलाइन बिक्री तेजी से बढ़ रही है। पूर्वांचल-बिहार में सत्तू-मखाना आधारित होम-बेस्ड स्टार्टअप्स पहले ही रोजगार और आय के नए अवसर पैदा कर रहे हैं। अगर सही ब्रांडिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म मिले, तो यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है।

विरासत बचाएं, स्वास्थ्य सुधारें भोजपुरी का भौकाल: बॉलीवुड नहीं, अब ‘भोजवुड’ की ग्लोबल एंट्री
भोजपुरी फूड हैबिट का बदलाव विकास का संकेत है, लेकिन बिना नियंत्रण के यह स्वास्थ्य और संस्कृति दोनों को नुकसान पहुंचा रहा है। बदलाव को रोकना नहीं, बल्कि सही दिशा देना जरूरी है, पारंपरिक खाने को आधुनिक जीवनशैली के साथ जोड़ना। अगर हम आज सत्तू और लिट्टी-चोखा को फिर से गौरव दें, तो कल हमारी पीढ़ी न सिर्फ स्वस्थ रहेगी, बल्कि अपनी जड़ों से भी जुड़ी रहेगी। यह बदलाव हमारा चुनाव है। या तो हम प्रोसेस्ड फूड की लहर में बह जाएं, या अपनी मिट्टी के स्वाद को संरक्षित कर नई पीढ़ी को सौंपें। समय अब भी हमारे पक्ष में है।

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