नई दिल्ली/ पटना: भोजपुरी भाषा को आजकल अश्लीलता और घटिया मनोरंजन का पर्याय मान लिया गया है। यह धारणा दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि यह भाषा अपनी समृद्ध साहित्यिक, लोक-सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत के लिए जानी जाती है। लगभग 20 करोड़ बोलने वालों वाली यह भाषा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड के साथ-साथ नेपाल, मॉरीशस और सूरीनाम के कई अन्य देशों तक फैली हुई है। भाषाविदों का अनुमान है कि नई जनगणना में इसके बोलने वालों की संख्या अधिक हो सकती है। फिर भी, कुछ व्यावसायिक फिल्मों और गानों ने पूरे भाषा समुदाय को बदनाम कर दिया। यह लेख उच्च स्तर के विश्लेषण के साथ तथ्यों, आंकड़ों और व्यावहारिक समाधानों पर केंद्रित है, ताकि भाषा की सच्ची गरिमा बहाल की जा सके।
भोजपुरी की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत, ठप्पे की जड़ें
भोजपुरी की जड़ें मध्यकालीन काल तक जाती हैं, लेकिन आधुनिक युग में भिखारी ठाकुर (1887-1971) ने इसे नई ऊंचाई दी। उन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा जाता है। उनके नाटक जैसे बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी बेचवा और भाई बिरोध ने प्रवासन, स्त्री-शोषण, जाति व्यवस्था और सामाजिक अन्याय जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया। गबरघिचोर को ब्रेख्त के द काकेशियन चॉक सर्कल से तुलना की जाती है। भिखारी ठाकुर ने ‘बिदेसिया’ नाट्य शैली की नींव रखी, जिसमें पुरुष कलाकार स्त्री भूमिका निभाते थे और सामाजिक जागरण होता था।
20वीं सदी में विवेकी राय, रामनाथ पांडेय जैसे लेखकों ने उपन्यास और कविता के माध्यम से भाषा को साहित्यिक बनाया। फिर भी, 2000 के दशक से मीडिया ने इसे अश्लीलता से जोड़ दिया। समस्या भाषा की नहीं, बल्कि उसके चयनात्मक व्यावसायिक इस्तेमाल की है। प्रवासी मजदूरों की भावनात्मक जरूरतों को पूरा करने वाले कुछ प्राइवेट एल्बम और फिल्मों ने डबल मीनिंग और महिलाओं के ऑब्जेक्टिफिकेशन को बढ़ावा दिया। परिणामस्वरूप, बाहरी समाज भोजपुरी को ‘गंदी भाषा’ समझने लगा। यह ठप्पा हटाने के लिए सबसे पहले सांस्कृतिक गर्व का पुनरुत्थान जरूरी है। महागठबंधन ने 2024 में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की, जो राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और संसाधन दे सकती है।
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भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत 1963 में गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो से हुई, जो विधवा पुनर्विवाह जैसे सामाजिक मुद्दे पर आधारित थी। 1960 के दशक में दर्जनों फिल्में बनीं। 2004 में ससुरा बड़ा पैसावाला (बजट का कई गुना कमाई, लगभग 35 करोड़) ने उद्योग को नया जीवन दिया। 2022 में 186 थियेट्रिकल रिलीज हुईं। उद्योग का अनुमानित बाजार मूल्य 1200-2000 करोड़ रुपये सालाना है, जिसमें 70-100 फिल्में नियमित रूप से बनती हैं।
अंग्रेजी से भी कम है भोजपुरी फिल्मों में U (परिवारिक) प्रमाणन का प्रतिशत
CBFC डेटा (2017-2025) चिंताजनक है। लगभग 18,000 फिल्मों के विश्लेषण में भोजपुरी फिल्मों में U (परिवारिक) प्रमाणन का प्रतिशत सबसे कम है, यहां तक कि अंग्रेजी फिल्मों से भी कम। मलयालम और ओड़िया सिनेमा U-रेटेड फिल्मों में आगे हैं, जबकि भोजपुरी सबसे कम परिवार-अनुकूल है। प्राइवेट एल्बमों (बिना सेंसर) ने डबल मीनिंग गाने, आइटम सॉन्ग और महिलाओं का यौनिकरण बढ़ाया। अध्ययनों (Class Bias, Marginalisation and Sensationalism) में पाया गया कि निचली आय वर्ग और प्रवासी दर्शकों की सशक्तिकरण की भावना को बाजार ने सेक्सुअल फ्रस्ट्रेशन में बदल दिया।
यूपी सरकार ने 2021 में घोषणा की कि अश्लीलता या हिंसा वाली फिल्मों को सब्सिडी नहीं मिलेगी (यदि 75% शूटिंग यूपी में हो)। बिहार सरकार ने भी 2025-26 में सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील भोजपुरी गानों पर FIR और प्रतिबंध लगाया। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि समस्या बाजार-चालित मांग और कम बजट (अधिकांश फिल्में 1-2 करोड़) की है, न कि भाषा की।
अश्लीलता के सामाजिक-आर्थिक कारण
अश्लीलता का ठप्पा आर्थिक असमानता, बड़े पैमाने पर प्रवासन और सांस्कृतिक उपेक्षा से जुड़ा है। लाखों भोजपुरी भाषी मजदूर दिल्ली, मुंबई, गुजरात आदि में काम करते हैं। वे अलगाव की पीड़ा में ‘रसदार’ कंटेंट की मांग करते हैं। कम बजट वाले प्रोड्यूसर फॉर्मूला अपनाते हैं वो सनसनीखेज डायलॉग, provocative सॉन्ग और महिलाओं का ऑब्जेक्टिफिकेशन पर ध्यान देते हैं। शोध पत्रों में इसे ‘क्लास बायस’ कहा गया है बॉलीवुड में समान तत्वों को ‘स्टाइलिश’ माना जाता है, लेकिन भोजपुरी को ‘वुल्गर’।
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यूट्यूब एल्गोरिदम अश्लील कंटेंट को ज्यादा प्रमोट करता है, जबकि साहित्यिक या सामाजिक फिल्में दब जाती हैं। महिलाओं के प्रति मिसोजिनी बढ़ती है। बिहार और यूपी सरकारों ने बार-बार सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील गानों पर कार्रवाई की, लेकिन जड़ें गहरी हैं। समस्या भाषा की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संसाधनों की कमी और बाजार की मांग की है। उच्च-गुणवत्ता वाले कंटेंट की कमी ने नकारात्मक सर्कल बनाया है।
व्यावहारिक समाधान यानी साहित्य, शिक्षा और मीडिया सुधार
ठप्पा हटाने के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है।
साहित्य और शिक्षा: भिखारी ठाकुर के नाटकों को स्कूल-कॉलेज पाठ्यक्रम में शामिल करें। भोजपुरी साहित्य अकादमी पुरस्कारों को बढ़ावा दें। युवा लेखकों को प्रोत्साहित करें।
सिनेमा सुधार: सब्सिडी और टैक्स छूट केवल U/UA प्रमाणित फिल्मों को मिले। यूपी-बिहार सरकारें गुणवत्ता आधारित फंडिंग बढ़ाएं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (ZEE5, YouTube) पर क्लीन कंटेंट को प्राथमिकता दें। निर्माता जैसे दिनेश लाल यादव (निर्हुआ) और पवन सिंह पहले से कुछ साफ फिल्में बना रहे हैं, इन्हें मॉडल बनाएं।
मीडिया और सोशल: सकारात्मक लोकगीतों को मूल रूप में प्रमोट करें। युवा क्रिएटर्स को शॉर्ट फिल्म्स, पॉडकास्ट और क्लीन गानों के लिए प्लेटफॉर्म दें। अश्लील प्राइवेट एल्बमों पर सख्त सेंसरशिप लागू करें। मलयालम सिनेमा ने U-रेटेड फिल्मों का उच्च प्रतिशत बनाए रखकर परिवारिक दर्शकों को आकर्षित किया है। भोजपुरी भी यही कर सकता है। जब मांग बदलेगी, उत्पादन भी बदलेगा।
सरकारी नीति, युवा भूमिका और भविष्य की दिशा
सरकार निर्णायक भूमिका निभा सकती है। भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर संस्कृति विभाग फंडिंग बढ़ाए। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में भोजपुरी श्रेणी मजबूत करें। यूपी-बिहार में सब्सिडी नीति को और सख्त बनाएं, केवल सकारात्मक सामग्री को सहायता। बिहार सरकार ने 2025 में गुणवत्ता वाली फिल्मों को प्राथमिकता देने की बात कही है।
युवा पीढ़ी (जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है) सबसे बड़ा बदलाव ला सकती है। वे क्लीन कंटेंट क्रिएट करें, बहस शुरू करें और सांस्कृतिक गर्व जगाएं। विश्व भोजपुरी सम्मेलन, साहित्यिक उत्सव और अकादमिक शोध बढ़ाएं।भविष्य की राह स्पष्ट है जो बाजार को सकारात्मक दिशा दें। जब दर्शक गुणवत्ता चुनेंगे, उद्योग भी अनुकूलित होगा। भोजपुरी को ‘लोक संस्कृति और साहित्य का प्रतीक’ बनाना होगा, न कि अश्लीलता का।
लेकिन सबको एक बात समझने की जरूरत है कि अश्लीलता का ठप्पा भाषा का नहीं, बल्कि उसके कुछ व्यावसायिक उत्पादों और सामाजिक-आर्थिक दबावों का है। साहित्यिक पुनरुत्थान, सरकारी नीतियों, शिक्षा सुधार और युवा ऊर्जा से इसे हटाया जा सकता है। 20 करोड़ से अधिक बोलने वालों वाली यह भाषा अपनी असली पहचान सामाजिक जागरण और सांस्कृतिक गौरव के साथ चमक सकती है। बदलाव संभव है, लेकिन इसके लिए सामूहिक इच्छाशक्ति, निरंतर प्रयास और दृष्टिकोण परिवर्तन की जरूरत है। जब हम मांग बदलेंगे, तो उद्योग भी बदलेगा


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