सतुआ की कहानी, भोजपुरी-बिहारी संस्कृति का इंस्टेंट सुपरफूड

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नई दिल्ली/पटना: सत्तू, जिसे भोजपुरी भाषा में ‘सतुआ’ या ‘सतवा’ कहा जाता है, यह चने-जौ का एक साधारण आटा ही नहीं है बल्कि बिहार, पूर्वांचल और भोजपुरी संस्कृति का प्राण है। सूखे भुने चने (या जौ, मक्का) को पीसकर बनाया जाने वाला यह पाउडर गर्मी के मौसम में ठंडा सरबत, लिट्टी-चोखा का भरावन, पराठा, लड्डू या चोखा आदि हर रूप में भोजपुरिया परिवारों का साथी है। इसे ‘गरीब का प्रोटीन’ या ‘बिहार का टॉनिक’ भी कहते हैं। लेकिन इसकी कहानी केवल खाने की नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी सभ्यता, योद्धाओं, किसानों और राजनीति की है। आज जब पूरी दुनिया सुपरफूड की तलाश में है, सत्तू हमें याद दिलाता है कि हमारा अपना ‘इंस्टेंट फूड’ कितना प्राचीन और शक्तिशाली है।

एक मिनट में तैयार होने वाला इंस्टेंट ड्रिंक
यह भुने हुए चने या जौ का आता होता है, जो प्रोटीन, फाइबर और ऊर्जा से भरपूर होता है। सत्तू को पानी, नमक, नींबू या गुड़ के साथ मिलाकर तुरंत पी सकते हैं. यह गर्मियों में एक बेहतरीन और सस्ता पेय भी है। व्यस्त जीवनशैली में यह झटपट बनने वाला हेल्दी विकल्प है। सत्तू शरीर को ठंडक देता है, पाचन सुधारता है और लंबे समय तक पेट भरा रखता है।

वैदिक काल से मगध तक का सफर
सत्तू शब्द संस्कृत के ‘सक्तु’ या ‘सक्तुक’ से आया है, जिसका अर्थ है भुना हुआ अनाज (खासकर जौ) जिसे पीसकर आटा बनाया जाए। आयुर्वेद ग्रंथों, चरक संहिता, अष्टांग हृदय और सुश्रुत संहिता में ‘सक्तु’ का वर्णन मिलता है। वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व) में जौ को भूनकर ‘सक्तु’ बनाया जाता था, जो सत्तू का पूर्वज माना जाता है। कोलिन टेलर सेन की किताब Feasts and Fasts: A History of Food in India के अनुसार, चना (बंगाल ग्राम) इंडस घाटी सभ्यता (4000 ईसा पूर्व) में पश्चिम एशिया से आया और उसका आटा इस्तेमाल होता था। के.टी. आचार्य की Indian Food Tradition: A Historical Companion में 16वीं शताब्दी के एक ग्रंथ का हवाला है, जिसमें इंडो-गंगा मैदान में सत्तू को लोकप्रिय भोजन बताया गया है। मोरक्को के यात्री इब्न बतूता (14वीं शताब्दी) ने भी चने का उल्लेख किया है।

मगध क्षेत्र (आधुनिक बिहार) को सत्तू का जन्मस्थान माना जाता है। विकिपीडिया और स्थानीय स्रोतों के अनुसार, नेपाल के मधेश प्रांत और बिहार में यह सबसे पुराना रूप है। कुछ लोककथाएँ इसे तिब्बत के ‘त्सम्पा’ (Tsampa) से जोड़ती हैं, भिक्षु यात्रियों का स्टेपल फूड। प्रोफेट मुहम्मद के साथियों ने भी ‘सवीक’ (barley sattu) का इस्तेमाल किया था। एक रोचक कथा है कि रेगिस्तान में भूखे यात्रियों ने रेत में पड़े अनाज को पानी में मिलाकर खाया, जिससे ‘सवीक’ नाम पड़ा।

भोजपुरियों में सत्तू 5 शताब्दियों से
बिहार और आसपास के क्षेत्रों में सत्तू 5 शताब्दियों से चला आ रहा है। स्वराज्य पत्रिका के अनुसार, यह कुषाण साम्राज्य के अंत तक सैनिकों की राशन था। कालिंग साम्राज्य के नाविक और व्यापारी इसे समुद्री यात्राओं पर ले जाते थे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में जगदीशपुर (आरा, बिहार) के कुंवर सिंह ने लिट्टी-चोखा और सत्तू के सहारे ब्रिटिश सेना (मेजर विन्सेंट) से महीनों लड़ाई लड़ी। सत्तू ने न केवल भूख मिटाई बल्कि ऊर्जा भी दी क्योंकि इसमें पकाने की जरूरत नहीं। कुछ जगहों पर मिलता है कि 1999 के कारगिल युद्ध में लद्दाख स्काउट्स ने भी ‘त्सम्पा’ (सत्तू) का इस्तेमाल किया। 1962 में चीनी सेनाओं के खिलाफ मिली करारी हार के बाद 1963 में गठित इस बहुचर्चित इकाई ने यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि वहां तैनात छोटी बटालियन को न केवल गोला-बारूद और सूचना की आपूर्ति मिले, बल्कि भोजन भी मिले विशेष रूप से सत्तू।

कुषाण साम्राज्य में ही सत्तू था मुख्य भोजन
दरअसल, हमारे पूर्वज इस तथ्य से बहुत पहले ही परिचित थे। कुषाण साम्राज्य के अंत तक सत्तू उनका मुख्य भोजन बन चुका था। कहा जाता है कि उस समय कलिंग के नाविक और सैनिक लंबी समुद्री यात्राओं पर सत्तू और चूड़ा भरकर बोरे ले जाया करते थे। मौर्य काल में सत्तू युद्ध पर जाने वाले सैनिकों के वेतन का हिस्सा होता था, ठीक उसी प्रकार जैसे तांग राजवंश की सेना को चिकन सूप दिया जाता था। पोषक तत्वों से भरपूर इस अनोखे मिश्रण को देखते हुए छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध के दौरान सत्तू को अपना मुख्य भोजन चुना। सबसे बड़ा फायदा यह था कि सत्तू, जो बालू यानी रेत में भुने चने का बारीक पाउडर होता है, बिना पकाए भी खाया जा सकता था।
किसानों-ब्राह्मणों के नाश्ते से हुई शुरुआत
बहुत से लोग मानते हैं कि सत्तू का आविष्कार मुख्य रूप से यात्रा के दौरान कामकाजी वर्ग, खासकर किसानों और ब्राह्मणों के लिए किया गया था, न कि सिर्फ सुबह के नाश्ते के रूप में। उस समय ब्राह्मण वर्ग द्वारा सत्तू को ज्यादा पसंद किए जाने से इसकी लोकप्रियता बढ़ी। सराय और आरामघर बहुत कम थे और गरीब लोग वहाँ ठहर भी नहीं पाते थे। साथ ही धार्मिक मान्यताओं के कारण कई लोग सार्वजनिक स्थानों पर भोजन नहीं करते थे। ऐसे में सत्तू यात्रियों की सबसे विश्वसनीय साथी बन गया। इसमें सिर्फ पानी मिलाना पड़ता था और वह पानी चाहे कहीं से भी आता, शुद्ध माना जाता था। यह न सिर्फ पेट भरता था बल्कि मन को भी संतोष और तृप्ति प्रदान करता था।

भोजपुरी क्षेत्रों में क्यों हुआ इतना प्रसिद्ध?
बिहार और पूर्वांचल की जलवायु गर्म और शुष्क है। लू (गर्म हवा) और गर्मी में सत्तू का ठंडा सरबत शरीर को ठंडक देता है, पित्त दोष संतुलित करता है और डिहाइड्रेशन रोकता है। किसान और मजदूर इसे खेतों में ले जाते थे, सस्ता, हल्का, लंबे समय तक खराब न होने वाला। कोई चूल्हा-गैस नहीं, बस पानी मिलाओ और खा लो। यही वजह है कि यह ‘किसान का खाना’ बन गया।

संस्कृति का हिस्सा भी सतुआ
भोजपुरी भाषी क्षेत्र में नई फसल आने पर सत्तू का भोग लगाया जाता है, घड़ा-पंखा-आम के टिकोरे के साथ दान किया जाता है। लोकगीत में गाया जाता है ‘बाबा घरे रहलीं त दूध भात खइलीं, आरे सइयाँ घरे सतुआ मोहाल’। सत्तू सात अनाज (चना, जौ, मक्का, बाजरा आदि) से भी बनता है, जो पौष्टिकता बढ़ाता है। लिट्टी-चोखा, सत्तू पराठा, सत्तू लड्डू आदि भोजपुरी रसोई का अभिन्न अंग भी है।

खास, मनोरंजक और रोचक तथ्य
राजनिति में –1990 में लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री आवास से सूखे मेवे हटाकर सत्तू रखवा दिया ‘मैं किसान-मजदूर का नेता हूँ’। उनके बेटे तेज प्रताप यादव ने 2018-20 में ‘सत्तू पार्टी’ आयोजित की। मोदी जी के लिट्टी-चोखा खाने पर भी सत्तू-राजनीति छिड़ी।
महिलाओं का सशक्तिकरण: नालंदा (बिहार) में महिलाएँ पारंपरिक ‘जाता’ (पत्थर की चक्की) से सत्तू पीसती हैं। इससे मशीन वाले सत्तू से बेहतर स्वाद और पोषण मिलता है। द बेटर इंडिया (2017) ने इसे ‘प्राचीन परंपरा’ बताया।
त्योहार का मज़ा: सतुआन पर सत्तू के लड्डू (घी-गुड़ से), चोखा और सरबत बनते हैं। बच्चे टिकोरे चुराते-खाते थे, एकदम भोजपुरी बचपन की याद!
आधुनिक ट्विस्ट: लॉकडाउन में सत्तू शेक, एनर्जी बार और स्मूदी बने। शिल्पा शेट्टी और आयुष्मान खुराना ने इसे प्रमोट किया। अब ब्रांडेड सत्तू महंगे दामों पर बिकता है, लेकिन असली स्वाद गाँव की चूल्हा-रेत वाली भूनाई में है।
आयुर्वेदिक चमत्कार: पेट की समस्याएँ, एसिडिटी, कब्ज़, लिवर – सब ठीक। प्रोटीन, फाइबर, आयरन से भरपूर। गर्मी में लू नहीं लगती।

पोषण प्रोफाइल और वैज्ञानिक डेटा
आधुनिक रिसर्च के मुताबिक, 100 ग्राम चने के सत्तू में औसतन 413 किलो कैलोरी एनर्जी, 25 ग्राम प्रोटीन, 64 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 18 ग्राम डाइटरी फाइबर, 5.5 ग्राम फैट और जीरो कोलेस्ट्रॉल पाया जाता है। इसमें आयरन (8.7 मिलीग्राम), मैग्नीशियम (270 मिलीग्राम), कैल्शियम (380 मिलीग्राम तक) और पोटैशियम (825 मिलीग्राम) भरपूर है।
कई अध्ययनों में प्रोटीन की मात्रा 20-26 ग्राम प्रति 100 ग्राम बताई गई है। केवल 30 ग्राम सत्तू (लगभग 4 चम्मच) में 6-8 ग्राम प्रोटीन मिलता है जो एक अंडे के बराबर है, लेकिन पूरी तरह वेजिटेरियन और बहुत सस्ता भी है। फाइबर की मात्रा इतनी ज्यादा है कि यह ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है और कब्ज जैसी समस्याओं में रामबाण साबित होता है। सत्तू लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स फूड है जोकि डायबिटीज पेशेंट्स के लिए आदर्श है। गर्मी में लू लगने से बचाता है क्योंकि यह बॉडी को हाइड्रेट रखता है।
रिसर्च गेट (2025) के पेपर ‘Sattu, the Indigenous Cold Drink of Bihar’ में लिखा है कि रोजाना सेवन से ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों कंट्रोल होते हैं। हाई फाइबर और लो सोडियम होने से यह कोलेस्ट्रॉल कम करता है, पाचन सुधारता है और सूजन घटाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में ‘सक्तु’ को पित्त दोष नाशक, बलवर्धक और गर्मी में ठंडक देने वाला बताया गया है।

ग्लोबल सुपरफूड बनता सत्तू
आज सत्तू केवल गाँव का खाना नहीं रहा। डेटाइंटेलो रिपोर्ट (2025) के अनुसार, सत्तू ड्रिंक्स मार्केट 2025 में 1.8 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2034 तक 4.1 बिलियन डॉलर हो जाएगा (CAGR 9.6%)। भारत 61.4% शेयर के साथ ग्लोबल लीडर है, बिहार-यूपी में छोटे उद्यमियों को सरकारी सब्सिडी मिल रही है।
एक क्लिक से आप भी ले सकते हैं स्वाद
अमेजन, फ्लिपकार्ट और ब्लिंकिट पर ब्रांडेड सत्तू शेक, एनर्जी बार और स्मूदी बिक रहे हैं। कई सेलिब्रिटी इसे प्रमोट कर रहे हैं। लॉकडाउन के बाद इसकी डिमांड बढ़ी। अब सत्तू को रागी, हल्दी, गुड़ से फोर्टिफाई कर वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स बनाए जा रहे हैं जो डायबिटीज, वेट लॉस और स्पोर्ट्स न्यूट्रिशन में पॉपुलर हैं।
इसलिए सत्तू केवल खाना नहीं, बल्कि मगध की मिट्टी, भोजपुरी लोकगीतों, किसान की मेहनत और योद्धाओं की हिम्मत का प्रतीक है। सतुआन के त्योहार से लेकर लालू-तेजप्रताप की राजनीति तक, यह हमें जड़ों से जोड़ता है। आज भी गर्मी में सत्तू सरबत पीते हुए हम महसूस करते हैं, यह नहीं बदला, हमारी संस्कृति का हिस्सा है।

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