नई दिल्ली/पटना: भोजपुरी सिनेमा भारतीय सिनेमा की उस शाखा का नाम है जो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की मिट्टी, भाषा और संस्कृति को सबसे करीब से प्रतिबिंबित करता है। गंगा-घाट की भावनाओं, गांव की सादगी, प्रेम की मासूमियत और सामाजिक संघर्ष को लेकर शुरू हुई यह इंडस्ट्री आज स्टार सिस्टम, एक्शन और संगीत पर आधारित एक अलग पहचान बना चुकी है। 1962 से शुरू होकर 2000 के दशक में चरम पर पहुंची और फिर कुछ चुनौतियों का सामना करती हुई आज भी दर्शकों के दिल में जगह बनाए हुए है।
गंगा मइया से सैयां हमार तक
भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत 1962 में फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो’ से हुई। निर्देशक कुंदन कुमार की यह फिल्म गंगा की भक्ति और ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखकर बनी थी। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे लोगों का भी इसमें योगदान माना जाता है। शुरुआती दौर में फिल्में कम बनती थीं,
1977 से 2001 तक औसतन सिर्फ 6 फिल्में प्रति वर्ष
ये फिल्में मुख्य रूप से लोककथाओं, सामाजिक मुद्दों और भावनात्मक कहानियों पर आधारित होती थीं। संगीत में मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर जैसी बड़ी आवाजें शामिल होती थीं। लेकिन 90 के दशक में इंडस्ट्री लगभग ठप पड़ गई। बजट की कमी, वितरण की समस्या और बॉलीवुड के दबदबे ने भोजपुरी सिनेमा को पीछे धकेल दिया।
पुनरुत्थान का स्वर्णिम काल (2001-2010)
2001 में फिल्म ‘सैयां हमार’ ने भोजपुरी सिनेमा को नई जिंदगी दी। निर्देशक मोहन प्रसाद की इस फिल्म ने रवि किशन को सुपरस्टार बना दिया। इसके बाद ‘ससुरा बड़ा पैसावाला’ (2005), ‘पंडितजी बताई ना बियाह कब होई’ (2005) और ‘गंगा’ (2006) जैसी फिल्मों ने रिकॉर्ड तोड़े। ये फिल्में बहुत कम बजट (कई लाख रुपये) में बनीं लेकिन बिहार, झारखंड, पूर्वी यूपी और दिल्ली-मुंबई के प्रवासी दर्शकों में खूब चलीं। ‘ससुरा बड़ा पैसावाला’ जैसी फिल्म ने 35 करोड़ रुपये तक का कारोबार किया, जो उस समय के लिए जबरदस्त था।
इस दौर में निरहुआ (दिनेश लाल यादव), खेसारी लाल यादव, पवन सिंह, रवि किशन और आम्रपाली दुबे जैसे कलाकारों ने स्टारडम हासिल किया। फिल्मों में डबल मीनिंग वाले गाने, एक्शन और रोमांस का मिश्रण दर्शकों को आकर्षित करने लगा। भोजपुरी सिनेमा ने बी और सी सर्किट के थिएटरों को भरना शुरू कर दिया, जहां बॉलीवुड की कई फिल्में भी संघर्ष कर रही थीं।
वर्तमान स्थिति और चुनौतियां
2025-26 तक भोजपुरी सिनेमा में मिश्रित स्थिति है। एक ओर निरहुआ, खेसारी लाल यादव, पवन सिंह और आम्रपाली दुबे जैसे सितारे अभी भी दर्शकों को खींच रहे हैं। 2026 में ‘विवाह 4’, ‘अग्नि परीक्षा’, ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 5’ जैसी फिल्मों की चर्चा है। दूसरी ओर, इंडस्ट्री कई चुनौतियों से जूझ रही है। सबसे बड़ी समस्या सिंगल स्क्रीन थिएटरों का बंद होना है। कोविड के बाद मल्टीप्लेक्स में भोजपुरी फिल्मों को जगह मिलना मुश्किल हो गया है। कई फिल्में अब सीधे यूट्यूब या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो रही हैं।
दूसरी चुनौती अश्लीलता और फूहड़पन की छवि है। कुछ फिल्मों और गानों में अश्लीलता ने पूरे उद्योग की साख को नुकसान पहुंचाया है। रवि किशन जैसे दिग्गज कलाकार भी सार्वजनिक रूप से इस पर नाराजगी जता चुके हैं। बजट अब बढ़ गया है, बड़े स्टार 20 से 50 लाख रुपये प्रति फिल्म ले रहे हैं, लेकिन रिटर्न की गारंटी नहीं रही। वितरण और मार्केटिंग की कमी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। फिर भी, भोजपुरी सिनेमा प्रवासी भारतीयों (मॉरिशस, सूरीनाम, फिजी आदि) तक पहुंचकर अपनी सांस्कृतिक भूमिका निभा रहा है।
गुणवत्ता और विस्तार की जरूरत
भोजपुरी सिनेमा का भविष्य बेहतर कहानियों, बेहतर तकनीक और मल्टीप्लेक्स में एंट्री पर निर्भर करता है। आम्रपाली दुबे जैसी अभिनेत्रियां कह चुकी हैं कि अगर बिहार, यूपी और झारखंड सरकारें साथ आएं तो इंडस्ट्री नई ऊंचाई छू सकती है। आज जरूरत है, लोककथाओं और सामाजिक मुद्दों पर वापसी की, बिना अश्लीलता के मनोरंजन की, और युवा पीढ़ी को जोड़ने वाली कहानियों की। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (यूट्यूब, ओटीटी) एक नया अवसर हैं, लेकिन थिएट्रिकल अनुभव को भी बचाना जरूरी है।
भोजपुरी सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि पूर्वांचल की आत्मा है। यह उस किसान, मजदूर और प्रवासी की आवाज है जो अपनी भाषा में अपनी कहानी सुनना चाहता है। अगर गुणवत्ता, मूल्यों और नवाचार को अपनाया जाए तो यह इंडस्ट्री न सिर्फ बचेगी, बल्कि पूरे देश और दुनिया में अपनी अलग जगह बनाएगी। भोजपुरी सिनेमा की यात्रा लोक से स्टारडम तक की है, लेकिन अब स्टारडम से संस्कृति की ओर लौटने का समय है। दर्शक अब बेहतर कहानी, सार्थक संदेश और सिनेमैटिक अनुभव चाहते हैं। अगर इंडस्ट्री इस बदलाव को स्वीकार करेगी तो 2026 के बाद का दशक इसके लिए स्वर्णिम साबित हो सकता है।

