लोकसंस्कृति के नायक बनाम वंचितों की संघर्ष गाथा पर विचारोत्तेजक गोष्ठी, इतिहास लेखन और नायकत्व पर उठे महत्वपूर्ण प्रश्न
कुशीनगर: लोकरंग – 2026 के दूसरे दिन ‘लोकसंस्कृति के नायक बनाम वंचितों की संघर्ष गाथा’ विषय पर एक गंभीर और विचारोत्तेजक गोष्ठी आयोजित की गई। देशभर से आए विद्वानों, साहित्यकारों और शोधार्थियों ने लोकनायकों, वंचित समाज और उनके इतिहास की उपेक्षा पर गहन विमर्श किया। गोष्ठी का केंद्रीय प्रश्न यह रहा कि किन परिस्थितियों में समाज का एक तबका बाग़ी बनता है और क्यों उनके नायकों को मुख्यधारा के इतिहास में समुचित स्थान नहीं मिल पाता।
लोकरंग आयोजन के अध्यक्ष सुभाष चंद्र कुशवाहा ने प्रारंभ में वंचित नायकों के निरूपण में लोकसाहित्य की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि लोक परंपराएँ ही वह आधार हैं, जिनके माध्यम से हाशिए के समाज अपने नायकों और संघर्षों को जीवित रखते हैं। उनका वक्तव्य आगे के सभी वक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु साबित हुआ।

प्रारंभिक वक्तव्य में डॉ रामायण राम ने स्पष्ट किया कि न्याय के अभाव में समाज का एक वर्ग बगावत की राह पकड़ने को विवश हो जाता है। उन्होंने कहा कि लोक साहित्य इन संघर्षों की सजीव अभिव्यक्ति है, जिसमें वंचितों की पीड़ा, प्रतिरोध और अस्मिता की सच्ची गाथाएँ दर्ज हैं।
डॉ रामनरेश राम ने गांवों की बदलती संरचना के संदर्भ में लोकसंस्कृति के रूपांतरण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लोक संस्कृति हमेशा जनतांत्रिक नहीं रही है, इसलिए “जनसंस्कृति” की अवधारणा का उभार आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि आज वंचित समुदायों के भीतर से नए शोधार्थी उभरकर अपने नायकों को नए सिरे से गढ़ रहे हैं। भारत की बहुलतावादी संरचना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां एक नहीं, बल्कि अनेक संस्कृतियां हैं, और वंचित वर्गों के भीतर भी बहुस्तरीय सांस्कृतिक परतें मौजूद हैं।
वरिष्ठ पत्रकार दया शंकर राय ने जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेख़्त की कविता के संदर्भ से अपनी बात शुरू करते हुए सवाल उठाया कि भीमराव अंबेडकर को राष्ट्रीय नायक के रूप में व्यापक स्वीकृति क्यों नहीं मिल पाई। उन्होंने कहा कि केवल मूर्तियाँ स्थापित कर देने से नायकत्व की रक्षा नहीं होती, बल्कि उनके विचारों को समाज में जीवित रखना जरूरी है।
योगेंद्र चौबे ने संस्कृत नाटकों की चर्चा करते हुए कहा कि उनमें लोकगाथाओं की उपस्थिति तो है, लेकिन लोकचेतना का अभाव दिखाई देता है। इसके विपरीत वंचित समुदायों ने अपने इतिहास को लोकगाथाओं में सहेजकर रखा है, जो उनके संघर्ष और अस्तित्व का सशक्त प्रमाण हैं।
सरिता भारत ने अपने वक्तव्य में कहा कि यदि समाज अपने संघर्षों का इतिहास दर्ज नहीं करेगा, तो वह बंजर हो जाएगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अभिजात्य वर्ग ने वंचितों के इतिहास को व्यवस्थित रूप से नष्ट किया है। बंजारा समुदाय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उनके नायकों ने व्यापार, लोककलाओं और पारंपरिक ज्ञान को समृद्ध किया, लेकिन इतिहास में उनका उल्लेख लगभग नदारद है।
मुख्य अतिथि प्रो सुभाष चन्द्र सैनी ने इस धारणा को खारिज किया कि लोकनायकों की प्रामाणिकता केवल दस्तावेजों से ही सिद्ध हो सकती है। उन्होंने कहा कि दस्तावेज भी अभिजात्य वर्ग के नियंत्रण में बने उपकरण हैं। वंचित समाज द्वारा अपने नायकों का अतिरंजित वर्णन एक प्रकार का सांकेतिक रूपक होता है, जो उनके सामाजिक सत्य को व्यक्त करता है। उन्होंने पान सिंह तोमर का उदाहरण देते हुए ‘बाग़ी’ और ‘डाकू’ जैसी शब्दावलियों के राजनीतिक अर्थ को स्पष्ट किया।
इसके साथ ही उन्होंने लोककथाओं के प्रसिद्ध पात्रों हीर-रांझा और दुल्ला भाटी का उल्लेख करते हुए बताया कि लोक समाज अपने नायकों को प्रेम, प्रतिरोध और न्याय के प्रतीकों के रूप में गढ़ता है, भले ही उन्हें औपचारिक इतिहास में स्थान न मिले। उन्होंने कहा कि लोकनायक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं, जबकि अभिजात्य वर्ग सत्ता, धन और धर्मान्धता के लिए। लोकगीतों को उन्होंने लोक की ऊर्जा और चेतना का महत्वपूर्ण स्रोत बताया।

विशिष्ट वक्ता प्रो दिनेश कुशवाह ने कहा कि वंचितों की संघर्ष गाथा कोई नई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है। उन्होंने गौतम बुद्ध, कबीर और रैदास के संघर्षों को इसी क्रम में रखते हुए कहा कि ये सभी वंचित चेतना के प्रतिनिधि रहे हैं। उन्होंने नायकों के निरूपण में जातिवादी मानसिकता की भी आलोचना की और कहा कि इतिहास लेखन में यह पूर्वाग्रह आज भी प्रभावी है, जिससे वंचित नायकों को उचित स्थान नहीं मिल पाता।
अध्यक्षता कर रहे प्रो अनिल सिंह ने अपने संबोधन में कहा, “यदि हिरण अपना इतिहास नहीं लिखेंगे, तो बहेलिये उसे अपने अनुसार लिखेंगे।” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लोक समाज अपने नायकों को दर्ज नहीं करेगा, तो उनके अस्तित्व के लुप्त होने का खतरा बना रहेगा।
गोष्ठी में डॉ पूनम सिंह, वीर बहादुर महतो सहित कई विद्वानों ने भी अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार रामजी यादव ने किया।
समग्र रूप से यह गोष्ठी लोकसंस्कृति, इतिहास लेखन और वंचित समाज के अंतर्संबंधों को समझने का एक सशक्त मंच बनी। इसमें यह स्पष्ट हुआ कि समावेशी और जनपक्षधर इतिहास लेखन के बिना न तो लोकनायकों की सही पहचान संभव है और न ही समाज में न्यायपूर्ण चेतना का विस्तार।

