माई कहे ..
माई कहे ..कि
ए बाबू, जवना के तू घर कहेलs,
उ घर ना नू ह हो, उ फ्लैट हवे।
घर में त आँगना होला,
दलान होला,
बैठक अउर दुआर होला।
आँगना में हैंडपम्प,
अउरी दुअरा पर अमरूद के पड़े होला,
घर के बगल में सब्जी – फरहरी वाला कोला होला,
नेमुआ होला, पपीता होला
अउर आम के पेड़ पर टिकोरा होला।
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नाँद में सानी-पानी खात गाय,
सांझ- सबेरे, दूध देले..
ओकर दुधवा केतना मीठ होला..।
ए बाबू, सुन$ ..
ई जवन पाकेट वाला दूधवा तहन लोग पिये ल ..
उ दूध जइसन लागे ला जरूर,
लेकिन ओइसन कहाँ होला?
ए बाबू,
आ हई जवन अपना फ्लैटवा के बगल वाला फ्लैट में रहे वाला लोग के तू पड़ोसी कहेल,
पड़ोसी अइसन कहाँ होला?
गोतिया- पड़ोसी के त हर बात पता होला,
सुख -दुःख, निमन- बाउर सब में लोग साथ साथ होला,
कबो कबो झगड़ा, अउर रार होला।
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ए बाबू, सुनs ..
हई बाउंडरी के भीतर के कुछ फ्लैटवा के
जवन तू सोसाइटी कहेल ..
समाज अइसन कहाँ होला?
सही कह तs,
सोसाइटी अउर समाज त गांवे में होला!
जँहवां, हर गाँव में कई कई गो टोला होला!
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