महेंद्र मिसिर, पूरबी के सम्राट, जिनकी आवाज आज भी सात समंदर पार गूंजती है

Date:

प्रेम, विरह, भक्ति, राष्ट्रप्रेम और लोकजीवन को गीतों में पिरोने वाले ऐसे लोकनायक, जिन्होंने भोजपुरी को गांव की चौपाल से विश्व मंच तक पहुंचाया

Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला में आज पढ़िए उस महान लोककवि, संगीतकार, लोकगायक और सांस्कृतिक योद्धा की कहानी, जिसके बिना भोजपुरी साहित्य और लोकसंगीत का इतिहास अधूरा माना जाता है। पंडित महेंद्र मिसिर केवल एक गीतकार नहीं थे, बल्कि भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक आत्मा थे। उन्होंने अपनी अमर ‘पूरबी’ गायकी, कालजयी गीतों और साहित्यिक कृतियों के माध्यम से भोजपुरी भाषा को वह सम्मान दिलाया, जिसकी गूंज आज भी भारत ही नहीं बल्कि मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, गुयाना, नेपाल और दुनिया भर के प्रवासी भोजपुरी समाज में सुनाई देती है।

भोजपुरी में अगर भिखारी ठाकुर रंगमंच के जनक माने जाते हैं, तो महेंद्र मिसिर को भोजपुरी लोकसंगीत का शिखर पुरुष, पूरबी का जनक, पूरबी का सम्राट और भोजपुरी के पितामह गीतकार कहा जाता है। उनकी रचनाओं ने भोजपुरी को केवल लोकभाषा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक चेतना की भाषा बना दिया।
महेंद्र मिसिर का जन्म बिहार के सारण जिले के काही मिश्रवलिया गांव में हुआ। उनकी जन्मतिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है। अधिकांश शोधकर्ता 16 मार्च 1888 का उल्लेख करते हैं, जबकि कुछ विद्वान 1886 अथवा 1876 का भी उल्लेख करते हैं। लेकिन इसमें कोई विवाद नहीं कि वे उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के सबसे प्रभावशाली भोजपुरी रचनाकारों में थे।

उन्होंने औपचारिक शिक्षा बहुत अधिक नहीं पाई, लेकिन स्वाध्याय के बल पर संस्कृत, हिंदी, भोजपुरी, उर्दू, फ़ारसी, बांग्ला, अवधी, ब्रज और अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत के जानकार, कुशल गायक, वादक, कथावाचक और लोकजीवन के गंभीर अध्येता भी थे।

ये भी पढ़ें- प्रकाश उदय, जिनकी कलम ने भोजपुरी कविता को दी नई संवेदना

लोककंठ में अमर, पर इतिहास में उपेक्षित महेन्द्र मिसिर पर नए विमर्श की जरूरत

भोजपुरी की आत्मा बनी ‘पूरबी’

महेंद्र मिसिर का नाम लेते ही सबसे पहले ‘पूरबी’ की याद आती है। पूरबी केवल गीत नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की भावनात्मक धरोहर है। प्रेम, विरह, बिछोह, स्मृति, मिलन, भक्ति और लोकजीवन की सूक्ष्म अनुभूतियों को जिस संवेदनशीलता से महेंद्र मिसिर ने शब्द दिए, वह अद्वितीय है।

उनके गीतों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा है। उसमें लोक की सहजता है, लेकिन साहित्य की ऊंचाई भी है। उसमें संगीत का अनुशासन है, लेकिन गांव की मिट्टी की खुशबू भी है। यही कारण है कि उनके गीत पढ़ने से अधिक गाए और सुने जाते रहे। आज भी जब किसी भोजपुरी सांस्कृतिक आयोजन में पूरबी गूंजती है, तो अनायास ही महेंद्र मिसिर का स्मरण हो जाता है।

सिर्फ प्रेमगीत नहीं, समाज का दस्तावेज़ हैं उनकी रचनाएं

महेंद्र मिसिर को अक्सर प्रेम और विरह के कवि के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उनका साहित्य इससे कहीं अधिक व्यापक है। उन्होंने ग्रामीण जीवन, किसानों की पीड़ा, स्त्री की संवेदना, सामाजिक असमानता, नैतिक मूल्यों, धार्मिक आस्था और मानवीय रिश्तों को भी अपनी रचनाओं का विषय बनाया।

ये भी पढ़ें- भोजपुरी के शेक्सपियर क्यों कहलाए भिखारी ठाकुर?

उनके गीतों में गांव का परिवेश जीवंत हो उठता है। खेत, खलिहान, नदी, आंगन, सावन, कजरी, बिरहा और लोकसंस्कार- सब कुछ उनकी रचनाओं में सहज रूप से उपस्थित है।

स्त्री मन की अद्भुत समझ

महेंद्र मिसिर की सबसे बड़ी साहित्यिक विशेषताओं में एक यह भी है कि उन्होंने स्त्री के मन की भावनाओं को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया। उनके गीतों में स्त्री केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रेम, प्रतीक्षा, त्याग, संघर्ष और आत्मसम्मान की जीवंत छवि बनकर सामने आती है।

भोजपुरी साहित्य के अनेक विद्वान मानते हैं कि पुरुष रचनाकारों में स्त्री मन की जितनी गहरी समझ महेंद्र मिसिर में दिखाई देती है, वह अपने समय में दुर्लभ थी।

Mahendra Mishra Ki Pratinidhi Kavitayein महेंद्र मिश्र की प्रतिनिधि कविताएं  : Suresh Kumar Mishra सुरेश कुमार मिश्र: Amazon.in: किताबें

लोकधुनों को दी शास्त्रीय गरिमा

महेंद्र मिसिर ने भोजपुरी लोकसंगीत को केवल लोकप्रिय नहीं बनाया, बल्कि उसे सांगीतिक अनुशासन भी दिया। वे राग, ताल और लय के उत्कृष्ट जानकार थे। उन्होंने पूरबी, कजरी, चैता, फगुआ, निर्गुण, भजन, दादरा, ठुमरी, ग़ज़ल और अनेक लोकविधाओं में रचनाएं कीं। उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत की गहराई और लोकधुनों की मिठास का ऐसा संगम मिलता है, जो आज भी संगीतकारों के लिए अध्ययन का विषय है।

‘अपूर्व रामायण’ से साहित्य को नई दिशा

महेंद्र मिसिर ने केवल गीत ही नहीं लिखे। उन्होंने भोजपुरी साहित्य को अनेक महत्वपूर्ण कृतियां दीं। उनकी प्रमुख पुस्तकों में अपूर्व रामायण, महेंद्र मंजरी, महेंद्र विनोद, महेंद्र गीतावली, महेंद्र मनोरंजन, कृष्ण गीतावली, नीति मंजरी और अन्य कृतियां शामिल हैं।

ये भी पढ़ें- मोहम्मद खलील: जिनकी मखमली आवाज ने भोजपुरी लोकगायकी को दी नई गरिमा

भोजपुरी के अनेक साहित्यकार ‘अपूर्व रामायण’ को भोजपुरी का पहला महाकाव्य मानते हैं। यद्यपि इस विषय पर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं, लेकिन इसकी साहित्यिक महत्ता निर्विवाद है।

राष्ट्रप्रेम भी था जीवन का आधार

महेंद्र मिसिर केवल साहित्यकार नहीं थे। वे अपने समय की राष्ट्रीय चेतना से भी गहराई से जुड़े हुए थे। अनेक जीवनीकारों और लोकपरंपराओं में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों की आर्थिक सहायता की। उनके बारे में यह लोकप्रिय लोकश्रुति भी प्रचलित है कि अंग्रेजी शासन की आर्थिक व्यवस्था को चुनौती देने के उद्देश्य से उन्होंने गुप्त रूप से नकली नोट छापे, जिसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

इतिहासकार इन घटनाओं के विवरणों की अलग-अलग व्याख्या करते हैं, लेकिन इस बात पर सहमति है कि महेंद्र मिसिर का व्यक्तित्व राष्ट्रप्रेम और सामाजिक प्रतिबद्धता से ओत-प्रोत था।

भोजपुरी के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नायक

महेंद्र मिसिर ऐसे समय में सामने आए जब भोजपुरी को साहित्यिक भाषा के रूप में पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा था। उन्होंने लोकभाषा में गंभीर साहित्य रचकर यह सिद्ध किया कि भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि उच्च कोटि के साहित्य और संगीत की भी भाषा है। उन्होंने लोकधुनों को नया संस्कार दिया, गीतों को साहित्यिक ऊंचाई दी और भोजपुरी समाज में सांस्कृतिक आत्मविश्वास जगाया।

संगीत की कई विधाओं पर समान अधिकार

महेंद्र मिसिर केवल पूरबी तक सीमित नहीं थे। उन्होंने अनेक लोक और अर्धशास्त्रीय विधाओं में रचना की। इनमें प्रमुख हैं- पूरबी, कजरी, चैता, फगुआ, निर्गुण, भजन, कीर्तन, ग़ज़ल, दादरा, ठुमरी, बारहमासा, सोहर, विवाह गीत, दोहा, सवैया, कवित्त यही बहुआयामी प्रतिभा उन्हें अपने समय का अद्वितीय लोककलाकार बनाती है।

Front Cover

साहित्य की समृद्ध विरासत

महेंद्र मिसिर ने भोजपुरी साहित्य को अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ दिए। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं – अपूर्व रामायण (सात खंड)] महेंद्र मंजरी, महेंद्र विनोद, मेघनाथ वध, महेंद्र मयंक, मेघन कुसुम, महेंद्र रत्नावली, महेंद्र चंद्रिका, महेंद्र मनोरंजन, महेंद्र गीतावली (चार भाग), कृष्ण गीतावली, महात्मा दास रचना, नीति मंजरी, महेंद्र बालक नाटक संगीत आदि. इन रचनाओं से स्पष्ट होता है कि उनका साहित्य केवल लोकगीतों तक सीमित नहीं था। उन्होंने भक्ति, नीति, काव्य, रामकथा और सामाजिक विषयों पर भी महत्वपूर्ण लेखन किया।

भिखारी ठाकुर सहित कई पीढ़ियों पर प्रभाव

भोजपुरी लोकपरंपरा में यह माना जाता है कि महेंद्र मिसिर की गायकी और रचनाओं का प्रभाव बाद की पूरी पीढ़ी पर पड़ा। अनेक लोकगायक, रंगकर्मी और साहित्यकार उनकी रचनाओं से प्रेरित हुए। भिखारी ठाकुर सहित कई रचनाकारों ने उनके गीतों और संगीत परंपरा का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया है। आज भी भोजपुरी के अधिकांश लोकगायक किसी न किसी रूप में महेंद्र मिसिर की परंपरा से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।

सात समंदर पार भी जीवित है उनकी विरासत

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में जब लाखों भारतीय गिरमिटिया मजदूर मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, गुयाना और अन्य देशों में गए, तब वे अपने साथ अपनी भाषा, संस्कृति और लोकगीत भी ले गए। उन्हीं गीतों में महेंद्र मिसिर की पूरबियां भी शामिल थीं। आज भी प्रवासी भोजपुरी समाज के सांस्कृतिक आयोजनों में उनके गीत गाए जाते हैं। यह किसी भी लोककवि की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उसकी रचनाएं पीढ़ियों और महाद्वीपों की सीमाओं को पार कर जाएं।

महेंद्र मिसिर क्यों हैं आज भी प्रासंगिक?

आज भोजपुरी संगीत अक्सर बाजारवाद, तात्कालिक लोकप्रियता और अश्लीलता की बहसों के बीच खड़ा दिखाई देता है। ऐसे समय में महेंद्र मिसिर का साहित्य हमें यह सिखाता है कि लोकगीत लोकप्रिय भी हो सकते हैं और साहित्यिक भी; सरल भी हो सकते हैं और गंभीर भी; मनोरंजक भी हो सकते हैं और समाज को दिशा देने वाले भी। उनकी रचनाएं बताती हैं कि भाषा का सम्मान उसकी संवेदनशीलता, संस्कृति और साहित्यिक गरिमा से बढ़ता है, केवल लोकप्रियता से नहीं।

ये भी पढ़ें- डॉ. विश्वनाथ प्रसाद, जिन्होंने दुनिया को बताया कि भोजपुरी भी है वैज्ञानिक भाषा

भोजपुरी समाज के लिए महेंद्र मिसिर की विरासत

महेंद्र मिसिर केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा हैं। वे लोक और शास्त्र के बीच सेतु हैं। वे प्रेम और राष्ट्रप्रेम के कवि हैं। वे संगीत और साहित्य के साधक हैं। वे भोजपुरी अस्मिता के ऐसे प्रहरी हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मातृभाषा, लोकसंस्कृति और समाज के लिए समर्पित कर दी। आज भी जब कोई गायक पूरबी गाता है, जब कोई शोधार्थी भोजपुरी साहित्य पर काम करता है, जब कोई प्रवासी अपनी मिट्टी को याद करता है या जब कोई युवा भोजपुरी की गरिमा की बात करता है, तब कहीं न कहीं महेंद्र मिसिर की परंपरा जीवित दिखाई देती है।

इसीलिए महेंद्र मिसिर केवल इतिहास के एक लोककवि नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक चेतना, लोकस्मृति और स्वाभिमान के अमर प्रतीक हैं। उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल साहित्य नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा हैं।

महेंद्र मिसिर की विशेषताएं (एक नजर में)

  • पूरबी गायकी के सबसे बड़े पुरोधा
  • भोजपुरी के अमर लोककवि
  • उत्कृष्ट गायक, वादक और संगीतकार
  • आशुकवि और बहुभाषाविद्
  • ‘अपूर्व रामायण’ के रचनाकार
  • लगभग 14 महत्वपूर्ण कृतियों के सर्जक
  • राष्ट्रप्रेम और सामाजिक चेतना के कवि
  • लोकसंस्कृति के संवेदनशील व्याख्याकार
  • स्त्री मन के प्रभावशाली चित्रकार
  • भोजपुरी लोकसाहित्य के आधार स्तंभ
  • प्रवासी भोजपुरी समाज के सांस्कृतिक प्रतीक
  • आज भी लोकगायकों के प्रेरणास्रोत

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

लोकगीतों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली बिहार कोकिला विंध्यवासिनी देवी

पल्लवी कश्यप की रिपोर्ट Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला...

डॉ. सुनील कुमार पाठक: भोजपुरी साहित्य को वैचारिक ऊंचाई देने वाले साहित्य साधक

Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला 'भोजपुरी धुरंधर' में आज परिचय...