समीक्षक: निलय उपाध्याय
आज सुनील कुमार पाठक जी से मुलाकात हुई और सुबह सुंदर हो गई। उनकी किताब मिली। किताब भोजपुरी में है और इसका शीर्षक है—‘पढ़त-लिखत’, यानी पढ़ते-लिखते। उनकी एक चर्चित पुस्तक ‘छवि और छाप’ पहले पढ़ चुका हूँ और उस छवि की छाप आज भी मेरी आत्मा पर विद्यमान है।
इस किताब का शीर्षक अक्षयवर दीक्षित जी की कविता की इन पंक्तियों की याद दिलाता है—
“पढ़त-लिखत रहीं,
गुनत-मथत रहीं।”
इसे पढ़ते हुए लगा जैसे इन दो पंक्तियों में एक रचनाकार का पूरा जीवन ही समाहित है—पढ़ते-लिखते, गुनते-मथते जिस तरह एक रचनाकार अपना जीवन जीता है। रचनाएँ उसे रचती हैं और वह रचना को। पढ़ना उसे चेतना से जोड़ता है और लिखना जीवन के अनुभव से।
इस पुस्तक के दो खंड हैं। पहला खंड जैसे इसकी आत्मा है और दूसरा शरीर। पहले खंड में लेखक मातृभाषा के सवालों से जूझते हैं और अपनी रचना को समय की पहचान का आधार बनाते हुए कोरोना-काल की ‘कोरोजीवी कविता’ तक आते हैं। दूसरा खंड 15 आलेखों का है। ये आलेख अपने समय की चुनौतियों से टकराते सवाल हैं और रचनाकारों की परख से जुड़े हैं।
कहीं लोकगीत की कसक है, तो कहीं विचारों का प्रवाह और कहीं रचनाकारों की सृजनशीलता का सम्यक परीक्षण। राम विचार पाण्डेय, अनिरुद्ध, अक्षयवर दीक्षित, प्रो. ब्रजकिशोर, चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह, तैयब हुसैन पीड़ित, अशोक द्विवेदी, ब्रजभूषण मिश्र, जौहर शाफियावादी, भगवती प्रसाद द्विवेदी, बलभद्र, प्रकाश उदय और तंग इनायतपुरी जैसे कवियों का मूल्यांकन इस बारीकी से किया गया है, मानो भोजपुरी के समय पर सब कुछ शिलालेख की तरह अंकित हो गया हो।
ये भी पढ़ें-भोजपुरी को कटघरे में खड़ा करने वाले अश्लीलता भाषा में है या नजर में?
इस किताब में भोजपुरी कविता में गांधी जी की छवि और उनके प्रति भोजपुरी जनमानस की श्रद्धा को लेखक ने विस्तारपूर्वक रेखांकित किया है।
‘आपन बात’ शीर्षक आत्मकथ्य में लेखक ने 1915 से आज तक की भोजपुरी चेतना और समीक्षा के विकास को दर्ज करके दरअसल एक ऐतिहासिक दायित्व निभाया है। यह हिस्सा पुस्तक को केवल आलोचना की किताब नहीं रहने देता, बल्कि भोजपुरी साहित्यिक चेतना की विकास-यात्रा का महत्वपूर्ण दस्तावेज बना देता है।
भाई सुनील कुमार पाठक की यह पुस्तक पठनीय है और मेरा मित्रों से आग्रह होगा कि इसे जरूर पढ़ें और गुनें। भोजपुरी आलोचना को समृद्ध और सशक्त बनाने में यह कृति बहुमूल्य और अग्रपांक्तेय सिद्ध होगी।
इस किताब की एक खासियत यह भी है कि काव्यालोचना में कवियों की रचनाओं की राह से गुजरते हुए भोजपुरी में पाठ-आधारित आलोचना का एक आदर्श रूप प्रस्तुत करने का श्लाघ्य प्रयत्न किया गया है। अपने प्राक्कथन में लेखक का स्पष्ट मंतव्य है—
“भोजपुरी रचना में आज विचार के दरिद्रता नइखे रह गइल, बाकिर आलोचना के लोकतंत्र तबे कायम हो पाई, जब रचने के आलोक में कवनों विचार गठित-निरूपित होई।”
इस पुस्तक के बारे में इसी किताब में उद्धृत भगवती प्रसाद द्विवेदी की कविता के शब्दों में कहना चाहूँगा—“यह किताब भी छँनत मन का अंजोर है।” पाठक जी को बधाई और स्नेह।
प्रकाशक : सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
मूल्य : 299 रुपये

