‘एकलव्य’ :गुरु-शिष्य परंपरा, सामाजिक समरसता और दलित चेतना का विशेष काव्य दस्तावेज

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हालिया सन्दर्भ: प्रसिद्ध पब्लिशिंग हाउस ‘सेज’ (SAGE) से डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ की पुस्तक ‘एकलव्य’ पर आधारित डॉ. दीपक कश्यप का शोध-आलेख ‘Sociology of Dalit Epics: Dr. Gorakh Prasad Mastana’s Ekalavya’ प्रकाशित हुआ है।

समीक्षक: भगवती प्रसाद द्विवेदी (पूर्व महामंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन)एकलव्य की कहानी

भोजपुरी साहित्य की धरती सदैव लोक संवेदनाओं, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों की वाहक रही है। कविता की विभिन्न विधाओं में भोजपुरी ने अपनी अलग पहचान बनाई है, लेकिन महाकाव्य, प्रबंध-काव्य और खण्ड-काव्य जैसी गंभीर एवं श्रमसाध्य विधाओं में सृजन करना आज के समय में किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसे दौर में डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना द्वारा रचित ‘एकलव्य’ खण्ड-काव्य भोजपुरी साहित्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आता है।

महाकाव्य और प्रबंध-काव्य की रचना केवल कल्पना का विस्तार नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, दर्शन और मानवीय संवेदनाओं के गहरे अध्ययन की मांग करती है। वर्तमान समय में जब दीर्घ काव्य रचनाओं की परंपरा कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है, तब ‘एकलव्य’ जैसी कृति भोजपुरी साहित्य में नई ऊर्जा और नई उम्मीद का संचार करती है।

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भोजपुरी प्रबंध-काव्य परंपरा की गौरवशाली कड़ी

भोजपुरी साहित्य में प्रबंध-काव्य लेखन की एक समृद्ध परंपरा रही है। इस परंपरा में हरेन्द्रदेव नारायण का ‘कुँवर सिंह’ (1957), पं. चन्द्रशेखर मिश्र का ‘कुँवर सिंह’ (1966), ‘द्रौपदी’, ‘भीष्म बाबा’, अविनाश चन्द्र विद्यार्थी का ‘कौशिकायन’ (1973) एवं ‘सेवाकायन’ (1984), दण्डिस्वामी विमलानन्द सरस्वती का ‘बठधायन’ (1980), प्राध्यापक अचल का ‘महतारी ममता के मूरति’ (1985) तथा डॉ. किशोरी शरण शर्मा का ‘भोर अँजोर नहाइल’ (2010) जैसी महत्वपूर्ण कृतियां भोजपुरी साहित्य की धरोहर हैं।

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इन्हीं गौरवशाली परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए डॉ. मस्ताना का ‘एकलव्य’ एक ऐसे चरित्र को केंद्र में रखता है, जो भारतीय समाज में प्रतिभा, संघर्ष, त्याग और आत्मसम्मान का अमर प्रतीक बन चुका है।

एकलव्य : उपेक्षा से उत्कर्ष तक की प्रेरक यात्रा

महाभारत का एकलव्य केवल एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का वह प्रश्न है जो सदियों से समाज के सामने खड़ा है। वनवासी परिवार में जन्म लेने के कारण जब गुरु द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाने से इनकार कर दिया, तब भी उसकी ज्ञान-पिपासा समाप्त नहीं हुई।

मिट्टी की गुरु प्रतिमा बनाकर उसने स्वयं साधना शुरू की और अपनी प्रतिभा के बल पर महान धनुर्धर बन गया। उसकी साधना इतनी अद्भुत थी कि अर्जुन जैसे श्रेष्ठ योद्धा भी उसकी क्षमता से प्रभावित हुए।

अंगूठा दान की घटना ने एकलव्य को केवल त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं बनाया, बल्कि उसे सामाजिक न्याय, समान अवसर और प्रतिभा के सम्मान के विमर्श से जोड़ दिया।

डॉ. मस्ताना ने इस प्रसिद्ध कथा को केवल दोहराया नहीं है, बल्कि इसे भोजपुरी संवेदना और आधुनिक सामाजिक दृष्टि के साथ नए रूप में प्रस्तुत किया है।

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नौ सर्गों में जीवन दर्शन का विराट चित्रण

‘एकलव्य’ खण्ड-काव्य नौ सर्गों में विभाजित है, जिसमें कवि ने कथा, दर्शन और सामाजिक संदेश का सुंदर समन्वय किया है। इसका ‘उद्देश्य’ गुरु-शिष्य परंपरा की महिमा करना है.

प्रथम सर्ग में कवि ने इस रचना के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए गुरु और शिष्य के पवित्र संबंध को केंद्र में रखा है। कवि की दृष्टि में गुरु की सबसे बड़ी सफलता अपने शिष्य को सफलता की ऊंचाइयों पर देखना है—

“चला जब जग में नाम करे कवनो जब अजगुत काम करे,
त गुरू के हियवा हरसेला, आशीष नयन से बरसेला।”

इन पंक्तियों में गुरु के उस विराट स्वरूप का दर्शन होता है, जहां शिष्य की उपलब्धि ही गुरु का सबसे बड़ा सम्मान बन जाती है।

द्वापर से वर्तमान तक की कथा यात्रा

दूसरे सर्ग ‘द्वापर महिमा’ में भारतीय संस्कृति के अनेक प्रेरक प्रसंगों को जोड़ते हुए आरुणि की गुरु भक्ति, कृष्ण-सुदामा की मित्रता, कौरव-पांडव कथा और एकलव्य के आगमन की भूमिका तैयार की गई है।

तीसरे सर्ग ‘एकलव्य के परिचय’ में वनवासी बालक की प्रतिभा, संघर्ष और धनुर्विद्या के प्रति उसके अद्भुत समर्पण का चित्रण मिलता है।

चौथे सर्ग ‘द्रोण’ में गुरु द्रोणाचार्य के व्यक्तित्व और जीवन संघर्ष को प्रस्तुत किया गया है। कवि ने यहां कथा को एक नए नजरिए से देखा है-

“इहे द्रोण एकलव्य कहानी के कारण,
साँच कहीं त भीलपुत्र के जगतारन रहते ना…”

कवि यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि इतिहास में कुछ व्यक्तित्व एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और उनकी पहचान एक-दूसरे के संदर्भ में और अधिक प्रभावशाली बनती है।

साधना, प्रतिभा और आत्मविश्वास का दस्तावेज

पांचवें सर्ग ‘गुरुदर्शन’ में एकलव्य की गुरु भक्ति और आत्मविश्वास का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। जब द्रोणाचार्य उसे शिष्य बनाने से मना कर देते हैं, तब भी वह निराश नहीं होता। गुरु की प्रतिमा बनाकर उसी को साक्षी मानकर अभ्यास करता है और अपनी साधना से महान धनुर्धर बन जाता है-

“गुरु मूरत में सरधा से क,
अइसन गुन पा गइलें,
कुछ दिन में भीलपुत्र जी महाधनुर्धर भइलें।”

यह प्रसंग आज के युवाओं के लिए भी प्रेरणा देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, मेहनत और संकल्प से सफलता प्राप्त की जा सकती है।

अंगूठा दान यानी त्याग की अमर गाथा

सातवें सर्ग ‘अंगूठा दान’ में कवि ने सबसे चर्चित प्रसंग को नई दृष्टि से प्रस्तुत किया है। एकलव्य का अंगूठा दान भारतीय साहित्य में त्याग और समर्पण का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।

डॉ. मस्ताना ने इस घटना के माध्यम से केवल पीड़ा नहीं, बल्कि उस चरित्र की महानता को सामने रखा है, जिसने अपने गुरु के प्रति श्रद्धा को सर्वोपरि माना।

आज के समाज के लिए प्रासंगिक संदेश

‘एकलव्य’ केवल अतीत की कथा नहीं है। यह वर्तमान समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आती है।

आज जब शिक्षा, अवसर और समानता जैसे प्रश्न हमारे सामने हैं, तब यह कृति याद दिलाती है कि प्रतिभा किसी जाति, वर्ग या जन्म की मोहताज नहीं होती। हर व्यक्ति में आगे बढ़ने की क्षमता होती है, आवश्यकता है तो केवल उचित अवसर और सम्मान की।

यह खण्ड-काव्य गुरु-शिष्य संबंधों की गरिमा, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का आह्वान करता है।

भोजपुरी साहित्य की अमूल्य उपलब्धि

डॉ. मस्ताना का ‘एकलव्य’ भोजपुरी साहित्य की एक ऐसी रचना है, जिसमें इतिहास की स्मृति, संस्कृति की चेतना और वर्तमान समाज की जरूरतें एक साथ दिखाई देती हैं। यह कृति केवल एक पौराणिक पात्र की कहानी नहीं कहती, बल्कि समाज के सामने यह प्रश्न भी रखती है कि क्या हम हर प्रतिभा को समान अवसर और सम्मान देने के लिए तैयार हैं?

भाषा की सहजता, भावों की गहराई और विषय की व्यापकता के कारण ‘एकलव्य’ भोजपुरी खण्ड-काव्य परंपरा की एक उल्लेखनीय और स्मरणीय कृति बन गई है। डॉ. मस्ताना की यह रचना निश्चित रूप से भोजपुरी साहित्य के पाठकों, शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए लंबे समय तक प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

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