Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज पढ़िए डॉ. सुधाकर तिवारी की कहानी। चार दर्जन से अधिक पुस्तकों और सौ से ज्यादा शोधपत्रों के जरिए उन्होंने भोजपुरी की साहित्यिक समृद्धि को नई पहचान दी है।
कुशीनगर: भोजपुरी भाषा के इतिहास में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो केवल साहित्य नहीं लिखते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा भी तय करते हैं। डॉ. सुधाकर तिवारी ऐसे ही व्यक्तित्त्व हैं। मुख्य रूप से भोजपुरी भाषा और संस्कृति के लिए समर्पित डॉ. तिवारी वर्त्तमान मे विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अन्तरराष्ट्रीय महासचिव भी हैं। वरिष्ठ भोजपुरी साहित्यकार डॉ. अरुणेश नीरन के बाद डॉ. तिवारी को यह जिम्मेदारी मिली है। पेशे से शिक्षक, शोधकर्ता, साहित्यकार और भोजपुरी संस्कृति के सजग प्रहरी के रूप में उन्होंने अपना पूरा जीवन भोजपुरी भाषा, साहित्य,संस्कृति,कला और समाज को समर्पित किया है। भोजपुरी के विकास को लेकर उनका दृष्टिकोण केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि शोध और अकादमिक आधार पर खड़ा है। यही कारण है कि आज उन्हें भोजपुरी जगत् के सबसे सम्मानित विद्वानों में गिना जाता है।
शिक्षा से शुरू हुई समाज निर्माण की यात्रा
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर (पूर्व में देवरिया) जनपद के ग्राम धौरहरा, तप्पा झनकौल, परगना सिधुआ जोबना, पत्रालय फाजिलनगर, तहसील कसया की माटी में स्व. राजमती देवी एवं स्व. नरेन्द्र तिवारी के ज्येष्ठ पुत्र डॉ. सुधाकर तिवारी ने शिक्षा को अपने जीवन का आधार बनाया। उनकी प्राथमिक शिक्षा गॉंव के ही पाठशाला मे हुई। हाईस्कूल एवं इण्टरमीडिट की परीक्षा पावानगर महावीर इण्टमीडिएट कॉलेज फाजिलनगर से स्नातक एवं स्नातकोत्तर परीक्षा बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर से पीएचडी गोरखपुर विश्वविद्यालय से डीलिट् गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर से किया। ढ़ाई वर्ष तक आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के साथ उनके ही विभाग में कार्य करने बाद राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय वेदीखाल पौड़ी गड़वाल में शासकीय सेवा में उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग में नियुक्त हुए। गढ़वाल विश्वविद्यालय से ही अंगरेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त किये । सेवा काल में ही उन्होंने भाषाविज्ञान में एमलिट् किया। चार दशक से अधिक समय तक उन्होंने विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन किया और हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा के माध्यम से नई दिशा दी। सेवा के अन्तिम में वह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, ओबरा (सोनभद्र) के प्राचार्य भी रहे और यहीं से सेवानिवृत्त हुए। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान केवल प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने ज्ञान और शोध की संस्कृति को भी मजबूत किया।

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भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करने वाला रचनाकार
डॉ. तिवारी की पहचान एक गंभीर साहित्यकार और चिंतक के रूप में भी है। उनकी चार दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और सौ से अधिक शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। भोजपुरी भाषा, साहित्य, लोकजीवन, संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन जैसे विषय उनके लेखन के केंद्र में रहे हैं। उनकी रचनाएं यह बताती हैं कि भोजपुरी केवल मनोरंजन की भाषा नहीं, बल्कि एक समृद्ध साहित्यिक और बौद्धिक परंपरा की वाहक है। 
भोजपुरी को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास
पिछले तीन दशकों से अधिक समय से डॉ. सुधाकर तिवारी भोजपुरी भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय हैं। उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि मॉरीशस, नेपाल, सूरीनाम और अन्य देशों में बसे भोजपुरी समाज के साथ संवाद स्थापित करने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और सामूहिक स्मृतियों की संरक्षक होती है। इसी सोच के साथ उन्होंने भोजपुरी को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाने के लिए लगातार काम किया है। आज भोजपुरी दुनिया की प्रमुख भारतीय भाषाओं में गिनी जाती है और करोड़ों लोगों की मातृभाषा है।
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शोध और अकादमिक दृष्टि से मजबूत की भोजपुरी
भोजपुरी के कई समर्थक भावनात्मक स्तर पर भाषा की बात करते हैं, लेकिन डॉ. सुधाकर तिवारी ने इसे शोध और अकादमिक विमर्श का विषय बनाया। उन्होंने भाषा के इतिहास, साहित्य, समाज और सांस्कृतिक पक्षों पर गंभीर अध्ययन को बढ़ावा दिया। उनके लेखन में तथ्य, तर्क और शोध का मजबूत आधार दिखाई देता है। यही कारण है कि विद्यार्थी, शोधार्थी और युवा लेखक उन्हें मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। भोजपुरी को विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में सम्मानजनक स्थान दिलाने की दिशा में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज जब क्षेत्रीय भाषाएं वैश्वीकरण और डिजिटल चुनौतियों का सामना कर रही हैं, ऐसे समय में डॉ. सुधाकर तिवारी का जीवन नई पीढ़ी को एक महत्वपूर्ण संदेश देता है और कहते हैं कि अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व कीजिए, लेकिन उसे आधुनिक ज्ञान और शोध से भी जोड़िए। उन्होंने साबित किया है कि कोई भी भाषा तभी आगे बढ़ती है जब उसमें साहित्य, शोध, शिक्षा और समाज की भागीदारी एक साथ हो।
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Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला डॉ. सुधाकर तिवारी को नमन करती है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि भाषा की सेवा केवल लेखन से नहीं, बल्कि सतत अध्ययन, शोध, सामाजिक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक नेतृत्व से होती है। भोजपुरी समाज को ऐसे विद्वानों पर गर्व है, जिन्होंने अपने कर्म से भोजपुरी की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।


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बहुत सुन्दर, भोजपुरी क पहरुआ. बनी, शुभकामना