पोर्ट लुईस (मॉरीशस)। हिंद महासागर के छोटे से द्वीपीय देश मॉरीशस में भोजपुरी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए कई नए प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार, सांस्कृतिक संस्थाओं और प्रवासी भारतीय समुदाय के सहयोग से भोजपुरी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए अभियान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, डिजिटल मंच और शैक्षणिक पहल शुरू की गई हैं।
मॉरीशस में कार्यरत भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन (Bhojpuri Speaking Union) भोजपुरी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए लगातार काम कर रही है। संस्था का मुख्य उद्देश्य भोजपुरी को बोलचाल और लेखन दोनों रूपों में बढ़ावा देना तथा भाषा से जुड़े शैक्षणिक, सांस्कृतिक और कलात्मक कार्यक्रम आयोजित करना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मॉरीशस में भोजपुरी आज भी भारतीय मूल के लोगों की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन अंग्रेजी, फ्रेंच और मॉरीशियन क्रियोल के बढ़ते प्रभाव के कारण इसके सामने चुनौतियां भी हैं। इसी वजह से भाषा संरक्षण के लिए सांस्कृतिक उत्सव, साहित्यिक गतिविधियां और युवा केंद्रित कार्यक्रम बढ़ाए जा रहे हैं।
ये भी पढ़ें- डॉ. सुधाकर तिवारी: भोजपुरी भाषा के ज्ञान, शोध और सम्मान की आवाज
हाल के वर्षों में भोजपुरी नेशनल हेरिटेज वीक, भोजपुरी महोत्सव और लोकसंगीत कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है, जिनका उद्देश्य युवाओं को अपनी भाषाई विरासत से जोड़ना है। मॉरीशस सरकार भी भोजपुरी की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के प्रयासों को समर्थन दे रही है।
भोजपुरी संस्कृति के संरक्षण में ‘गीत-गवाई’ परंपरा की बड़ी भूमिका रही है। यह पारंपरिक भोजपुरी विवाह-पूर्व लोकगायन शैली यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल है। हाल के वर्षों में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है और इसे भोजपुरी संस्कृति के संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम माना जा रहा है।
शोधकर्ताओं के अनुसार मॉरीशस में भोजपुरी साहित्य, लोककथाओं और लोकगीतों के प्रति युवाओं की रुचि बढ़ रही है। कई लेखक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता नई पीढ़ी को भोजपुरी पढ़ने, लिखने और बोलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षा, मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भोजपुरी की उपस्थिति और मजबूत की जाए तो मॉरीशस आने वाले वर्षों में वैश्विक भोजपुरी संस्कृति के प्रमुख केंद्रों में से एक बन सकता है।

