नवगीत। अनिल ओझा नीरद

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अनिल ओझा नीरद


हिस्सेदारी जनता के बस,
हवा महल बा,
हर सरकारी शाशन में।
भूखल पेट भजन गाईं बस,
सुविधा वाला नारन में।।

गांव किसान के खेती सूखल,
शहर अफीम उड़त बाटे।
केकरा दम पर,
नशा के कारोबार ई,
फरत-फुलत बाटे।
उगल बा बरगद,
गमला में जब,
संसद के गलियारन में।।

कबिरा के सच के झुठला के,
कंठी माला बांटि रहल।
अपना अपना के गलबहियां,
दोसरा के सभ डांटि रहल।
परदा के पीछे के दुनियां,
तूती बा नक्कारन में।।

चिंतन,मंथन अउर हौसला,
के त लकवा मारि ग‌इल।
फेरु नया गंगा का अइहें,
नया भगीरथ हारि ग‌इल।
खोजत जनता,
नया क्रांति अब,
गूंग,बहिर,लाचारन में।।

दिन के दिन,
आ राति के रतियो,
कहल इहां अब बाइ मना।
गुपचुप कुल्हि,
षड्यंत्र चलत बा,
भेद ई बाटे बहुत घना।
बाकी फूल प फूल,
झरत बा,
कुल्हिये लोकाचारन में।।

हिस्सेदारी जनता के बस,
हवा महल बा,
हर सरकारी शाशन में।
भूखल पेट भजन गाईं बस,
सुविधा वाला नारन में।।

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