पुस्तक समीक्षा : भोजपुरी भाषा-साहित्य के इतिहास का प्रामाणिक दस्तावेज है ‘आधुनिक भोजपुरी साहित्य के इतिहास’

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समीक्षक : डॉ. लारी आज़ाद

भोजपुरी भाषा और साहित्य की एक महत्वपूर्ण कृति ‘आधुनिक भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ की चर्चा विशेष रूप से प्रासंगिक है। आचार्य शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ द्वारा लिखित यह वृहद ग्रंथ वर्ष 2026 में शिवालिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। भोजपुरी भाषा, साहित्य, व्याकरण और उसके ऐतिहासिक विकास को समग्र रूप में समझने के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ के रूप में सामने आती है।

पुस्तक को चार प्रमुख खंडों में विभाजित किया गया है। पहला खंड आदिकाल (600 ई. से 1800 ई.), दूसरा मध्यकाल (1800 से 1947), तीसरा स्वतंत्रता के बाद का आधुनिक भोजपुरी साहित्य, जबकि चौथा खंड भोजपुरी व्याकरण को समर्पित है। यह क्रम पाठकों को भोजपुरी साहित्य की विकास यात्रा को व्यवस्थित ढंग से समझने में मदद करता है।

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पुस्तक की भूमिका प्रख्यात भाषाविद् प्रो. डॉ. शंकर मुनि राय ‘गड़बड़’ ने लिखी है। उनके अनुसार यह ग्रंथ भोजपुरी भाषा की प्राचीनता और आधुनिकता का समन्वित दस्तावेज है। वहीं साहित्यकार डॉ. जौहर शफियाबादी का मानना है कि भोजपुरी साहित्य के इतिहास-लेखन में जो कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी, उसे आचार्य शुभ नारायण सिंह ने गंभीर शोध, प्रमाण और निष्ठा के साथ पूरा करने का प्रयास किया है।

लेखक ने अपनी भूमिका में स्पष्ट किया है कि पुस्तक में प्रस्तुत सभी तथ्य शोध, संदर्भ और प्रमाणों के आधार पर संकलित किए गए हैं तथा उनकी प्रामाणिकता पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भोजपुरी भाषा की ऐतिहासिक यात्रा का व्यापक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने बताया है कि भोजपुरी का विकास पाली और प्राकृत परंपरा से हुआ तथा विद्यापति, कबीर, नाथ-सिद्ध परंपरा, अमीर खुसरो और सूफी साहित्य की परंपरा ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पुस्तक में जॉर्ज ग्रियर्सन, पंडित उदय नारायण तिवारी, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, डॉ. शुकदेव सिंह, निर्भीक जी, शिवदास जी और रासबिहारी पांडे जैसे विद्वानों के शोध और योगदान का विस्तार से उल्लेख किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि भोजपुरी भाषा के अध्ययन का आधार केवल साहित्य नहीं, बल्कि लोकगीत, लोककथाएँ, लोकनाटक, संस्कार गीत, श्रम गीत, मुहावरे, लोकोक्तियाँ और सरकारी दस्तावेज भी रहे हैं।

लेखक ने विदेशी विद्वानों और प्रवासी देशों में हुए भोजपुरी संबंधी शोध को भी स्थान दिया है। मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, फिजी, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका जैसे देशों में भोजपुरी भाषा और संस्कृति पर हुए शोधों का उल्लेख इस पुस्तक को और अधिक व्यापक बनाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भोजपुरी केवल भारत की भाषा नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए एक वैश्विक भाषा है।

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पुस्तक में भोजपुरी व्याकरण, भाषा-विज्ञान और लोकसाहित्य पर आधारित अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों और शोध कार्यों का भी उल्लेख किया गया है, जिससे यह ग्रंथ शोधार्थियों, विद्यार्थियों और साहित्य के गंभीर पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी बन जाता है।

उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक के पृष्ठ 244 पर समीक्षक डॉ. लारी आज़ाद के साहित्यिक योगदान का भी उल्लेख किया गया है। लेखक ने उनके भाषा-विज्ञान और भोजपुरी साहित्य संबंधी कार्यों को सम्मानपूर्वक स्थान दिया है।

आज जब देश और विदेश में बसे लगभग 25 करोड़ से अधिक भोजपुरी भाषी भोजपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग को लेकर निरंतर प्रयासरत हैं, ऐसे समय में ‘आधुनिक भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ जैसी शोधपरक और प्रमाणिक कृति इस आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान करती है। यह पुस्तक केवल भोजपुरी साहित्य का इतिहास नहीं, बल्कि भोजपुरी भाषा की समृद्ध परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और भाषाई अस्मिता का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति में रुचि रखने वाले प्रत्येक पाठक, शोधार्थी और अध्यापक के लिए यह पुस्तक निस्संदेह संग्रहणीय और संदर्भ ग्रंथ है।

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