भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता का विरोध, संकीर्ण मानसिकता का परिचायक

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संतोष पटेल, संस्थापक, भोजपुरी जनजागरण अभियान

‘बोलियाँ को भाषा बनाने की जिद’ शीर्षक आलेख में मुंम्बई विवि के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ करुणाशंकर उपाध्याय ने भोजपुरी को हिंदी की बोली मानते हुए उसके सांविधानिक मान्यता का विरोध किया था। डॉ. उपाध्याय ने बोलियों को भाषा बनने की उतयोग का मुखर विरोध किया है परन्तु उनके आलेख को पढ़ने के बाद यही लगता है कि वे केवल भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं। इस बाबत उनके कुछ कतिपय सवालों का उत्तर देना आवश्यक है।

सबसे पहले हमें समझना चाहिए कि बोली (डाइलेक्ट) और भाषा (लैंगुएज) में अंतर की अवधारणा पश्चिमी अवधारणा है। इसमें कोई वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) अंतर नहीं है। बोली और भाषा में अंतर खड़ा करना हिंदी विद्वानों का भाषाशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक अवैज्ञानिक और संकीर्ण सोच है।

सवाल यह है कि हिंदी जो देश की एक ओढ़ी हुई भाषा है और केंद्रीय हिंदी संस्थान की माने तो इसके जद में 48 से अधिक ‘बोलियाँ’ हैं साथ ही 2011 के भाषाई सर्वेक्षण में हिंदी के जद में 54 बोलियां हैं जो उत्तर भारत की किसी ना किसी क्षेत्र की मातृभाषा हैं। फिर ऐसा क्यों किया गया?

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क्या जिस चीन को हम पानी पी पी कर कोसते रहते हैं उसी चीन की भाषा नीति ‘मंडारिन’ को ही ‘उस देश की भाषा मानी जाए’ का एक तरह से हम समर्थन नहीं कर रहे हैं?

भोजपुरी भाषा को हिंदी के विद्वान भारत में ‘बोली’ कहते है जबकि भारत सरकार के भाषा सर्वेक्षण 2011 के अनुसार भोजपुरी भाषी 5 करोड़ से अधिक हैं जबकि नेपाल सरकार, राष्ट्रीय जनगणना प्रतिवेदन 2069 में नेपाल की तीसरी बड़ी भाषा बतलाती है जबकि वहां की भोजपुरी भाषियों की संख्या आज के समय में लगभग 18 लाख ही है।

मॉरीशस की भोजपुरी ‘गीत गवाई’ को यूनाइटेड नेशन्स हेरिटेज की मान्यता देता है। मॉरीशस में सरकार ने ‘भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन’ को सरकारी मान्यता प्रदान मिली हुई है और यह भी सत्य है कि भोजपुरी ने ही देश विदेश में हिंदी की जमीन मजबूत की है।

हिंदी के ये तथाकथित विद्वान ऊर्ध्वगामी मोबिलिटी करते हैं, खुद अंग्रेजी या अन्य पश्चिमी भाषाओं पढ़-पढ़ कर अपनी सैद्धान्तिकी तैयार करते हैं और देश में हिंदी को अंग्रेजी से खतरा बतलाते है यह है इनका दुमुंहापन।

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यहाँ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की पोती और समाजसेविका इला गांधी की बात याद आती है कि उन्होनें साउथ अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में आयोजित 9वें विश्व हिंदी सम्मेलन में कहा था कि ‘अंग्रेजी दुनिया की अन्य छोटी छोटी भाषाओं के साथ जैसे दमनकारी व्यवहार कर रही है वही व्यवहार हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ नहीं करना चाहिए।’ यानि हिंदी भाषा जन जन की भाषा बने समस्त भारतीयों के दिल में जगह बना के राष्ट्रभाषा बने यही समस्त भोजपुरी भाषियों की हार्दिक इच्छा है ना कि कुछ भाषाई सामन्तियों के दबाब में आकर पूरे देश पर हिंदी इम्पोज़ (थोपा) किया जाए।

ये तथाकथित विद्वान राष्ट्रीयता के नाम पर देशज भाषाओं के सांविधानिक मान्यता का विरोध करते हैं। सवाल है, क्या भोजपुरी विदेशी भाषा है? विशेषकर, भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की जब जब माँग उठती है इनके अंदर का श्रेष्ठतावाद, देशभक्ति और राष्ट्रवाद हिलकोरे लेने लगता है मानो भोजपुरी भाषियों को राष्ट्र से लेना देना ही नहीं या फिर भोजपुरी की सांविधानिक मान्यता से एक नया राष्ट्र बन जाएगा।

हिंदी के ये विद्वान भोजपुरी की मान्यता पर मुखर विरोध में हैं, पर मैथिली के आंदोलन और उसकी सांविधानिक मान्यता पर इनकी चुप्पी इनके दोहरी मानसिकता का परिचय ही है।

पहले यही लोग मैथिली जैसी भाषा को हिंदी की बोली कहते थे। जैसे मैथिली संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज हुई यह एक अलग भाषा बन गई। यानि मैथिली एक ही रात में बोली से भाषा बन गई। कैसे? तब इन्होंने कोई विरोध नहीं किया? इसका क्या कारण है?

अंतरराष्ट्रीय ख्यात भाषाविद प्रो। राजेन्द्र प्रसाद सिंह कहते है कि बोली और भाषा में अंतर कैसे करेंगे। एक दिन पहले मैथिली हिंदी की बोली थी। संविधान के 8वीं अनुसूची में आते दूसरे दिन भाषा बन गई। जब देश में अष्टम अनुसूची ही मानक बोली और भाषा की मानक है फिर अंतरराष्ट्रीय महत्व और पहचान की भाषा भोजपुरी के साथ यह अन्याय क्यों?’

ये तथाकथित विद्वान अधिकतर विश्वविद्यालय के शिक्षक ही क्यों हैं? जाहिर सी बात है अपने बच्चों को विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में या अन्य विभाग में सेट कराना ही इनका असली एजेंडा है। इस साजिश को समझने की जरूरत है।

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दूसरी बात यह है कि इनका विरोध छद्म है। इनकी सारी कवायत सरकार के निगाह में बने रहने की है ताकि विश्वविद्यालय में कुलपति पद और अन्य प्रशासनिक पदों पर काबिज रहें जैसा कि कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनेक प्रकार के चेयर है वे इस विरोध के मार्फ़त इन पदों पर विराजमान होने की लालसा रखते हैं। साथ ही यूजीसी के सदस्य बन कर और विश्वविधालयों में प्राध्यापक चयन समिति के सदस्य बनकर विश्वविद्यालय के विभिन्न पदों पर अपने लोगों को सेट करने की ताक में रहते हैं। ये लोग सरकारी आयोगों में सेटिंग करने से लेकर मंत्रालयों के राजभाषा कमिटी के सदस्य पदों पर काबिज रहना चाहते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों यथा विश्व हिंदी सम्मेलनों में अपनी भागीदारी बनाये रखना चाहते हैं। साहित्य अकादमी में अपना दबदबा बनाकर अपने लोगों को लाभ पहुँचाने की कोशिश में हैं।

भोजपुरी के विरोध में खड़े जो लोग हैं उनसे एक सवाल है कि भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में कितने हिंदी विभाग हैं जहां पाठ्यक्रम में भोजपुरी है यदि भोजपुरी को हिंदी का अहम हिस्सा मानते हैं?

विदित हो कि भोजपुरी क्षेत्र के लोग मूलतः राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत होते हैं। बिहार का भोजपुरी क्षेत्र और उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल क्षेत्र के लोग अपनी मातृभाषा को दरकिनार कर हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हेतु संघर्षशील रहे। आज हिंदी देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर की भाषा बन गई है परन्तु ये हिंदी के ठेकेदार भोजपुरी को उसका काल्पनिक शत्रु बता कर समाज में वितण्डा खड़ा करना चाहते हैं। बार बार हिंदी और भोजपुरी के बीच देश में एक द्वेषपूर्ण माहौल खड़ा करने के पीछे इनकी नियत जग जाहिर है।

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यह कहना संगत है कि भोजपुरी एक लोकप्रिय संस्कृति की भाषा है और उसने किसी भाषा के विरोध में कभी अनर्गल प्रलाप नहीं किया। अतः भोजपुरी के सांविधानिक अधिकार का विरोध बिल्कुल निराधार है। (यह लेखक का निजी विचार है)

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