डॉ. सुधाकर तिवारी, अन्तरराष्ट्रीय महासचिव, विश्व भोजपुरी सम्मेलन
भोजपुरी के रत्न थे,
‘नीरन’ जिनका नाम।
पुण्यतिथि पर कर रहे,
हम उनको प्रणाम।।
अरुणेश नीरन एक ऐसा व्यक्तित्व जिस पर लिखते समय शब्दकोश के शब्द कम पड़ जाते हैं। अरुणेश नीरन एक व्यक्ति नहीं, एक व्यक्तित्व भी नहीं अपने आप में एक सचल संस्थान थे। पहली बार अपने शैशवास्था में जब उनको देखा था, तब उनमें बच्चों सी चंचलता थी। वह मेरे चाचा स्वर्गीय बैरिस्टर तिवारी (उनको मेरे बाबा स्व0राजमंगल जी तिवारी हरिशंकर नाम से पुकारा करते थे, इसलिए गॉव में उनका एक नाम हरिशंकर तिवारी भी था) के पास बनारस पधारे थे। चाचा जी वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय में ग्रन्थालयी थे। अब यह सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के नाम से जाना जाने लगा है।
मेरे नाना स्व0 गिरिजा शंकर जी मिश्र यहीं इसी विश्वविद्यालय में वित्त नियन्त्रक थे। नीरन जी प्रायः यहां आते थे। वाराणसी में यह उनका स्थाई निवास बन चुका था। उनके सम्बन्ध में सारी सूचनाएं यहॉं उपलब्ध हो जातीं थीं। यहीं मुझे करपात्री जी, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, शिवप्रसाद सिंह, काशी नरेश विभूति नारायण सिंह, महामहोपाध्याय पण्डित बलदेव उपाध्याय, प्रो शुकदेव सिंह, वैद्याचार्य हरिहर गुरु, प्रोफेसर वासुदेव सिंह, डॉ0 शम्भुनाथ सिंह, प्रोफेसर विजयपाल सिंह, सुदामा पाण्डेय धूमिल, डॉ0 जगदीश गुप्त, प्रोफेसर रघुवंश, प्रभृत महान् साहित्यकारों ऋषियों का प्रथम दर्शन प्रथम साक्षात्कार प्राप्त हुआ था। कालान्तर में यह श्रृंखला निरन्तर बढ़ती रही।
प्रख्यात साहित्यकार डॉ. अरुणेश नीरन ‘भोजपुरी की वैश्विक यात्रा : कहाँ से कहाँ तक’ के प्रति पग, प्रति क्षण संवाहक थे। भोजपुरी वैभव, पुरइन पात, शिवप्रसाद सिंह, हमार गाँव, अक्षर पुरुष, प्रतिनिधि भोजपुरी कहानियाँ, अज्ञेय शती स्मरण, सेतु और नान्दी तथा भोजपुरी के अमर लोकगीत के लेखक, समकालीन भोजपुरी साहित्य के संपादक, या तरुवर में एक पखेरू और वागर्थ का वैभव शीर्षक फिल्मों के निर्माता-निर्देशक तथा भोजपुरी गौरव सम्मान से सम्मानित मूर्धन्य भोजपुरी विद्वान्, देवरिया निवासी एवं बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर के पूर्व प्राचार्य अरुणेश ‘नीरन’ बीते चार दशकों से भी अधिक समय से भोजपुरी भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति के उत्थान एवं विकास के क्षेत्र में सक्रिय रहे।
ये भी पढ़ें- भोजपुरी की लड़ाई को सिर्फ सांस्कृतिक आंदोलन नहीं, अब राजनीतिक एजेंडा बनने की जरूरत
इसके साथ ही वे भोजपुरी भाषा, संस्कृति और संगीत के प्रति सतत रूप से समर्पित थे। उन्होंने अखबार, टीवी और डिजिटल मीडिया के जरिए न सिर्फ भोजपुरी समाज के मुद्दों को उजागर किया, बल्कि भोजपुरी लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए विशेष सामग्री भी तैयार की। स्वस्थ भोजपुरी सिनेमा और संगीत के विकास में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही है।
मुझसे निजी बातचीत में नीरन जी ने एक बार कहा था, “यह ज़िम्मेदारी मेरे लिए सम्मान के साथ-साथ चुनौती भी है। भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की लड़ाई को अब और व्यापक स्वरूप दिया जाएगा।”
आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए भोजपुरी में शिक्षा, साहित्यिक गतिविधियों और सांस्कृतिक आयोजनों को प्रोत्साहित करना अरुणेश नीरन के जीवन का उद्देश्य था, लक्ष्य था और ध्येय था।
अरुणेश ‘नीरन ‘ 1991 में भोजपुरी के भाषा साहित्य कला और संस्कृति के सरोकारों से जुड़े। अन्तरराष्ट्रीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन संस्था के अन्तरराष्ट्रीय महासचिध अरुणेश नीरन की स्वीकारोक्ति है कि भोजपुरी को उसकी वास्तविक प्रतिष्ठा दिलाने के लिए हमें इसे सिर्फ बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि अस्मिता और आत्मगौरव का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करना होगा। इस नई जिम्मेदारी के साथ अरुणेश ‘नीरन’ से भोजपुरी समाज को नई दिशा और ऊर्जा मिलने की उम्मीद थी पर उनका अप्रत्याशित रूप से परलोक गमन भोजपुरी भाषा साहित्य संस्कृति और कला को आघात दे गया था .
अरुणेश नीरन आत्मविश्वास, दृढ़ता, मानवीय दृष्टिकोण और सार्वभौमिक भाईचारे में दृढ़ता से विश्वास करते थे। अरुणेश नीरन दिन में सपना देखने वाले अतिशय भावुक व्यक्ति थे। आँसू, पसीना, दर्द, कठिनाइयाँ, समस्याएँ और बाधाएँ उनके जीवन की संपत्ति थे। समय उनका सबसे अच्छा साथी था। वह एक बहुत ही सकारात्मक व्यक्ति थे और भोजपुरी और छायावाद के साथ भाषाविज्ञान के लोकप्रियकरण के लिए उनका गहरा जुनून था। उनके पास दृढ़ इच्छा शक्ति और दृढ़ संकल्प है और अपने सपनों को विचारों और विचारों को कार्रवाई में बदलने की क्षमता रखते थे ।
वे दिवंगत पद्मश्री, पद्मविभूषण डॉ. विद्यानिवास मिश्र, गोपीनाथ कविराज और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे तथा उनके विचारों के आदर्श अनुयायी भी। बहुत ही सादा और सरल जीवन-यापन करने वाले, घोर आलसी साहित्यकार, जिनके मन-मस्तिष्क में ज्ञान का अथाह सागर नवीन उद्भावनाओं के साथ तरंगायित था, पर वह कागज के धरातल पर आते-आते युगों तक प्रतीक्षा करने का धैर्य मांगता था। जिसमें धैर्य हो, वही इस रत्नाकर के गर्भ में छिपी मणियों और रत्नों को पा सकता था।
वे एक व्यावहारिक व्यक्ति थे। सादगी और विनम्रता उनके चरित्र में अंतर्निहित थीं। वे अपने दैनिक जीवन में जिन लोगों से मिलते थे, उनके प्रति उनके मन में सम्मान और आदर का भाव था। उनका व्यक्तित्व एक सशक्त सामाजिक चेहरा लिए हुए था, जो शुद्ध सात्विक साहित्यिक भाव-लहरियों के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुसंधान, विज्ञान के लोकप्रियकरण, विज्ञान लेखन, वैज्ञानिक व्याख्यान तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़ी हर चीज के प्रति जुनून के साथ अद्भुत रूप से समन्वित था।
ये भी पढ़ें- मोहम्मद खलील: जिनकी मखमली आवाज ने भोजपुरी लोकगायकी को दी नई गरिमा
भाषा और भाषिक चिंतन हो या छायावाद की पौराणिक-सांस्कृतिक व्याख्या के साथ नवीनतम भाव-बोध, सब कुछ उनके भीतर समाहित था। मैंने रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ और आचार्य पद्म सिंह शर्मा ‘कमलेश’ जैसे मूर्धन्य विद्वानों को छायावाद पर सुना है। नन्द दुलारे वाजपेयी को सुनने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला, पर मैंने छायावाद संबंधी उनके तथा डॉ. रामकुमार वर्मा के चिंतन का अध्ययन, मनन और अनुशीलन किया है। मैं संपूर्ण आत्मविश्वास और निष्ठा के साथ, निष्पक्ष भाव से कह सकता हूँ कि नन्द दुलारे वाजपेयी के बाद छायावाद का अरुणेश नीरन जैसा दूसरा कोई व्याख्याता न भूतो न भविष्यति।

अरुणेश नीरन के साथ डॉ. सुधाकर तिवारी
नीरन अरुणेश एक असाधारण, अतिशय जिद्दी और स्वाभिमानी पराक्रमी व्यक्तित्व की अभिधा थे। एक घटना से अपनी बात स्पष्ट करना चाहूॅंगा। बात 1976 मार्च की है। अज्ञेय के 65वें जन्मदिन को मनाने की तैयारी कुशीनगर में चल रही थी। सभी लोग सहकारी व्यवस्था में जुट गए थे। कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा लेकर कार्यक्रम का कुनबा तैयार किया गया। आकाशवाणी ने कार की व्यवस्था कर दी, मित्रों ने आवास की, कॉलेज ने निःशुल्क अपना हॉल दे दिया। कुछ लोगों ने भोजन का जिम्मा लिया। मार्ग-व्यय की व्यवस्था करनी नहीं थी, क्योंकि सभी लोग अपने संसाधनों से आ रहे थे।
सहयोग माँगने सब लोग प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजमंगल पाण्डेय के घर गए और अनुरोध किया कि कार्यक्रम के बाद वे सबको जलपान कराने की व्यवस्था कर दें। वे सहर्ष तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वह आयोजन कुशीनगर के समारोह-स्थल पर नहीं, उनकी कोठी के लॉन पर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि वह प्रस्तावित अज्ञेय संस्थान के लिए वे दस हजार रूपए की सहयोग राशि भी देंगे।
7 मार्च को सभी लोग जुटे। बड़ी बहन सत्यवती जी ने वह स्थान दिखाया, जहाँ वह शिविर लगा था और जिसमें 7 मार्च सन् 1911 को अज्ञेय का जन्म हुआ था। सभी ने वहाँ शाल के एक-एक पौधे को रोपा, फिर मुख्य कार्यक्रम के लिए हॉल में पहुँचे। अज्ञेय जी ने चतुर्वेदी जी और बड़ी बहन के चरण-स्पर्श किए और कार्यक्रम आरंभ हुआ। अज्ञेय की बगल में बैठे विद्यानिवास जी ने घोषणा की कि भाषण केवल उन्हीं का होगा, जो कवि नहीं हैं, जो कवि है वे काव्य-पाठ के द्वारा आदराञ्जलि देंगे। केदार नाथ सिंह जी, परमानंद श्रीवास्तव, भवानी भाई जी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, राहगीर, अनंत मिश्र ने अपनी कविताएँ सुनाई, बाकी ने अज्ञेय के कवि-कर्म और व्यक्तित्व पर व्याख्यान दिए, चतुर्वेदी जी ने आशीर्वाद दिया और अज्ञेय के भाव विभोर होकर दिए गए आभार के बाद कार्यक्रम समाप्त हो गया।
इसके बाद राजमंगल पाण्डेय जी के घर आना था जलपान के लिए। हम लोग बाहर निकले तो आकाशवाणी की कार नहीं थी। उसी से दो कि.मी. दूर राजमंगल पाण्डेय जी की कोठी में पहुँचना था। विवश होकर नीरन जी ने सर मजीठिया जी से अनुरोध किया कि वे अपनी मर्सिडीज से तीन-चार खेप में सबको वहाँ पहुँचा दें। चौरासी वर्षीय मजीठिया साहब से यह अनुरोध करते हुए संकोच हो रहा था, लेकिन कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था।
ये भी पढ़ें- डॉ. विश्वनाथ प्रसाद, जिन्होंने दुनिया को बताया कि भोजपुरी भी है वैज्ञानिक भाषा
मजीठिया साहब ने प्रसन्नता से प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और पहली खेप में अज्ञेय जी, भवानी भाई जी, विद्यानिवास मिश्र को स्वयं लेकर कसया पहुँचे, नेताजी की कोठी पर। चार-पाँच चक्कर में सब पहुँच गए।
लॉन में बड़े करीने से जलपान की व्यवस्था की गई थी। जब सब लोग बैठ गए, नाश्ता लग गया तो राजमंगल पाण्डेय जी ने अज्ञेय जी से अनुरोध किया कि ‘वात्स्यायन जी, शुरू करें।’
अज्ञेय जी बहुत गंभीर थे। न उन्होंने राजमंगल पाण्डेय की ओर देखा तक नहीं और न ही नाश्ता शुरू किया। अनुरोध बार-बार दुहराया गया। अज्ञेय जी चुप्प तो चुप्प। महा मौन की अन्तर्दशा में वह अप्रत्याशित रूप से उठ खड़े हो गए और धीरे से नीरन जी से कहा, ‘चलिए, बाहर चलें।’
सब उठ खड़े हुए, खाद्य पदार्थ का बिना एक कण छुए। राजमंगल पाण्डेय स्तब्ध थे। हम सब भी स्तब्ध। बाहर आकर उन्होंने कहा, ‘चलिए, किसी दुकान में जलपान किया जाए।’ नीरज जी के मित्र, कवि-कथाकार और उस समय वहाँ कसया के एस.डी.एम. डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय साथ में ही थे। उन्होंने कहा, ‘बगल में उनका घर है, वहीं जलपान हो।’ हम सब अज्ञेय की मौन सहमति पाकर उनके आवास में चले गए। डॉ0 राजेन्द्र पाण्डेय का परिवार उस समय कसया में उनके साथ नहीं था। अज्ञेय जी के प्रस्ताव पर सब डॉ. राजेन्द्र पाण्डेय एसडीएम साहब के रसोईघर में घुस गए। नाश्ता बनाने का उपक्रम आरम्भ हुआ। इलाजी, ओमवती जी रसोई में गई, अज्ञेय जी भी नेतृत्व में लोगों ने आलू काटा गया, मटर के दाने छीले गए , धनिया की पत्ती से टमाटर युक्त चटनी तैयार की गई और समूह-भोज का आनन्द लिया।
दूसरे दिन अज्ञेय जी ने नीरन जी को बुलाया और कहा, ‘मेरे नाम पर बनने वाले संस्थान के लिए उस नेता के द्वारा दी जाने वाली जिस सहयोग राशि की आप चर्चा कर रहे थे, वह आप नहीं लेंगे। इसकी सूचना आप उन्हें दे दें।’ नीरन जी ने हाथ जोड़कर कहा ‘आप नहीं चाहते हैं तो वह सहयोग राशि हम नहीं लेंगे। लेकिन कल आप जलपान की टेबल से उठ क्यों गए? बहुत बुरा माना होगा उन्होंने।’
‘मानने दें। जो आदमी अपने घर आए बुजुर्ग का सम्मान नहीं कर सकता, उसके यहाँ जलपान कैसे किया जा सकता है?’ इतना कहकर वह मौन हो गए।
मैं भवानी भाई जी के पास गया, यह पूछने कि, ‘जब पहली खेप में वे अज्ञेय के साथ पहुँचे तो हुआ क्या था? क्या उनका या अज्ञेय जी का अपमान किसी ने कर दिया?
‘अरे, नहीं भैया! वह हम लोगों का अपमान क्या करेगा? तुमने जिस कार में हम लोगों को भेजा था, वहाँ उतरते ही वह आदमी वयोवृद्ध मजीठिया साहब से कहा-सुनी करता रहा। उसने यह भी कह दिया कि आप अज्ञेय जी के बहाने हमारे परिसर में कैसे आ गए? मजीठिया साहब तो सज्जन आदमी है, सुनकर मुस्कराते रहे, लेकिन भाई गंभीर हो गए। तभी मुझे लग गया कि कुछ-न-कुछ होकर रहेगा। वही हुआ भी।’
अज्ञेय जी की शालीन सामाजिकता और गहरी संवेदना ने राजमंगल पाण्डेय के अशालीन व्यवहार को अपने मौन से जो उत्तर दिया, उससे हम अवाक् थे। अपने प्रति व्यक्त किए जा रहे सम्मान का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था। उनकी भावभूमि कठोर यथार्थ और उतने ही कठोर आदर्श के बीच झूला झूलनेवाली भावभूमि थी ।
इसके बाद नेताओं से आजीवन नीरन जी का मोहभंग हो गया। महाविद्यालय से लेकर भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, विद्या श्री का मंच हो अथवा अन्तरराष्ट्रीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन कभी किसी नेता को उन्होंने अपने मंच पर स्थापित नहीं किया। बहुत से नेता जिनका व्यापक और विस्तृत आभा मण्डल था भोजपुरी मंच पर आने को, धन देने को तैयार रहते थे पर नीरन जी तो नीरन जी थे कभी किसी भी नेता को मंच पर स्थान नहीं दिया तो नहीं दिया और अगर स्थान दिया भी तो देश के राष्ट्रपति को, देश के प्रधानमन्त्री को और केवल राज्यपाल को। इसके अतिरिक्त किसी को नहीं । विश्व भोजपुरी सम्मेलन परिवार आपको विनम्र भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
ये भी पढ़ें- कलम, स्वर और संघर्ष के संगम हैं भोजपुरी के धुरंधर डॉ. गोपाल ठाकुर


[…] ये भी पढ़ें-अरुणेश नीरन : अज्ञेय जी से मि… […]