भोजपुरी साहित्य के धूमकेतु ‘चेतन जी’, जिन्होंने लोकगीतों को दिया साहित्य का गौरव

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Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज पढ़िए उस महान साहित्य साधक की कहानी, जिन्होंने भोजपुरी को केवल बोलचाल की भाषा नहीं माना, बल्कि उसे साहित्य, दर्शन और संस्कृति की समृद्ध भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का काम किया। आचार्य हरे राम त्रिपाठी ‘चेतन’ वह नाम है, जिनकी लेखनी में संस्कृत की गंभीरता, हिंदी की संवेदना और भोजपुरी लोकजीवन की आत्मा एक साथ दिखाई देती है। वे अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 26वें अध्यक्ष भी रहे हैं। इनकी भोजपुरी में 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

भोजपुरी साहित्य के आकाश में कुछ सितारे अपनी चमक से लंबे समय तक रास्ता दिखाते हैं। आचार्य हरे राम त्रिपाठी ‘चेतन’ ऐसे ही साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी साधना से भोजपुरी भाषा को नई पहचान दी। उन्हें भोजपुरी साहित्य का ‘धूमकेतु’ कहना इसलिए सार्थक है, क्योंकि उन्होंने उस समय भोजपुरी को अपनी लेखनी का केंद्र बनाया, जब मातृभाषा में लेखन को वह प्रतिष्ठा नहीं मिलती थी, जिसकी वह अधिकारी थी। उन्होंने सिद्ध किया कि भोजपुरी केवल लोकगीतों और बातचीत की भाषा नहीं, बल्कि दर्शन, चिंतन, साहित्य और संस्कृति की भी समर्थ भाषा है।

भोजपुरी की माटी से निकला साहित्य का धूमकेतु

आचार्य हरे राम त्रिपाठी ‘चेतन’ का जन्म 19 मार्च 1942 को बिहार के भोजपुर जिले के चारघाट गांव में हुआ। उनके पिता रामछबीला त्रिपाठी और माता रामपरी देवी थीं। यह वह दौर था, जब देश स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण में था। गांवों में आजादी की चेतना थी और भारतीय संस्कृति की जड़ें लोकजीवन में गहराई से जुड़ी हुई थीं। इसी वातावरण ने चेतन जी के भीतर लोक संस्कार, भारतीय दर्शन और साहित्यिक चेतना का निर्माण किया। भोजपुरी अंचल की मिट्टी, लोकगीतों की मिठास और गांव की जीवन शैली आगे चलकर उनके साहित्य की पहचान बनी।

एक जगह साहित्यकार अरविंद विद्रोही लिखते हैं कि आचार्य हरे राम त्रिपाठी ‘चेतन’ को भोजपुरी साहित्य का ‘धूमकेतु’ कहना बिल्कुल उचित है। उनका कहना है कि जहां अनेक प्रतिष्ठित हिंदी विद्वानों ने अपनी मातृभाषा भोजपुरी के लिए बहुत कम काम किया, वहीं चेतन जी ने हिंदी के साथ-साथ भोजपुरी को भी अपनी साहित्य साधना का केंद्र बनाया। उन्होंने भोजपुरी के संस्कार गीतों, प्रेम गीतों और लोक साहित्य को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। भोजपुरी भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए चल रहे लंबे संघर्ष के बीच चेतन जी का समर्पण उन्हें भोजपुरी साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण पुरोधाओं में शामिल करता है। उनकी भोजपुरी कृतियां उनकी भाषा-सेवा और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता की सशक्त गवाही देती हैं।
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बनारस ने दिया ज्ञान और चिंतन का विराट संसार

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद आचार्य चेतन जी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने। काशी की साहित्यिक और आध्यात्मिक भूमि ने उनके चिंतन को व्यापक आयाम दिया। वे संस्कृत, हिंदी और भोजपुरी के विद्वान होने के साथ-साथ भारतीय दर्शन के गंभीर अध्येता भी रहे। शाक्त और शैव साधना परंपरा, अद्वैत वेदांत और सांख्य दर्शन पर उनकी गहरी पकड़ थी। उन्होंने शास्त्र और लोक, दोनों को समान महत्व दिया। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक जीवन का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

हिंदी साहित्य में भी छोड़ी अमिट छाप

आचार्य चेतन जी का साहित्यिक व्यक्तित्व केवल भोजपुरी तक सीमित नहीं रहा। हिंदी साहित्य में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिंदी में 30 से अधिक किताबें इनके नाम से हैं, उनकी प्रमुख हिंदी कृतियों में प्रेममयी शबरी, कबीरा समय के साक्षी, महादेवी वर्मा एवं उनके गीत, प्रेम लपेटे अटपटे, यादों की जंजीर, पंचामृत गीत संग्रह, युग्म भूमि, उलगुलान की आग प्रमुख हैं। उनकी रचनाओं में प्रेम, भक्ति, दर्शन, अध्यात्म और मानवीय संवेदनाओं का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।

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भोजपुरी को दिया साहित्यिक गरिमा का नया आयाम

आचार्य चेतन जी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने भोजपुरी को केवल लोकभाषा मानने से इनकार किया। उन्होंने भोजपुरी में कविता लिखी, लोकगीतों को संकलित किया, संस्कार गीतों पर शोध किया और अनुवाद के माध्यम से भोजपुरी साहित्य को व्यापक बनाया।
उनका विश्वास था कि भोजपुरी में जीवन के हर भाव को व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है। आज भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की जो चर्चा होती है, उसमें चेतन जी जैसे साहित्यकारों का योगदान मजबूत सांस्कृतिक आधार प्रदान करता है।

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लोकगीतों के सबसे बड़े संरक्षकों में एक

भोजपुरी लोकगीतों के संरक्षण और साहित्यिक मूल्यांकन में आचार्य चेतन जी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने लोकगीतों को केवल संग्रहित नहीं किया, बल्कि उनके पीछे छिपे समाज, संस्कृति और भावनाओं को समझा। उनकी प्रमुख भोजपुरी कृतियां हैं-
माटी गावे गीत
लोकगंधी भोजपुरी के संस्कार गीत
सावन के झींसी
बिरहा बिनोद
उबियान
गीत प गीत
भीतर आँत धुँआत बा
फूल गंगबरार के
हूलि दे पेशावर ले

इन रचनाओं में भोजपुरी समाज का पूरा जीवन दिखाई देता है गांव, खेत, ऋतु, संस्कार, प्रेम, पीड़ा, भक्ति और राष्ट्र चेतना।

माटी गावे गीत : भोजपुरी लोकजीवन का दस्तावेज

आचार्य चेतन जी के लिए लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि समाज की स्मृति और इतिहास थे। उन्होंने जन्म, विवाह, ऋतु और सामाजिक संस्कारों से जुड़े गीतों को संजोकर भोजपुरी संस्कृति की अमूल्य धरोहर को सुरक्षित किया। उनकी पुस्तक ‘लोकगंधी भोजपुरी के संस्कार गीत’ और ‘माटी गावे गीत’ भोजपुरी लोक परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।

कजरी में प्रकृति, प्रेम और लोक संवेदना

‘चेतन जी की लोक दृष्टि अत्यंत व्यापक है। विशेष रूप से भोजपुरी संस्कृति और माटी से जुड़े तत्वों को उन्होंने अपनी लेखनी में अद्भुत रूप से प्रस्तुत किया। उनकी पुस्तक ‘सावन के झींसी’ में कजरी को केवल गीत नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूति के रूप में देखा गया है। उनके अनुसार- कजरी दर्द की मधुर आवाज है, मौसम के साथ मन का संवाद है। कजरी आंखों के आंसुओं की भाषा है, जिसमें विरह की टीस, प्रेम की कसक और मन की पुकार छिपी होती है। सावन के मौसम में जब प्रकृति हरियाली से भर जाती है, तब कजरी मन के भीतर उतरती है।

चेतन जी की दृष्टि में- ‘कजरी भोजपुरिया संस्कृति के छपछपात उछाल हऽ आ गांव के नारी अस्तित्व के दर्ज करे के सरस सलीका हऽ।’ यानी कजरी केवल गीत नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की स्त्री संवेदना, रिश्तों और भावनाओं का जीवंत दस्तावेज है।

गीतों में लोक और शास्त्र का संगम

उनकी कृति ‘उबियान’ में प्रेम और विरह की गहरी अनुभूति दिखाई देती है-
‘उनुके विरह सखी! दूबर भइलि देह,
मुँह बा पिअर, मन मलिन भइल बा।
खटरस भोग रोग, गहना लागता भार,
बसन ना नीक लागे, मइल भइल बा।।’

इन पंक्तियों में लोकभाषा की मिठास और शास्त्रीय भावभूमि का अद्भुत मेल दिखाई देता है।

किसान और समाज की पीड़ा के कवि

चेतन जी केवल प्रेम और अध्यात्म के कवि नहीं थे। उनके साहित्य में गांव, किसान और समाज की पीड़ा भी दिखाई देती है। उनकी कजरी की पंक्तियां-
‘रुक-रुक जो बादरा! पल भर कान दे,
अलसाइल धरती के तनिक मान दे।’
प्रकृति और किसान के रिश्ते को व्यक्त करती हैं।

राष्ट्र चेतना से ओतप्रोत साहित्य

आचार्य चेतन जी की रचना ‘हूलि दे पेशावर ले’ वीर रस और राष्ट्र भावना से भरपूर है। इसमें उन्होंने सैनिकों के साहस और देशभक्ति को स्वर दिया-
‘लहू के कसम ले सीवान के शहीदन के,
हूलि दे पेशावर ले खींचु खून से लकीर।’

आचार्य चेतन जी ने संस्कृत की महान कृतियों को भोजपुरी पाठकों तक पहुंचाने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने रघुवंश, कुमारसंभव, गीत गोविंद जैसी कालजयी रचनाओं का भोजपुरी अनुवाद किया। कन्नड़ संत साहित्य ‘वचन’ का भोजपुरी रूपांतरण भी उनका महत्वपूर्ण योगदान है।

सम्मान और उपलब्धियां

आचार्य चेतन जी की साहित्य साधना को अनेक संस्थाओं ने सम्मान दिया। प्रमुख सम्मान-
अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन, गाजियाबाद सम्मान
भोजपुरी साहित्य परिषद सम्मान
झारखंड सरकार के कार्मिक एवं राजभाषा विभाग द्वारा सम्मान
महात्मा गांधी विद्यापीठ, गुजरात सम्मान
नागार्जुन सम्मान
विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा “विद्यासागर” उपाधि
इसके अलावा वे अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 26वें अध्यक्ष भी रहे।

भोजपुरी साहित्य का धूमकेतु

आचार्य हरे राम त्रिपाठी ने साबित किया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की आत्मा होती है। उन्होंने संस्कृत की विद्वत्ता, हिंदी की साहित्यिक परंपरा और भोजपुरी की लोक चेतना को एक साथ जोड़कर ऐसी साहित्यिक विरासत बनाई, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी। भोजपुरी साहित्य के आकाश में अनेक सितारे हैं, लेकिन आचार्य चेतन जी वह धूमकेतु हैं, जिनकी रोशनी भोजपुरी भाषा, लोक संस्कृति और साहित्य की राह को हमेशा प्रकाशित करती रहेगी।

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