भोजपुरी में का बा? भाग-1

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डॉ. संतोष पटेल

भोजपुरी साहित्य में कुछ काम अइसन भइल बा, जवन होखे वाला घटना से पहिलहीं सोच लिहल गइल बा। सुरेश कांटक जी भोजपुरी के मजल नाटककार, बेजोड़ कहानीकार आ जनवादी कवि बानी। खाली नाटककार कहि के उहाँ के वर्सेटिलिटी के आलोता ना कईल जा सके।

आजकल चूंकि “बंदे मातरम” पर राजनीतिक चर्चा जोर पर बा, साँच कहल जाव त उफान पर बा। टीवी डिबेट से राजनीतिक बतकही भा पॉलिटिकल डिस्कोर्स में आजू-काल्ह ई ट्रेंड कर रहल बा। बाकिर सुरेश कांटक जी के ई नाटक करीब पच्चीस साल पहिले यानी 2001 में प्रकाशित भइल।

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एह नाटक में जहाँ 25 गो पुरुष पात्र बा, त 4 गो स्त्री पात्र बाड़ी। सबसे बड़की बात ई बा कि मर्दाना पात्र में 4 गो बेरोजगार पात्र बाड़ें। जवन समस्या आजादी के समय रहल, ओकरा बाद रहल आ फेर आजो बा, उ बाटे—बेरोजगारी। दु गो भिखारी आ एगो पागल कवि, दु गो कारखाना के मजूर आ एकाध गो खेतिहर मजूर बा। धेयान देवे वाला बात ई बा कि कांटक जी के नाटक सामाजिक भेदभाव, सामाजिक, आर्थिक आ प्रशासनिक भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत आ सामाजिक बेइमानी, दोहरा शोषण के मुखालफत करत उत्पीड़ितन के पक्ष में आ के खड़ा हो जाता। तब हमके सफदर हाशमी, हबीब तनवीर, बादल सरकार भा उत्पल दत्त के इयाद आवेला कि ऊ लोग के लेखा जनवादी मंच के सदुपयोग कईले रही।

भोजपुरी में भिखारी ठाकुर जी के नाटक के बात होखेला, राहुल सांकृत्यायन जी के नाटक के बात होखेला, ई जरूरी बा। बाकिर ओकर परछाई में भोजपुरी के दूसर नाटककार के लुका ना देवे के चाहीं। एही से समकालीन भोजपुरी नाटककार में सुरेश कांटक जी के नाटक पर खुल के बात होखल जरूरी बा। रचनाकार के साहित्य के महत्व तब बा, जब ओकरा पर चर्चा होखे आ जरूरी चर्चा एह बात के होखे कि उनकर लिखल साहित्य अपना समय के समस्या से कइसे मुठभेड़ कर रहल बा। भोजपुरी के साहित्यिक कैनवास बहुत लमहर आ चाकर बा।

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कांटक जी के नाटक ‘सरग नरक’ पर आज चर्चा समीचीन होई, काहे कि सत्ता जे लेखा धर्मशास्त्र के आड़ में राजनीतिक रोटी सेंक रहल बा, उह धर्मग्रंथ के सच्चाई कांटक जी के नाटक ‘सरग नरक’ खोल देत बा। ओही लेखा सत्ता संपोषित नैरेटिव के ‘वंदे मातरम’ नाटक ध्वस्त कर रहल बा।

साँच कहीं त सुरेश कांटक के नाटकन के पढ़ला पर ऑगस्तो बोआल (Augusto Boal, 1931–2009), जे ब्राज़ील के रंगकर्मी, निर्देशक आ राजनीतिक थिएटर के सिद्धांतकार रहलें, उनकर इयाद आ गइल। बोआल रंगमंच के खाली मंच पर बैठल कलाकारन के प्रदर्शन माने के बजाय सामाजिक अन्याय आ सत्ता-संबंध के समझे, समझावे अउर ओकरा बदले के माध्यम बनवलें।

उनकर सबसे प्रसिद्ध अवधारणा रहल—उत्पीड़ित के रंगमंच (Theatre of the Oppressed)। एही अवधारणा के कांटक जी कगरी बानी।

‘वंदे मातरम’ नाटक नव सृजन सांस्कृतिक मंच, बक्सर, बिहार से मंचित बा। नाटक के शुरुआत धरती वंदना से शुरू होखत बा आ ई नाटक पाँच अंक में विभक्त बा। हरेक अंक में अलग-अलग दृश्य में समायोजित कइल गइल बा।

नाटक में वर्णित समय आजादी के समय वाला बा। मसलन, शोषण के दोहरा व्यवस्था—अंग्रेज आ जमींदार, दुनू के हाथ से जनता के शोषण हो रहल बा। नाटक में ओह समय के स्थिति के बड़ा बढ़िया ढंग से प्रस्तुत कइल गइल बा। समस्या, संघर्ष, दमन आ प्रतिरोध सभ के उचित ढंग से प्रस्तुतिकरण भइल बा।

अब देखीं कि पागल कवि के व्यंग्य नाटक के अउर गंभीर बना देत बा। सबसे बड़की बात नाटककार बेरोजगारन के मुंह से कहवा रहल बाड़े, उ रेघियावे जोग बा—

“सभ हाथन के काम दे
आ जिनगी के दाम दे
आग पेट के ई ना छोड़ी
दउरी कागज के ना घोड़ी
धार बदल के छोड़ब जा
गद्दी के मुँह मोड़ब जा।”

दरअसल ई नाटक आज के वक्त में केतना प्रासंगिक बा, ओकर ई तस्वीर बा। जहाँ आज सत्ता वंदे मातरम के राग अलाप रहल बिया आ कुछ लोग बेरोजगार के कोकरोच, कुत्ता आ नाली के पिलुआ से संबोधित कर रहल बा, त बेरोजगार समवेत स्वर में जवन आज कहल रहल बा, सुरेश कांटक जी आज से 25 बरिस पहिले कहले बानी।

नाटक पर आपन विचार के विराम देवे से पहिले नाटक के पात्र पागल कवि, जवन सुरेश कांटक जी के कवित्व के उजागर करत बा, ऊ जरूर उद्धृत करब-

“नागवा के फनवा में मंतर मोहनिया कुछउ ना एकरा से छूटी हो
इहे ठगवा नगरिया (घूमत बा)।”

‘वंदे मातरम’ कहल कब ठीक होई, नाटक के अंत में भारत माता खुद कहत बाड़ी-

“अब आदमी के खून आदमी ना पीही। बेटी-बहिन के ईज्जता से केहू खेलवाड़ ना करी। अपराध अपहरण के रोजगार ना बढ़ी। हमरा धरती प खून के नदी ना बही….”

सुरेश कांटक सर के एह बेहद संवेदनशील नाटक खातिर बहुत बधाई।

भोजपुरी साहित्य आ भाषा पर गिरल टिप्पणी करे वाला लोगन के ध्यानार्थ कि-भोजपुरी में का बा?

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