‘फगुआ के पहरा’ भोजपुरी कविता में लोकसंवेदना और प्रयोग का विस्तार

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समीक्षक : डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा

भोजपुरी साहित्य में ऐसी कृतियों का विशेष महत्त्व है, जिनमें लोकजीवन की सहजता के साथ समय और समाज की धड़कन भी सुनाई देती है। रामरक्षा मिश्र विमल की ‘फगुआ के पहरा’ ऐसी ही कृति है, जिसमें गीत, ग़ज़ल, कविता और हाइकू के माध्यम से जीवन के विविध रंगों को अभिव्यक्ति मिली है। यह पुस्तक अपनी विषय-विविधता, लोकभाषा और प्रयोगधर्मिता के कारण पाठक का ध्यान आकर्षित करती है। प्रस्तुत समीक्षा इसी रचनात्मक संसार के गुण-दोषों को समझने का एक प्रयास है।

किताब की भूमिका में रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव उर्फ जुगानी भाई लिखते हैं कि, ‘भाषा आ भोजन के प्रश्न एक-दूसरे से हमेशा जुड़ा रहता है। जीस स्थान की भाषा गरीब हो जाती है वहाँ अपने ही नजर में लोग हीन हो जाते हैं। वहाँ के लोग हीन और गरीब हो जाते हैं।’ उन्हीं के तर्ज पर हम कह सकते हैं कि भोजपुरिया आदमी आज समृद्ध है। कवि-साहित्यकार डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल की किताब ‘फगुआ के पहरा’ पढ़ने के बाद मैं स्पष्ट रूप से कह सकता हूँ कि माटी की गंध जहाँ तक फैली है, वहाँ तक विमल जी की कविताओं के विषय हैं। कवि ने अपनी परंपरा और विषय के साथ चुनौतियों के बावजूद बेहतर तालमेल निभाया है। पुस्तक के नाम से ज्ञात होता है कि इसमें प्रकृति के सरस और उदात्त रूप पर रचनाएँ खूब हैं, लेकिन प्रस्तुति का नजरिया अलग है।

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‘वनांचल प्रकाशन’ से प्रकाशित यह पुस्तक ‘फगुआ के पहरा’ का दूसरा संस्करण है। भोजपुरी कविता की किसी किताब का दूसरा संस्करण आना अपने-आप में इतिहास ही बनता है। यह पुस्तक कई भागों में विभाजित है, यथा—गीत, ग़ज़ल, कविता और हाइकू। काव्य-परंपरा का निर्वाह करते हुए कवि ने प्रथम रचना सरस्वती माँ को अर्पित की है। ‘बरिसावऽ माँ नेह सुधा’ में वे सबके लिए ज्ञान-ज्योति की माँग करते हैं और अनाचार खत्म करने की गुहार लगाते हैं—

‘अनाचार के सगरो पहरा,
बिलखत जिनगी के भिनसहरा,
फइला दऽ ना ग्यान जोति,
जड़ बुधि होखो चंचल।’

कवि को भूत-भविष्य का ज्ञाता माना जाता है। विमल जी के गीतों में यह गुण स्पष्ट झलकता है। आज समाज में फूट, मतभेद, अनाचार तथा जाति-धर्म के आधार पर विघटन की प्रवृत्तियाँ व्याप्त हैं। समाज हर घटना को अलग-अलग चश्मे से देखता है, जिसमें कहीं न कहीं स्वयं का स्वार्थ जुड़ा होता है। सभी भूल गए हैं कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की परंपरा रही है। भारत की इसी परंपरा का पालन करते हुए कवि लिखते हैं-

‘आईं हमनी सभ बइठीं सुख-दुख आपन बतियाईं जा।
घरफोरवा बा के हमनी के ओकर पता लगाईं जा॥
मान बढ़ाईं जा माटी के भेदभाव सब छोड़ के।
दुअरा-अँगना कहिया छिटकी मधुर किरिनिया भोर के॥’

पुस्तक में कवि के गीतों के बिंब लोकधर्मी हैं और सहज रूप से पाठक तक पहुँचते हैं। ‘मन बरबस कहीं अउरी चल जा ताऽ’ की अनुभूति हो, ‘असो जाए फगुनवा ना बाँव सजना’ की बात हो, ‘लागेला रस में बोथाइल परनवा’ का भाव हो, ‘दूब के सुतार’ हो या ‘फागुन के आसे’—इन रचनाओं के बिंब मनमोहक और महत्त्वपूर्ण पड़ाव कहे जा सकते हैं। यथा—

‘डर ना लागी,
बाबा के नवकी बकुली से,
अँगना दमकी,
बबुनी के नन्हकी टिकुली से,
कनिया पेन्हि बिअहुती,
कउआ के उचराई।’

कवि ने अपनी रचनाओं में लोकोक्तियों और मुहावरों का भी प्रयोग किया है, जो पुस्तक को और मजबूत बनाता है। यह प्रयोग पाठकों को अपनी ओर खींचने में सफल होगा। यथा—

‘खतरा बा लाँघला पर आपन सिवान,
कठवति के गंगा में कउआ नहान।’

चाहे-

‘अब तऽ पनियो में अगिया के हलचल होखे लागल बा।’

या

‘मिले सेर के सवा सेर,
औकात बुझाए लागल।’

कहीं-कहीं शिल्प टूटने के बावजूद कवि के शब्दों ने ऐसा प्रभाव पैदा किया है कि पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है। मैं कह सकता हूँ कि शायद उसकी आँखें भी भर आएँ। इसे ‘आँखि लाग गइल’ कविता में अनुभव किया जा सकता है। भोजपुरी संस्कृति और व्यवहार की पूरी गंगा कवि ने दोहे में उड़ेल दी है। उदाहरण के लिए यह दोहा पढ़िए—

‘झट से निरनय जनि लिहीं, घिन आवे भा खीस।
झुक जाए कब का पता, कट जाए कब सीस॥’

किताब के बारे में शोध करते समय पता चला कि विमल जी केवल कवि ही नहीं हैं, बल्कि अच्छे गायक-कलाकार भी हैं। उनकी ये खूबियाँ पुस्तक की ग़ज़लों से स्पष्ट होती हैं। कवि की ग़ज़लों के रदीफ़ और काफ़िए गेय मीटर के अनुरूप ढाले गए हैं। मतला और बहर में भी रचनाकार ने अपने अनुभव को स्थापित किया है। पाठकों को ग़ज़ल एक, दो, आठ, दस, चौदह, सोलह, उन्नीस, बीस, इक्कीस, बाईस आदि में बड़े तथा तीन, चार, छह, नौ आदि में छोटे रदीफ़-काफ़िए भी देखने को मिलते हैं।

कवि ने ग़ज़ल के विषय में भी कुछ प्रयोग किए हैं। जैसे, स्वाइन फ्लू पर लिखी ग़ज़ल—

‘बंद भइल अब सब खिरिकी दरवाजा आइल स्वाइन फ्लू,
बचिहऽ भइया आफति के आफति अफनाइल स्वाइन फ्लू।’

हालाँकि यह विषय लेखनी के स्तर को कुछ हल्का कर देता है और कवि के उच्च रचनात्मक स्तर को देखते हुए यह रचना अपेक्षाकृत कमजोर कही जाएगी।

विमल जी हाइकू लिखने में भी महारत रखते हैं। प्रकृति के करीब और विकास के पक्षधर के रूप में वे हाइकू लिखते हैं-

‘जीयत चलीं
बहार पतझड़
लागले रही।’

जब पुस्तक का प्रथम संस्करण आया था, उस समय हाइकू विधा के सौ वर्ष पूरे हुए थे। ऐसे में इस विधा का प्रयोग उचित और सार्थक भी कहा जा सकता है।

भोजपुरी पुस्तकों के इतिहास की दृष्टि से यह दूसरा संस्करण अपने आप में ऐतिहासिक कहा जा सकता है। इसमें कुछ लोगों की टिप्पणियाँ भी शामिल हैं।

मनोकामना सिंह ‘अजय’ की टिप्पणी है—‘जवन ‘ही’ आ ‘भी’ के सथवे अंग्रेजी शब्दन के प्रयोग पर बा। भोजपुरी में ढेर लोग ‘ही’, ‘भी’ के प्रयोग करेला। हमरो विचार से ‘ही’, ‘भी’ के प्रयोग भोजपुरी में स्वीकार्य ना होखे के चाहीं। जहाँ अउरी भाषा के शब्दन के प्रयोग बा, भोजपुरी के ओहसे समृद्धि होईं। कतहूँ से हानि नइखे।’

कवि के प्रयोग किए गए हिंदी-अंग्रेजी-उर्दू के शब्दन के देखीं – दहशतगर्दी, टीवी, फोन, साउथ, कल्चर, सर पे, रिलैक्स, एहसास, कापी, पेन, प्राॅमिस, साॅरी, स्विच आॅफ, स्वाइन फ्लू, सीबीआई, बेइमान, इंफेक्शन आदि। ‘अनुभव’ शीर्षक में पढ़िए –

अनुभव
सर दर्द के दवाई
आयोडेक्स
अनुभव
विकास के पर्याय
फ्री सेक्स

हालाँकि इस तरह का प्रयोग भोजपुरी की भाषा और व्याकरण के दृष्टिकोण से स्वीकार नहीं है। जब इन सब के लिए भोजपुरी में शब्द उपलब्ध न हों, तब प्रयोग किया जाए तो अलग बात है, लेकिन इस तरह का प्रयोग अगर लगातार हुआ तो भोजपुरी भाषा को क्षति ही पहुँचाएगा।

प्रयोगधर्मी कवि के रूप में उनकी रचनाओं में विविधता है। शब्दों को उन्होंने प्रयोग भी किया है, अलग तरीके से लिखने का जोखिम भी उठाया है। उदाहरण स्वरूप देखिए ‘अंगना’ चाहे ‘अँगना’ खातिर ‘अड.ना’ और संङे, बड.ला, अङुरी, अमिरित, बिशवास, किताब में ‘ड.’ के प्रयोग ढेर मिली। एक उदाहरण –

सखियन का संङे जाके गंगा नहाइल
संङे- संङे नून मरिचा साग खोंटि खाइल
नइहर के सुख सब गइले छिनाई
अँखिया लोर बरिसाई ……।

पाठक इस प्रयोग से भ्रमित भी हो सकता है और इसे संपादक की त्रुटियाँ भी समझ सकता है और कवि के ऊपर सोचने के लिए भी विवश हो सकता है।

कवि ने निश्चित रूप से भोजपुरी के लुप्त होते कुछ शब्दों का प्रयोग करके जीवित कर दिया है।
बाँव, छवरी, पेन्हि, गर्हुआइल, घरफोरवा, सुसुकत, चुहानी, पखाउज आदि अनेकों शब्द हैं।

अतः‘फगुआ के पहरा’ भोजपुरी कविता की समृद्ध परंपरा और बदलते समय के बीच एक सार्थक संवाद प्रस्तुत करती है। पुस्तक में जहाँ कवि की रचनात्मक क्षमता, लोक-संवेदना और प्रयोगधर्मिता प्रभावित करती है, वहीं कुछ भाषिक और शिल्पगत प्रयोग पाठक को ठहरकर सोचने के लिए भी विवश करते हैं। इन सीमाओं के बावजूद यह कृति भोजपुरी साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण और पठनीय योगदान है। निश्चित रूप से ‘फगुआ के पहरा’ रामरक्षा मिश्र विमल की रचनात्मक पहचान को मजबूत करने वाली पुस्तक है।

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