विनोद अनुपम, वरिष्ठ फिल्म समीक्षक
बिहार के मुख्यमंत्री किसी भी मंच पर आने-जाने के लिए स्वतंत्र हैं। किसी कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति तय करने के लिए कई स्तरों पर लोग जुड़े होते हैं, जो आयोजन, मंच और उसकी पृष्ठभूमि की जानकारी रखते होंगे। लेकिन जब किसी ऐसे कार्यक्रम में मुख्यमंत्री की मौजूदगी होती है, जिस पर भोजपुरी भाषा, भोजपुरी सिनेमा और भोजपुरी समाज की छवि को लेकर सवाल उठ रहे हों, तो स्वाभाविक रूप से चर्चा होना भी तय है।
सवाल यह नहीं है कि मुख्यमंत्री किसी कार्यक्रम में क्यों गए, बल्कि सवाल यह है कि क्या उन्हें उस आयोजन की पूरी पृष्ठभूमि और उसके नाम व प्रस्तुति से जुड़े पहलुओं की जानकारी दी गई थी?
भोजपुरी समाज की पहचान केवल फिल्मों या मनोरंजन कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। भोजपुरी एक समृद्ध भाषा, संस्कृति और परंपरा का नाम है। इसमें लोकगीतों, साहित्य, रंगमंच और सामाजिक सरोकारों की लंबी परंपरा रही है। ऐसे में किसी भी कार्यक्रम का नाम या प्रस्तुति अगर पूरे भोजपुरी समाज को प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है, तो उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
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‘भोजपुरिया बवाल’ जैसे शीर्षक को लेकर यही सवाल उठ रहा है कि आखिर यह नाम किस सोच के आधार पर रखा गया? अगर यह केवल भोजपुरी सिनेमा या मनोरंजन जगत से जुड़ा कार्यक्रम था, तो इसे उसी दायरे में रखा जा सकता था। लेकिन ‘भोजपुरिया’ शब्द सीधे तौर पर पूरे भोजपुरी समाज और उसकी पहचान से जुड़ जाता है।
भोजपुरी सिनेमा और भोजपुरी समाज को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है। भोजपुरी सिनेमा में भी कई तरह के प्रयास होते रहे हैं। कुछ फिल्मों और गीतों को लेकर आलोचना हुई है, वहीं दूसरी ओर भोजपुरी साहित्य, लोककला और सामाजिक विषयों पर आधारित रचनाओं ने भाषा का गौरव भी बढ़ाया है। इसलिए किसी एक मनोरंजन कार्यक्रम या प्रस्तुति के आधार पर पूरी भोजपुरी संस्कृति को परिभाषित करना सही नहीं होगा।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हाल के समय में अश्लील गीतों और भोजपुरी कंटेंट की गुणवत्ता को लेकर कई बार आवाज उठी है। समाज के विभिन्न वर्गों ने मांग की है कि भोजपुरी मनोरंजन जगत में ऐसे कंटेंट को बढ़ावा मिलना चाहिए, जो भाषा की गरिमा और संस्कृति का सम्मान करे।
ऐसे में जब किसी बड़े सार्वजनिक मंच पर भोजपुरी नाम का इस्तेमाल किया जाता है, तो उम्मीद की जाती है कि वहां भाषा और समाज की सकारात्मक छवि को प्रस्तुत किया जाए। भोजपुरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं और पहचान से जुड़ी भाषा है।
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इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू राजनीतिक भी है। कार्यक्रम में तेज प्रताप यादव की प्रस्तुति और उन्हें केंद्र में रखने को लेकर भी चर्चाएं हुईं। आयोजन में उनकी छवि को प्रमुखता देने और उनके साथ फिल्म अभिनेत्री मल्लिका शेरावत की मौजूदगी ने कार्यक्रम को और अधिक चर्चा में ला दिया।
हालांकि किसी भी कलाकार, नेता या अतिथि की मौजूदगी अपने आप में विवाद का विषय नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब किसी आयोजन का नाम और पहचान किसी बड़े सामाजिक समूह से जुड़ी हो, तो उसकी प्रस्तुति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जरूरत इस बात की है कि भोजपुरी को केवल मनोरंजन बाजार के नजरिए से नहीं देखा जाए। भोजपुरी की असली ताकत उसकी लोक संस्कृति, साहित्य, संगीत और सामाजिक विरासत में है। कार्यक्रम हों, फिल्में बनें या गीत तैयार हों—उनमें भोजपुरी की गरिमा और पहचान का ध्यान रखा जाना चाहिए।
क्योंकि भोजपुरी समाज अपने नाम पर केवल ‘बवाल’ नहीं, बल्कि अपनी भाषा और संस्कृति का सम्मान चाहता है।


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