समीक्षक: डॉ. सुनील कुमार पाठक
भोजपुरी के प्रख्यात रचनाकार बलभद्र के समालोचनात्मक आलेखों का संग्रह ‘भोजपुरी साहित्य : देश के देस का’ सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। इसमें लेखक के पंद्रह आलेख संकलित हैं। इन आलेखों के माध्यम से आधुनिक भोजपुरी साहित्य, उसकी लोकचेतना, सामाजिक सरोकार, भाषा, संस्कृति और रचनात्मक प्रवृत्तियों को समझने की गंभीर कोशिश की गई है।
संग्रह में ‘देश के देस की कविता-भोजपुरी’, ‘भोजपुरी में विस्थापन के काव्य-प्रसंग’, ‘भोजपुरी कविता का जनपक्ष’, ‘सत्ता-व्यवस्था पर भोजपुरी कविता का व्यंग्य’, ‘भोजपुरी कविता के संवादधर्मी जन-संदर्भ’, ‘लोक-साहित्य : जीवनधर्मी संकल्पों की विरासत’, ‘भोजपुरी लोककथा : कहना-सुनना-समझना’, ‘लोकगीत : लेखा-देखा’, ‘जिंदगी की महिमा का गायक’, ‘पीड़ा, प्रश्न और प्रतिकार की गूंज’, ‘तत्समता और तद्भवता के बीच’, ‘भोजपुरी का गद्य-बल’, ‘विभाजन को खारिज करते मुस्लिम लोकगीत’, ‘बटोहिया और अछूत की शिकायत के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और सरोकार’ तथा ‘युवा-मन की प्रतिक्रियाओं में उभरती जिंदगी की तस्वीर’ जैसे आलेख शामिल हैं।
कई आलेख पहले विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, लेकिन भोजपुरी पत्रिकाओं के सीमित प्रसार को देखते हुए इनका एक पुस्तक के रूप में सामने आना महत्वपूर्ण है। इससे भोजपुरी साहित्य पर लिखे गए गंभीर आलोचनात्मक विमर्श को एक जगह पढ़ने और समझने का अवसर मिलता है।
भोजपुरी को व्यापक साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत
पुस्तक को पढ़ते हुए सुधीर सुमन लिखते हैं-‘भोजपुरी की कविता पर हिंदी में लिखना एक तरह से उसकी साहित्यिक दावेदारी को बड़े दायरे में ले जाने का काम है।’
काश, इस बात को भोजपुरी के सभी साहित्यिक पहरेदार भी समझ पाते! वे तो डंडे लेकर पहरेदारी करेंगे कि भोजपुरी के ‘देस’ में हिंदी ‘देश’ का कोई प्रवेश न हो। ऐसी पहरेदारी हिंदी में कभी नहीं हुई, मैथिली में भी नहीं, मगर भोजपुरी में होती दिखाई देती है।
निश्चय ही ऐसा मनोविज्ञान कूपमंडूकता और बाहरी दुनिया से अपरिचय को ही बढ़ावा देगा। केवल भोजपुरी बोलने या भोजपुरी में रचने वाले ही भोजपुरी के मौलिक रचनाकार होंगे—यह दंभ अंततः आत्मघाती सिद्ध हो सकता है।
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जब कोई कहता है कि केवल दलित ही मौलिक संवेदनाओं के साथ दलित साहित्य रच सकते हैं तो आपकी आपत्ति स्वाभाविक रूप से सामने आती है। फिर जब आप अपनी फतवेबाजी से हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत या किसी अन्य भारतीय भाषा के सर्जक को भोजपुरी साहित्य रचने से हतोत्साहित करते हैं, तो इसे कैसे जायज माना जाए?
केदार जी ऐसी ही मानसिकता के प्रति आशंकित थे। तभी तो उन्होंने हिंदी और भोजपुरी-चाहें तो कह लें ‘देश’ और ‘देस’ या ‘देश’ और ‘घर’—के बीच लगातार आवाजाही की जबरदस्त वकालत की थी—
‘हिंदी मेरा देश है
भोजपुरी मेरा घर
….मैं दोनों को प्यार करता हूं
और देखिए न मेरी मुश्किल
पिछले साठ बरसों से
दोनों को दोनों में
खोज रहा हूं।’
— देश और घर/सृष्टि पर पहरा
हिंदी में अज्ञेय, अरुण कमल, हरिवंश राय बच्चन और उर्दू में फिराक तथा मैथिली में बाबा नागार्जुन जैसे दर्जनों लेखकों ने दूसरी भाषाओं और साहित्यिक संस्कृतियों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन उन्हें तथाकथित ‘मौलिक रचनाकारों’ के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। फिर भोजपुरी को केवल संस्थानों और उसके प्रचंड पहरेदारों के हवाले क्यों कर दिया जाए?
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हिंदी आज जितनी फली-फूली है, उसमें विश्वविद्यालयों के हिंदी अध्यापकों और अकादमिक संस्थानों का कितना योगदान रहा है, यह अपने आप में एक दिलचस्प शोध का विषय हो सकता है।
लोकभाषा से लोकसंवेदना तक
भोजपुरी मूलतः लोक की भाषा है। हीरा डोम, भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिश्र, दुर्गेश अकारी, रमता जी, मास्टर अजीज जैसे अनगिनत रचनाकारों ने जन-संवेदनाओं और सरोकारों से जुड़ी महत्वपूर्ण रचनाएं दी हैं।
लेकिन इनके व्यापक मूल्यांकन के लिए जिस समझदार और बहुआयामी दृष्टि की आवश्यकता है, वह दूसरी भाषाओं के समकालीन साहित्यिक विकास को देखे-परखे बिना संभव नहीं है।
भोजपुरी केवल ‘हूलि द, रेल द, ठेल द, भज ल, भजवा ल, फाड़ि द, चीर द, झार द, उखाड़ द’ की भाषा नहीं रही। इसकी असली ताकत तो उन गीतों में भी है, जो धान रोपती महिलाओं के कंठ से फूटते हैं; उन गीतों में है, जिनमें पसीना बहाती धनरोपनी करने वाली महिला मजदूर की पीड़ा को आवाज मिलती है; उन सोहरों में है, जिनमें हिरनी अपने बच्चे की खाल के लिए कोशिला रानी से विनती करती है।
भोजपुरी उस मर्मांतक पीड़ा को स्वर देने वाली भाषा है, जिसे समाज अक्सर अनसुना कर देता है। भोजपुरी लोक-साहित्य की यही मौलिक संवेदनाएं आज भी इस भाषा को संजीवनी प्रदान कर रही हैं।
बलभद्र की आलोचना : अपनी जमीन पर अडिग
बलभद्र ने अपनी समालोचना को शुरू से ही एक स्पष्ट नजरिये के साथ विकसित किया है। वे लिखते हैं-
‘भोजपुरी कविता की यह खासियत है कि वह अपनी जगह छोड़कर बात करने को तैयार नहीं होती।’
अर्थात उसे अपनी जमीन पर अटूट भरोसा है। भोजपुरी कविता जहां खड़ी है, जिनके लिए खड़ी है और जिनके बूते खड़ी है उनके प्रति अखंड आस्था और प्रतिबद्धता ही उसका मूल चरित्र है।
भोजपुरी कविता का यही चरित्र बलभद्र की आलोचना में भी दिखाई देता है। एक बार जो चीज, चिंतन, राजनीति और विचार बद्धमूल रूप से उनके भीतर घर कर जाते हैं, उनसे विचलन उन्हें मंजूर नहीं। वे अपनी संवेदना को समाज की आखिरी कतार में खड़े बेबस, लाचार, पीड़ित और शोषित जन से जोड़ चुके हैं।
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इनके हितों की अनदेखी पर वे तिलमिला उठते हैं। यही तिलमिलाहट जब उन्हें दूसरों में दिखाई नहीं देती तो उसे खारिज करने में भी बलभद्र के आलोचक को तनिक देर नहीं लगती।
‘देश के देस का’ : शीर्षक में छिपा व्यापक अर्थ
इस पुस्तक का शीर्षक बेहद रोचक और आकर्षक है। बलभद्र कहते हैं-
“देश को देखना-समझना अपने आप में एक बड़ी बात है, पर ‘देश’ के भीतर ‘देस’ देखना—अपने गांव-घर को देखना कम बड़ी बात नहीं है।”
हिंदी में ‘देश’ को देखना एक आंदोलन के रूप में चिह्नित है और भोजपुरी में तो यह सहज रूप से घटित होता है।
हिंदी और भोजपुरी की जमीन में कोई बांट-बखरा नहीं है। यही कारण है कि कोई हिंदी वाला भी भोजपुरी की ताकत को कमतर नहीं आंक सकता। दूसरी ओर भोजपुरी को अपना दामन फैलाने के लिए हिंदी से बेवजह दूरी बनाने की भी क्या जरूरत है? भोजपुरी का इतिहास और चरित्र ऐसा कभी रहा भी नहीं है।
पुस्तक की भूमिका में सुधीर सुमन का कहना है-
‘जनभाषाओं की ताकत लोक है और हिंदी की ताकत लोकभाषाएं।’
यदि इनमें से कोई कमजोर होता है या इनके बीच के रिश्ते टूटते हैं तो उसका असर सभी पर पड़ता है। ठीक उसी तरह, जैसे जन, जनभाषा और वास्तविक जनतंत्र के बिना कोई ‘देस’ या कोई ‘देश’ मजबूत नहीं हो सकता।
पीड़ा, प्रश्न और प्रतिकार की प्रखर आवाज
बलभद्र की समालोचना में सचमुच पीड़ा, प्रश्न और प्रतिकार का स्वर प्रखर है। यहां जन की पीड़ा है, उसी के प्रश्न हैं और प्रतिकार की शक्ति भी उसी की है।
उनकी आलोचना केवल साहित्यिक कृतियों की अच्छाइयां-खामियां गिनाने तक सीमित नहीं रहती। वे रचना के भीतर मौजूद सामाजिक यथार्थ, वर्गीय चेतना, लोक-संवेदना और सत्ता के साथ उसके संबंधों को भी तलाशते हैं।
इसी वजह से उनकी आलोचना में एक बेचैनी दिखाई देती है—कुछ बदलने की बेचैनी, कुछ पूछने की बेचैनी और उन आवाजों को सामने लाने की बेचैनी, जो अक्सर मुख्यधारा में दब जाती हैं।
जहां ये तीनों—पीड़ा, प्रश्न और प्रतिकार—एक साथ मौजूद हों, वहां उसकी शक्ति, गति और मति को नजरअंदाज करना नामुमकिन हो जाता है।
लोकगीत और लोककथा की शक्ति को पहचानती किताब
बलभद्र भोजपुरी साहित्य को केवल लिखित साहित्य की सीमाओं में नहीं देखते। उनके लिए लोकगीत, लोककथा और लोकसंस्कृति भी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर हैं।
भोजपुरी लोकगीतों में जीवन के सुख-दुख, श्रम, प्रेम, विरह, विस्थापन, पारिवारिक संबंध और सामाजिक संघर्ष की गहरी अनुभूतियां मौजूद हैं। लोककथाओं में पीढ़ियों से संचित अनुभव और सामूहिक स्मृति सुरक्षित है।
इसलिए भोजपुरी साहित्य को समझने के लिए उसके लोक-संसार को समझना अनिवार्य है। यह पुस्तक इसी व्यापक दृष्टि को सामने लाती है।
भोजपुरी के भीतर मौजूद सामाजिक विविधता
इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें भोजपुरी समाज को किसी एक रंग में नहीं देखा गया है। मुस्लिम लोकगीतों से लेकर ‘बटोहिया’ और ‘अछूत की शिकायत’ तक के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों की पड़ताल यह बताती है कि भोजपुरी का संसार बहुस्तरीय और बहुधर्मी है।
भोजपुरी की ताकत उसकी विविधता में है। इसमें अलग-अलग समुदायों, वर्गों और जीवन-अनुभवों की आवाजें एक साथ मौजूद हैं। यही विविधता इसे केवल एक बोली नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक संसार बनाती है।
किताब का महत्व
कुल मिलाकर ‘भोजपुरी साहित्य : देश के देस का’ भोजपुरी गीत, कविता, लोकगीत, लोककथा, समाज और संस्कृति को एक मुकम्मल, माकूल और वाजिब नजरिये से देखने की समझदार दृष्टि प्रदान करती है।
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यह पुस्तक भोजपुरी साहित्य के पाठकों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह केवल रचनाओं की चर्चा नहीं करती, बल्कि उनके पीछे मौजूद समाज, इतिहास, लोकचेतना और संघर्ष को भी समझने की कोशिश करती है।
बलभद्र की आलोचना में सहमति-असहमति के लिए पर्याप्त जगह है, लेकिन उनकी दृष्टि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे सवाल उठाते हैं, बहस खड़ी करते हैं और पाठक को अपनी स्थापित धारणाओं पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर करते हैं।
बहुत शानदार और जानदार लेखन। मगर ये सब तो आपके पुराने वाले हैं, बंधुवर! अब नई दुनिया के गझिन तिलिस्म को भी तोड़ना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह बहुरूपिया दौर है। मसलन, हर तरह के उपकरणों और उपचारों को आजमाना होगा।
भोजपुरी साहित्य के वर्तमान और भविष्य को लेकर यही आग्रह इस पुस्तक को केवल आलोचना-संग्रह नहीं रहने देता, बल्कि इसे भोजपुरी साहित्य की दिशा, दशा और संभावनाओं पर गंभीर संवाद की किताब बना देता है।
बधाई, बड़े भाई।

