डॉ. पीएन सिंह कॉलेज में भोजपुरी पर मंथन
छपरा। भोजपुरी भाषा के संरक्षण, संवर्धन और संवैधानिक मान्यता की मांग को लेकर सारण जिले के डॉ. पीएन सिंह कॉलेज में भोजपुरी पुनर्जागरण मंच के बैनर तले एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने नई पीढ़ी को भोजपुरी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने और संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल कराने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भोजपुरी पुनर्जागरण मंच (उत्तर प्रदेश) के अध्यक्ष नरसिंह ने कहा कि भोजपुरी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की मातृभाषा और सांस्कृतिक पहचान है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि सभी भोजपुरी भाषी एकजुट होकर इसे संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए संगठित प्रयास करें।
घर-घर तक पहुंचे भोजपुरी का संदेश
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए मंच के प्रमंडलीय अध्यक्ष रामनरेश ने लोगों से अपील की कि वे हर गांव, हर मोहल्ले और हर परिवार तक भोजपुरी भाषा के संरक्षण का संदेश पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि भाषा का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा, जब समाज स्वयं इसके लिए आगे आएगा।
ये भी पढ़ें-बिहार विधानसभा में गूंजी भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग, विधायक आनंद मिश्रा ने उठाई आवाज
जनगणना में ‘भोजपुरी’ दर्ज कराने की अपील
कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने आगामी राष्ट्रीय जनगणना के दौरान भाषा वाले कॉलम में ‘भोजपुरी’ दर्ज कराने की अपील की। उनका कहना था कि भोजपुरी बोलने वालों की वास्तविक संख्या सामने आने से आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग और अधिक मजबूत होगी।
शिक्षकों और बुद्धिजीवियों की रही सक्रिय भागीदारी
संगोष्ठी के प्रमुख संयोजक डॉ. पीएन सिंह डिग्री कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. ओम प्रकाश सिंह रहे। कार्यक्रम का संचालन प्रभारी प्राचार्य प्रो. विवेकानंद तिवारी तथा इंटर कॉलेज के प्राचार्य प्रो. प्रेम शंकर सिंह ‘पप्पू’ ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर प्रो. उदय नारायण सिंह, प्रो. नलिनी वर्मा, प्रो. संजीव कुमार, नरेंद्र मिश्रा, नित्यानंद, अवध बिहारी मिश्रा, ज्ञानदेव तिवारी, निर्भय नीर, मनोज कुमार सिंह सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, साहित्यकार और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।
Bhojpuri 24 View
भोजपुरी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लगातार देशभर में तेज हो रही है। छपरा में आयोजित यह संगोष्ठी इस बात का संकेत है कि अब शैक्षणिक संस्थान भी भाषा संरक्षण के अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जनभागीदारी और जनगणना में सही भाषा दर्ज कराने जैसे प्रयास इस आंदोलन को नई दिशा दे सकते हैं।

