भारत-नेपाल भोजपुरी साहित्यिक संबंधों के सशक्त सेतु हैं डॉ. विजय किशोर पाण्डेय

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डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा

भोजपुरी साहित्य में जब-जब नेपाल के साहित्यकारों की चर्चा होती है, तब-तब अनेक प्रतिष्ठित नाम आदरपूर्वक स्मरण किए जाते हैं—माधव प्रसाद गौतम, डॉ. गोपाल अश्क, डॉ. सीताराम शाह, रामप्रसाद शाह, डॉ. गोपाल ठाकुर, रामप्रसाद राय, दीप नारायण मिश्र, उमाशंकर द्विवेदी ‘दधीचि’ तथा डॉ. विश्वम्भर कुमार शर्मा। इन सभी साहित्यकारों ने अपनी सृजनशीलता और साहित्य-साधना से भोजपुरी भाषा को समृद्ध किया है। इसी परंपरा में डॉ. विजय किशोर पाण्डेय का नाम एक विशिष्ट और सम्मानित साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित है।

डॉ. विजय किशोर पाण्डेय ने अपने लेखन की दिशा, विषय-वैविध्य तथा विशेष रूप से सनातन धर्म के महत्त्वपूर्ण ग्रंथों के भोजपुरी रूपांतरण के माध्यम से अपनी अलग पहचान निर्मित की है। भोजपुरी साहित्य में धार्मिक एवं सांस्कृतिक ग्रंथों का अनुवाद केवल भाषिक कार्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है। इस क्षेत्र में उन्होंने जिस गंभीरता, भाषिक अनुशासन और सांस्कृतिक संवेदना का परिचय दिया है, वह उन्हें समकालीन नेपाली भोजपुरी साहित्यकारों में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। नेपाल और भारत के भोजपुरी साहित्यिक समाज में उनका नाम समान आदर के साथ लिया जाता है।

नेपाल के मधेश प्रदेश के बारा जनपद स्थित फेटा गाउँपालिका–3 के निवासी डॉ. विजय किशोर पाण्डेय का जन्म 6 जून 1959 को हुआ। उनके पिता स्वर्गीय गौरीशंकर पाण्डेय तथा माता स्वर्गीय शांति देवी पाण्डेय थीं। वे प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, इतिहासकार, भोजपुरी साहित्यकार तथा समाजसेवी हैं। त्रिभुवन विश्वविद्यालय से शिक्षा शास्त्र (एम.एड.) तथा इतिहास में एम.ए. की उपाधियाँ प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने लगभग तीन दशकों तक अध्यापन किया। इस अवधि में शिक्षा, इतिहास, भाषा और समाज के विविध आयामों में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। साहित्य-सृजन की उनकी यात्रा आज भी निरंतर सक्रिय है।

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उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘सिम्रौनगढ़ के इतिहास’ (भोजपुरी), ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ (भोजपुरी), ‘हमर भोजपुरी’ (कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक), ‘सिम्रौनगढ़को इतिहास’ (नेपाली), ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ (भोजपुरी), ‘गरुड़ पुराण’ (भोजपुरी) तथा ‘सत्यनारायण व्रत कथा’ (भोजपुरी) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों में इतिहास-बोध, सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक संवेदनशीलता और भोजपुरी भाषा के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

भाषा, साहित्य, इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें नेपाल सरकार के प्रादेशिक प्रतिभा पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। मधेश प्रज्ञा प्रतिष्ठान, नेपाल भोजपुरी प्रतिष्ठान, अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी साहित्य विकास मंच (कोलकाता), विश्व भोजपुरी सम्मेलन तथा अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं ने समय-समय पर उनकी साहित्य-साधना का सम्मान किया है।

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डॉ. विजय किशोर पाण्डेय की पहचान केवल साहित्यकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में भी स्थापित है। वे वर्तमान में नेपाली भोजपुरी फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं तथा अनेक साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। इनमें अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के आजीवन सदस्य, नागरिक आवाज पत्रिका, काठमांडू के आजीवन सदस्य, नेपाल ब्राह्मण समाज, बारा के आजीवन सदस्य, नेपाल पांडे समाज, काठमांडू के आजीवन सदस्य, नवप्रज्ञान त्रैमासिक पत्रिका, काठमांडू के वार्षिक सदस्य, नेपाल–भोजपुरी साहित्य विकास मंच, कोलकाता (भारत) के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक, भोजपुरी शोध संस्थान, कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) के अंतरराष्ट्रीय सह-निदेशक तथा भोजपुरी फाउंडेशन, राँची (झारखंड) और मगध फाउंडेशन, पटना (बिहार) से उनका सक्रिय जुड़ाव उल्लेखनीय है। इन संस्थाओं में उन्होंने अपने नेतृत्व, संगठनात्मक क्षमता और साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

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डॉ. विजय किशोर पाण्डेय उन विरल साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने शिक्षा, इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म को भोजपुरी भाषा के माध्यम से व्यापक समाज तक पहुँचाने का सतत प्रयास किया है। विशेष रूप से सनातन धर्म के महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का भोजपुरी रूपांतरण उनके साहित्यिक अवदान को विशिष्ट आयाम प्रदान करता है। उनकी बहुआयामी साहित्य-साधना, शोधपरक दृष्टि और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता नेपाल ही नहीं, समूचे भोजपुरी जगत के लिए प्रेरणा का विषय है। निस्संदेह, उनका योगदान भोजपुरी साहित्य के इतिहास में भारत और नेपाल में स्थायी महत्त्व रखता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा, मुजफ्फरपुर, बिहार

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