Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय उस लोकसाधक का, जिसने भोजपुरी लोकगीतों को केवल गायन की परंपरा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति, लोकजीवन और सामाजिक स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज बनाकर देश-दुनिया तक पहुंचाया। डॉ. राकेश श्रीवास्तव भोजपुरी लोकसंगीत के ऐसे प्रतिनिधि कलाकार हैं, जिन्होंने चार दशकों से अधिक समय तक अपनी साधना, शोध, प्रशिक्षण और सांस्कृतिक नेतृत्व के माध्यम से भोजपुरी लोकसंस्कृति को नई पहचान दिलाई।
वे केवल एक लोकगायक नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति के संरक्षक, प्रशिक्षक, शोधपरक चिंतक और भोजपुरी भाषा के सम्मान के लिए निरंतर सक्रिय सांस्कृतिक योद्धा हैं। उनके व्यक्तित्व में कलाकार की संवेदना, शोधकर्ता की गंभीरता और समाजसेवी की प्रतिबद्धता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
लोकधुनों के बीच पला-बढ़ा एक सांस्कृतिक साधक
27 नवंबर 1961 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे डॉ. राकेश श्रीवास्तव को लोकसंगीत की विरासत अपनी माता श्रीमती मैनावती देवी श्रीवास्तव से मिली, जो स्वयं भोजपुरी की प्रसिद्ध लोकगायिका थीं। घर का वातावरण लोकगीतों, संस्कार गीतों और पारंपरिक संगीत से हमेशा सराबोर रहता था। सोहर, कजरी, चैता, निर्गुण, देवी गीत और विवाह गीतों की मधुर स्वर लहरियों ने बचपन से ही उनके मन में लोकसंगीत के प्रति गहरा अनुराग पैदा किया।
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यही कारण है कि उन्होंने लोकसंगीत को केवल एक कला नहीं माना, बल्कि अपनी संस्कृति और समाज की आत्मा के रूप में स्वीकार किया। बचपन में मिले ये संस्कार आगे चलकर उनके जीवन की सबसे बड़ी साधना बन गए।

चार दशक की लोकसंगीत साधना
डॉ. राकेश श्रीवास्तव आज आकाशवाणी के ए-ग्रेड लोकगायक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। पिछले चार दशकों से अधिक समय से वे भारतीय लोकसंगीत की साधना में निरंतर सक्रिय हैं। उनकी प्रस्तुतियों में भोजपुरी लोकजीवन की सहजता, भारतीय संस्कृति की गरिमा और शास्त्रीय संगीत की अनुशासित छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
उन्होंने देश के अनेक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से लाखों श्रोताओं का मन जीता। उनके गायन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे लोकगीतों को केवल प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों को भी जीवंत बना देते हैं।
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भोजपुरी लोकगीतों के संरक्षण का आजीवन अभियान
डॉ. राकेश श्रीवास्तव का मानना है कि लोकगीत किसी भी समाज की सामूहिक स्मृति होते हैं। इनमें केवल संगीत नहीं, बल्कि पीढ़ियों का अनुभव, जीवन-दर्शन, संस्कार और सामाजिक इतिहास सुरक्षित रहता है। यही सोच उन्हें अन्य कलाकारों से अलग पहचान देती है।
उन्होंने कजरी, सोहर, चैता, बिरहा, निर्गुण, देवी गीत और विवाह संस्कार गीतों जैसी पारंपरिक विधाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके प्रयासों से अनेक लोकधुनें नई पीढ़ी तक पहुंच सकी हैं।
सात समंदर पार गूंजी भोजपुरी की मिठास
डॉ. राकेश श्रीवास्तव ने भारत तक ही अपनी सांस्कृतिक यात्रा सीमित नहीं रखी। वर्ष 2004 से उन्होंने थाईलैंड, सिंगापुर, ओमान, मॉरीशस और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अनेक देशों में भोजपुरी लोकसंगीत की प्रभावशाली प्रस्तुतियां दी हैं।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने प्रवासी भारतीयों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। विदेशों में बसे भोजपुरी समाज ने उनके गीतों में अपने गांव, अपनी मिट्टी और अपनी परंपराओं की अनुभूति की। यही कारण है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भोजपुरी लोकसंस्कृति के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दूत माने जाते हैं।
ICCR के आमंत्रण पर अमेरिका में विशेष प्रस्तुति
वर्ष 2023 में भारत सरकार की भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के आमंत्रण पर डॉ. राकेश श्रीवास्तव ने अमेरिका के डेलास और ह्यूस्टन में भोजपुरी लोकगायन की शानदार प्रस्तुतियां दीं।
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इन आयोजनों में उनके गीतों को भारतीय समुदाय के साथ-साथ विदेशी श्रोताओं ने भी खूब सराहा। यह कार्यक्रम केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं था, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति और भोजपुरी भाषा की वैश्विक प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण अवसर भी था।
शोधपरक व्याख्यान से प्रभावित हुआ मॉरीशस
वर्ष 2024 में मॉरीशस में आयोजित अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी महोत्सव में डॉ. राकेश श्रीवास्तव ने ‘भोजपुरी लोकगीतों की परंपरा, सांस्कृतिक महत्ता और संरक्षण’ विषय पर व्याख्यान दिया।
उनका व्याख्यान शोधपरक दृष्टि, ऐतिहासिक संदर्भों और सांस्कृतिक गहराई से भरपूर था। उन्होंने बताया कि लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति के सबसे विश्वसनीय स्रोत होते हैं। महोत्सव में उपस्थित विद्वानों और श्रोताओं ने उनके विचारों की भरपूर सराहना की।
नई पीढ़ी को लोकसंस्कृति से जोड़ने का मिशन
डॉ. राकेश श्रीवास्तव का मानना है कि यदि लोकसंस्कृति को जीवित रखना है, तो युवाओं को उससे जोड़ना होगा। इसी उद्देश्य से उन्होंने समय-समय पर अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन किया है।
जुलाई 2026 में संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के सहयोग से शारदा संगीतालय द्वारा आयोजित दस दिवसीय पारंपरिक लोकगीत कार्यशाला का उन्होंने सफल संचालन किया। इस कार्यशाला में लगभग 58 प्रतिभागियों ने पारंपरिक भोजपुरी लोकगीतों का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
यह कार्यशाला केवल संगीत सीखने का कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि लोकसंस्कृति के संरक्षण का एक प्रभावशाली अभियान साबित हुई। इससे नई पीढ़ी में लोकधरोहर के प्रति नई जागरूकता विकसित हुई।
संस्कृति मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति में महत्वपूर्ण भूमिका
डॉ. राकेश श्रीवास्तव वर्ष 2019-2020 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की एक्सपर्ट कमेटी के सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने लोककलाओं, लोकसंगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी विशेषज्ञ राय दी।
उनकी सहभागिता यह दर्शाती है कि वे केवल मंचीय कलाकार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक नीति और लोकधरोहर संरक्षण से जुड़े गंभीर विचारक भी हैं।
भोजपुरी भाषा के सम्मान के लिए निरंतर सक्रिय
डॉ. राकेश श्रीवास्तव वर्तमान में भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BHAI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वे भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

वे मानते हैं कि भोजपुरी केवल करोड़ों लोगों की मातृभाषा ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। इसलिए इसका संवैधानिक सम्मान केवल भाषा का नहीं, बल्कि करोड़ों भोजपुरीभाषियों की सांस्कृतिक पहचान का सम्मान होगा।
सम्मानों से अलंकृत सांस्कृतिक यात्रा
भोजपुरी लोकसंगीत और भारतीय लोकसंस्कृति के संरक्षण में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।

ये सम्मान उनके व्यक्तिगत योगदान की पहचान होने के साथ-साथ भोजपुरी लोकसंस्कृति की बढ़ती प्रतिष्ठा के भी प्रतीक हैं। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया है कि सच्ची साधना का सम्मान समय अवश्य करता है।
लोकगीतों को बनाया सांस्कृतिक चेतना का माध्यम
डॉ. राकेश श्रीवास्तव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने लोकगीतों को केवल मंचीय मनोरंजन नहीं बनने दिया। उन्होंने लोकगीतों को सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक संस्कारों के संरक्षण का माध्यम बनाया।
उनके लिए लोकसंगीत केवल कला नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक शक्ति है। वे अपने प्रत्येक कार्यक्रम में लोकगीतों के अर्थ, उनके सामाजिक महत्व और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डालते हैं, जिससे श्रोताओं का लोकसंस्कृति से आत्मीय जुड़ाव बनता है।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
डॉ. राकेश श्रीवास्तव को ‘भोजपुरी धुरंधर’ इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने स्वर, अपने शोध, अपने प्रशिक्षण और अपने सांस्कृतिक नेतृत्व से भोजपुरी लोकसंगीत को गांव की चौपाल से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है। उन्होंने लोकगीतों को केवल परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवित विरासत के रूप में स्थापित करने का निरंतर प्रयास किया है।
चार दशक से अधिक समय की उनकी साधना, देश-विदेश में भोजपुरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व, नई पीढ़ी को लोकसंगीत से जोड़ने का अभियान, संस्कृति मंत्रालय में विशेषज्ञ के रूप में योगदान और भोजपुरी भाषा के संवैधानिक सम्मान के लिए उनका सतत संघर्ष उन्हें समकालीन भोजपुरी लोकसंस्कृति का एक विशिष्ट पुरोधा बनाता है।
भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. राकेश श्रीवास्तव उस सांस्कृतिक पुरुष के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने अपने स्वरों में भोजपुरी की मिट्टी की सोंधी महक, भारतीय लोकजीवन की आत्मा और सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर को संजोकर पूरी दुनिया तक पहुंचाया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब साधना संस्कृति से जुड़ती है, तो वह केवल कला नहीं रहती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और विरासत बन जाती है।

