समीक्षक : डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा
भोजपुरी साहित्य भारतीय लोकजीवन की सांस्कृतिक स्मृतियों, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त साहित्य है। इसकी रचनात्मक परंपरा में गाँव केवल निवास-स्थल नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, सामूहिकता, श्रम-संस्कृति और आत्मीय संबंधों का केंद्र रहा है। समकालीन समय में, जब ग्रामीण जीवन तीव्र सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से गुजर रहा है, तब ऐसे साहित्य की आवश्यकता और बढ़ जाती है, जो इन परिवर्तनों को संवेदनात्मक और आलोचनात्मक—दोनों स्तरों पर अभिव्यक्त कर सके। राम बहादुर राय का भोजपुरी काव्य-संग्रह ‘नेह के थुन्हीं-टाटी हऽ गाँव’ इसी आवश्यकता की पूर्ति करता हुआ दिखाई देता है। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि लोकजीवन, लोकसंस्कृति, बदलते सामाजिक मूल्यों और मानवीय संबंधों के क्षरण का एक संवेदनशील काव्य-दस्तावेज है।
संग्रह का शीर्षक अपनी सांकेतिकता के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करता है। ‘नेह के थुन्हीं-टाटी’ केवल ग्रामीण जीवन का एक दृश्य नहीं, बल्कि पूरे संग्रह का केंद्रीय रूपक है। यहाँ ‘नेह’ सामाजिक संबंधों की ऊष्मा का प्रतीक है और ‘थुन्हीं-टाटी’ उस संरचना का, जिसके सहारे गाँव की आत्मा जीवित रहती है। कवि का आशय स्पष्ट है कि गाँव ईंट-पत्थर का नाम नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सहयोग और सांस्कृतिक मूल्यों की जीवित परंपरा है। शीर्षक ही पुस्तक की वैचारिक दिशा निर्धारित कर देता है और पाठक को संग्रह के मूल भावलोक में प्रवेश करा देता है।
कथ्य की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत व्यापक है। इसमें गाँव, किसान, श्रम, प्रकृति, परिवार, माँ, बेटी, प्रेम, विरह, सामाजिक विषमता, भाषा-संरक्षण, सांस्कृतिक अस्मिता और बदलते ग्रामीण परिवेश जैसे अनेक विषय समाहित हैं। कवि गाँव के अतीत का केवल भावुक स्मरण नहीं करता, बल्कि वर्तमान की विडंबनाओं को भी उतनी ही गंभीरता से सामने लाता है। पलायन, टूटते पारिवारिक संबंध, बदलती जीवन-शैली और घटती सामाजिक आत्मीयता कवि की चिंता के प्रमुख विषय हैं। यही कारण है कि यह संग्रह अतीत का महिमामंडन नहीं करता, बल्कि वर्तमान की समीक्षा भी करता है।
राम बहादुर राय की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लोकानुभूति है। वे गाँव का चित्र बाहर से नहीं बनाते, बल्कि उसी जीवन के भीतर से बोलते हैं। खेत, खलिहान, मेड़, बरगद, पोखरा, पगडंडी, चिरई, माटी, आँगन और चौपाल उनके यहाँ केवल दृश्य नहीं हैं, बल्कि सामाजिक स्मृतियों और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएँ कृत्रिम न लगकर जीवन की सहज अभिव्यक्ति प्रतीत होती हैं। कवि लोकजीवन को आदर्शलोक बनाकर प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उसकी अच्छाइयों और विडंबनाओं—दोनों को समान ईमानदारी से चित्रित करते हैं।
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शिल्प की दृष्टि से संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सहजता और संप्रेषणीयता है। कवि ने लोकगीतों की लय, संवादात्मक शैली और लोकप्रचलित मुहावरों का प्रभावपूर्ण प्रयोग किया है। उनकी कविताओं में भाषिक चमत्कार की अपेक्षा अनुभूति की सच्चाई अधिक महत्त्वपूर्ण है। यही कारण है कि अनेक रचनाएँ पढ़ते समय ऐसा लगता है, मानो किसी लोकगायक की स्वर-लहरियाँ सुनाई दे रही हों। बिंब और प्रतीक भी लोकजीवन से ग्रहण किए गए हैं। खेत, माटी, पेड़, वर्षा, नदी, चूल्हा और आँगन जैसे बिंब कविता को दृश्यात्मक और आत्मीय—दोनों बनाते हैं।
कवि का भावलोक अत्यंत व्यापक है। प्रेम उनकी कविता में केवल स्त्री-पुरुष संबंध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मातृभूमि, गाँव, भाषा और संस्कृति के प्रति अनुराग का भी रूप ग्रहण करता है। विरह भी केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से दूर होते समाज का विरह बन जाता है। यही कारण है कि उनकी प्रेम-कविताएँ भी सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। माँ, बेटी, किसान और श्रमिक जीवन से जुड़ी कविताएँ संग्रह को मानवीय ऊँचाई प्रदान करती हैं।
भाषा इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। भोजपुरी की सहजता, आत्मीयता और लोकस्वर को कवि ने पूरी गरिमा के साथ प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा में कृत्रिमता नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक प्रवाह है। सामान्य शब्दों में गहरे भाव व्यक्त करना उनकी रचनात्मक शक्ति है। लोकभाषा के मुहावरों और ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग कविता को जीवंत बनाता है। यही कारण है कि यह संग्रह विद्वानों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से ग्राह्य बन जाता है।
कवि ‘उड़ चलऽ खोतवा में चिरइया हो’ कविता के माध्यम से मानव की राक्षसी प्रवृत्ति से बच्चियों को सचेत करते हैं, वहीं ‘लुटि लिहलस सहरिया हमार गाँव’ में शहर और गाँव की बढ़ती दूरी पर गंभीर संदेश देने में सक्षम दिखाई देते हैं। ‘रहिया स्नेहिया के छोट हो रहल बा’ के माध्यम से वे गाँव के टूटते नातों पर चोट करते हैं। वहीं, बाहर कमाने गए पिता की चिंता ‘रोज पूछस बाबूजी’ कविता में मिलती है।
किन्तु संतुलित समीक्षा की दृष्टि से भाषा और शिल्प की कुछ सीमाओं का उल्लेख आवश्यक है। कुछ स्थानों पर मानक भोजपुरी और क्षेत्रीय प्रयोगों का मिश्रण दिखाई देता है, जिससे भाषिक एकरूपता कुछ प्रभावित होती है। यह दोष गंभीर नहीं है, परंतु संपादकीय स्तर पर थोड़ा और ध्यान दिया जाता, तो भाषा और अधिक परिमार्जित रूप में सामने आती।
इसी प्रकार, कुछ कविताओं में भाव और शब्दों की पुनरावृत्ति अपेक्षाकृत अधिक है। उदाहरण के लिए, शीर्षक कविता ‘नेह के थुन्हीं-टाटी हऽ गाँव’ में गाँव के प्रति आत्मीयता अत्यंत प्रभावशाली है, किंतु कुछ पदों में एक ही भाव अलग-अलग शब्दों में दोहराया गया है। यदि वहाँ भाषिक मितव्ययिता अपनाई जाती, तो कविता का प्रभाव और अधिक तीव्र हो सकता था। इसी प्रकार, भोजपुरी भाषा की पीड़ा पर आधारित कविता में कवि की संवेदना अत्यंत प्रखर है, किंतु कहीं-कहीं कथ्य इतना प्रत्यक्ष हो जाता है कि कविता की अपेक्षा वक्तव्य अधिक प्रतीत होने लगता है। जहाँ बिंब और प्रतीक पर्याप्त थे, वहाँ सीधा कथन कविता की कलात्मकता को थोड़ा सीमित करता है।
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छंद और लय की दृष्टि से अधिकांश रचनाएँ लोकगीतात्मक प्रवाह बनाए रखती हैं, किंतु कुछ कविताओं में पंक्तियों की लंबाई और लय का संतुलन पूरी तरह एक-सा नहीं रह पाता। पाठ के समय यह असंतुलन अधिक अनुभव होता है। यद्यपि यह संग्रह की मूल शक्ति को प्रभावित नहीं करता, फिर भी भविष्य के संस्करण में इस दिशा में और परिष्कार की संभावना बनी रहती है।
भावपक्ष संग्रह का सर्वाधिक प्रभावशाली पक्ष है। कवि की संवेदना बनावटी नहीं, बल्कि अनुभव से उपजी हुई है। सामाजिक विघटन, भाषा-संकट, सांस्कृतिक क्षरण और बदलते मानवीय संबंधों की पीड़ा पाठक को भीतर तक स्पर्श करती है। दूसरी ओर, कलापक्ष अपेक्षाकृत सरल है। कवि अलंकारिक चमत्कार की अपेक्षा अनुभूति की प्रामाणिकता पर अधिक विश्वास करते हैं। यह उनकी शक्ति भी है और कुछ स्थानों पर सीमा भी, क्योंकि कहीं-कहीं अधिक कलात्मक घनत्व की अपेक्षा बनी रहती है।
संग्रह की संरचना सामान्यतः संतुलित है। कविताएँ विषयगत विविधता के साथ आगे बढ़ती हैं और पाठक को लोकजीवन के विभिन्न आयामों से क्रमशः परिचित कराती हैं। यद्यपि, यदि उन्हें विषयानुसार अलग-अलग खंडों में संयोजित किया जाता, तो संग्रह का विन्यास और अधिक प्रभावशाली बन सकता था।
मौलिकता की दृष्टि से राम बहादुर राय की विशेषता यह है कि वे गाँव को केवल स्मृतिलोक नहीं बनाते, बल्कि वर्तमान सामाजिक संकट के संदर्भ में देखते हैं। उनकी कविता अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करती है। वे परंपरा के कवि होते हुए भी वर्तमान से मुँह नहीं मोड़ते। यही उनकी रचनात्मक पहचान है।
सामाजिक दृष्टि से भी यह संग्रह उल्लेखनीय है। कवि समाज के भीतर व्याप्त विसंगतियों, भाषा और संस्कृति के नाम पर होने वाले दिखावे, बदलते पारिवारिक संबंधों तथा लोकमूल्यों के क्षरण पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। उनकी कविता किसी वैचारिक कट्टरता का समर्थन नहीं करती, बल्कि मानवीय संतुलन और सांस्कृतिक संरक्षण का आग्रह करती है। यह दृष्टि संग्रह को केवल भावात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक भी बनाती है।
पाठकीय प्रभाव की दृष्टि से यह संग्रह सफल कहा जा सकता है। इसकी भाषा सहज है, कथ्य जीवन के निकट है और संवेदना सच्ची है। अनेक कविताएँ पढ़ने के बाद भी स्मृति में बनी रहती हैं। यह संग्रह पाठक को अपने गाँव, अपनी भाषा और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति पुनर्विचार के लिए प्रेरित करता है। यही किसी भी सार्थक साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
समकालीन भोजपुरी साहित्य के संदर्भ में यह कृति विशेष महत्त्व रखती है। आज, जब भोजपुरी कविता अनेक दिशाओं में विकसित हो रही है, तब यह संग्रह लोकजीवन की जड़ों से जुड़े साहित्य का प्रतिनिधि रूप बनकर सामने आता है। यह न तो केवल अतीत का गुणगान करता है और न ही आधुनिकता का अंधानुकरण। दोनों के बीच संतुलित दृष्टि अपनाने के कारण इसकी साहित्यिक प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।
समग्रतः ‘नेह के थुन्हीं-टाटी हऽ गाँव’ भोजपुरी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण कृति है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति लोकजीवन की प्रामाणिक अभिव्यक्ति, सहज भाषा, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदना है। दूसरी ओर, भावों की पुनरावृत्ति, कहीं-कहीं कथ्य का अत्यधिक प्रत्यक्ष हो जाना तथा शिल्पगत कसावट की अपेक्षा इसकी सीमाएँ हैं। किंतु ये सीमाएँ इसकी मूल रचनात्मक उपलब्धि को कम नहीं करतीं। यह संग्रह भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक स्मृति, ग्रामीण जीवन की आत्मा और मानवीय मूल्यों के संरक्षण का गंभीर साहित्यिक प्रयास है। इसी कारण यह समकालीन भोजपुरी कविता में एक विचारोत्तेजक, पठनीय और महत्त्वपूर्ण काव्य-संग्रह के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करता है।
यह पुस्तक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, दिल्ली द्वारा Rs. 299 मूल्य पर प्रकाशित है तथा अमेज़न पर भी उपलब्ध है। इसके प्रकाशन में कहीं-कहीं मुद्रण-त्रुटियाँ भी दिखाई देती हैं, जिन्हें द्वितीय संस्करण में निश्चित रूप से दूर किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, यह काव्य-संग्रह भोजपुरी साहित्य की लोकधर्मी परंपरा को समृद्ध करने वाली एक महत्त्वपूर्ण कृति है, जो पाठकों और समीक्षकों दोनों का ध्यान आकर्षित करने की क्षमता रखती है।

