Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय उस साहित्य साधक का, जिन्होंने भोजपुरी भाषा को केवल लोकगीतों और लोकसंस्कृति तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम, राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों और साहित्यिक मंचों तक पहुंचाने का ऐतिहासिक कार्य किया। पश्चिमी चंपारण के बेतिया में जन्मे डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ भोजपुरी और हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी साहित्यिक यात्रा पांच दशकों से अधिक समय से भाषा की सेवा को समर्पित रही है। कवि, कथाकार, नाटककार, संपादक, पाठ्यक्रम लेखक और सांस्कृतिक कर्मी के रूप में उन्होंने भोजपुरी साहित्य को नई वैचारिक ऊंचाई प्रदान की है। उनकी कृतियां ‘जिनगी पहाड़ हो गईल’, ‘अंजुरी में अँजोर’, एकलव्य, ‘लगाव’, ‘अगरासन’, ‘तरेगन के मेला’ और बहुजन के अनमोल रतन आज भोजपुरी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती हैं।
भोजपुरी साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने अपने लेखन के साथ-साथ संस्थागत स्तर पर भी भाषा के विकास के लिए निरंतर काम किया। डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ उन्हीं विरल साहित्यकारों में शामिल हैं। उन्होंने भोजपुरी को गांव की चौपाल से निकालकर विश्वविद्यालयों की कक्षाओं तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
बेतिया में जन्म, साहित्यिक चेतना से बना जीवन का उद्देश्य
पश्चिमी चंपारण की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरती बेतिया में जन्मे डॉ. मस्ताना ने प्रारंभ से ही साहित्य को अपना जीवन-धर्म बना लिया। उन्होंने एम.ए. (त्रय) तथा हिंदी विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। भारतीय भाषाओं और लोकसाहित्य के प्रति उनकी गहरी समझ ने उन्हें भोजपुरी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षरों में शामिल कर दिया।
महात्मा गांधी की कर्मभूमि चंपारण की सामाजिक चेतना और लोकजीवन की विविधता उनके साहित्य में सहज रूप से दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में भोजपुरी समाज का संघर्ष, संवेदना, संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन का जीवंत चित्रण मिलता है।
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भोजपुरी को दिया साहित्यिक और अकादमिक सम्मान
भोजपुरी भाषा लंबे समय तक लोकगीतों और मौखिक परंपराओं की भाषा के रूप में पहचानी जाती रही है। डॉ. मस्ताना ने अपने साहित्य के माध्यम से यह स्थापित किया कि भोजपुरी गंभीर साहित्य, शोध और अकादमिक अध्ययन की भी समर्थ भाषा है। उनकी चर्चित कृति ‘जिनगी पहाड़ हो गईल’ को जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा और वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के एम.ए. (भोजपुरी) पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। वहीं ‘एकलव्य’ को बी.ए. ऑनर्स (भोजपुरी) के पाठ्यक्रम के लिए चयनित किया गया। यह उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत साहित्यिक योगदान का सम्मान है, बल्कि भोजपुरी भाषा की अकादमिक स्वीकृति का भी महत्वपूर्ण प्रमाण है।
इग्नू के भोजपुरी पाठ्यक्रम से जुड़ा नाम
डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू), नई दिल्ली के भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स के लिए पाठ्यक्रम लेखक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पुस्तक ‘लगाव’ को भी इग्नू के भोजपुरी पाठ्यक्रम के लिए चयनित किया गया।
भोजपुरी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर शैक्षणिक पहचान दिलाने की दिशा में उनका यह योगदान ऐतिहासिक माना जाता है। आज देश-विदेश के विद्यार्थी इग्नू के माध्यम से भोजपुरी का अध्ययन कर रहे हैं, जिसमें डॉ. मस्ताना के साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भोजपुरी कविता को दिया सामाजिक चेतना का स्वर
डॉ. मस्ताना की कविताएं लोकजीवन की सहज अभिव्यक्ति भर नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक सरोकारों की सशक्त आवाज भी हैं। उनकी काव्य कृतियों ‘जिनगी पहाड़ हो गईल’ और ‘अंजुरी में अँजोर’ में संघर्षरत मनुष्य की पीड़ा, उम्मीद और सामाजिक यथार्थ की गहरी अनुभूति दिखाई देती है।



उनकी कविता में गांव का जीवन है, किसान की पीड़ा है, लोकसंस्कृति की खुशबू है और बदलते समाज की चिंताएं भी हैं। वे भोजपुरी कविता को आधुनिक चेतना और वैचारिक गहराई प्रदान करने वाले साहित्यकारों में अग्रणी माने जाते हैं।
कहानी और लघुकथा में लोकजीवन की संवेदनाएं
डॉ. मस्ताना ने भोजपुरी गद्य साहित्य को भी नई दिशा दी। उनकी लघुकथा संग्रह ‘लगाव’ और कहानी संग्रह ‘अगरासन’ भोजपुरी समाज के मानवीय रिश्तों, सामाजिक परिवर्तनों और लोकजीवन की संवेदनाओं का सशक्त दस्तावेज हैं।
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उनकी कहानियां केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठकों को अपने समाज और समय के प्रति संवेदनशील भी बनाती हैं। भोजपुरी गद्य साहित्य को समृद्ध करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

नाटक के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार
भोजपुरी नाटक संग्रह ‘तरेगन के मेला’ डॉ. मस्ताना की महत्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धियों में शामिल है। इस कृति के माध्यम से उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, सामाजिक असमानता और कुरीतियों पर तीखा प्रहार किया है। उनके नाटक मनोरंजन के साथ सामाजिक चेतना जगाने का कार्य करते हैं। यही कारण है कि उनकी साहित्यिक कृतियां आज भी प्रासंगिक मानी जाती हैं।
संपादन के माध्यम से भोजपुरी की सेवा
डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ लंबे समय तक भोजपुरी पत्रकारिता और साहित्यिक संपादन से जुड़े रहे हैं। वे दिल्ली से प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्रिका ‘भोजपुरी जिनगी’ के प्रधान संपादक रहे हैं। इसके अलावा ‘हेल्लो भोजपुरी’, ‘भोजपुरिया अमन’ और ‘डिफेंडर’ जैसी पत्रिकाओं के संपादकीय मंडल से भी जुड़े रहे हैं। हिंदी साप्ताहिक ‘प्रवासी शक्ति’ में उनके नियमित स्तंभों ने प्रवासी भोजपुरी समाज और भाषा के प्रश्नों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का काम किया। डॉ. मस्ताना के साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया है। उन्हें बिहार सरकार द्वारा बिहार गौरव सम्मान, भोजपुरी अकादमी सम्मान तथा चंपारण साहित्य विभूति सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।
सांस्कृतिक संस्थाओं में सक्रिय भूमिका
डॉ. मस्ताना केवल लेखक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संगठनकर्ता भी रहे हैं। वे राष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था ‘पुरवैया’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं संरक्षक रहे हैं। इसके अलावा इन्द्रप्रस्थ भोजपुरी परिषद, अखिल भारतीय भोजपुरी लेखक संघ तथा संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र से भी जुड़े रहे हैं। उनकी सक्रियता ने भोजपुरी भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार को संस्थागत आधार प्रदान किया है।
भोजपुरी अस्मिता के सशक्त हस्ताक्षर
डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ की साहित्यिक यात्रा यह साबित करती है कि यदि किसी भाषा के लिए साहित्यकार समर्पित होकर काम करें तो वह भाषा लोकभाषा से ज्ञानभाषा बनने का सफर तय कर सकती है।
उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भोजपुरी को साहित्यिक सम्मान दिलाया, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम तक पहुंचाया और नई पीढ़ी के लिए समृद्ध सांस्कृतिक विरासत तैयार की। उनकी लेखनी भोजपुरी समाज की आशा, संघर्ष और सांस्कृतिक स्वाभिमान की प्रतिनिधि है। बेतिया की धरती से निकला यह साहित्यिक प्रकाश आज भी भोजपुरी भाषा के भविष्य को आलोकित कर रहा है। डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ की रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती हैं कि अपनी मातृभाषा से प्रेम केवल भावनात्मक विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है। भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ उस साहित्यिक पुरोधा के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने भोजपुरी को लोक से लेकर विश्वविद्यालय तक सम्मान, पहचान और वैचारिक ऊंचाई दिलाने का आजीवन संकल्प निभाया है।
सम्मानों से अलंकृत साहित्यिक यात्रा
जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सम्मानित (1976)
बिहार विश्वविद्यालय द्वारा बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री के हाथों भोजपुरी लोकगीत गायन के लिए सम्मानित (1976)
ललित कला परिषद् द्वारा बिहार के मुख्यमंत्री के हाथों भोजपुरी लोकगीत गायन के लिए सम्मानित (1981)
नेहरू युवा केंद्र द्वारा सम्मानित (1983)
बिहार राजभाषा विभाग, भागलपुर द्वारा ‘पंडित हंस कुमार तिवारी’ नामित प्रशस्ति पत्र प्राप्त (1990)
अखिल भारतीय भोजपुरी भाषा सम्मेलन, देवघर द्वारा ‘रामेश्वर सिंह कश्यप सम्मान’ प्राप्त (1993)
भोजपुरी समाज, भागलपुर द्वारा ‘भोजपुरी रत्न’ की उपाधि से सम्मानित (1994)
नेपाल भोजपुरी साहित्य कला परिषद्, वीरगंज द्वारा सम्मानित (हिंदी वर्ष-2051)
नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू द्वारा सम्मान पत्र प्राप्त (हिंदी वर्ष-2052)
तलाश साहित्यिक संस्था, पूर्वी चंपारण द्वारा सम्मानित (1997)
अखिल भारतीय साधु समाज, नई दिल्ली द्वारा ‘महर्षि कबीर सम्मान’ से सम्मानित (2003)
सत्याग्रह शताब्दी समारोह द्वारा ‘डॉ. रामदेव त्रिपाठी सम्मान’ से सम्मानित (2007)
विश्व भोजपुरी सम्मेलन द्वारा भोजपुरी भाषा के शिखर सम्मान ‘भोजपुरी गौरव सम्मान’ से सम्मानित (2008)
अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना द्वारा ‘महेंद्र शास्त्री सम्मान’ प्राप्त (2009)
समाधानम् संस्था, नई दिल्ली द्वारा ‘भोजपुरी दिनकर सम्मान’ से सम्मानित (2010)
विश्व भोजपुरी सम्मेलन, नई दिल्ली द्वारा ‘पंडित गणेश चौबे सम्मान’ प्राप्त (2012)
बिहार सरकार द्वारा ‘बिहार गौरव सम्मान’ (2012 एवं 2013)
भोजपुरी अकादमी, बिहार सरकार द्वारा सम्मानित (2013)
जन मीडिया, नई दिल्ली द्वारा ‘भोजपुरी रत्न सम्मान’ से सम्मानित (2014)
चंपारण शताब्दी समारोह में केंद्रीय कृषि मंत्री श्री राधा मोहन सिंह द्वारा भोजपुरी साहित्य में योगदान के लिए ‘चंपारण साहित्य विभूति सम्मान’ से सम्मानित (2016)
डिफेंडर ऑफ फ्रीडम, नई दिल्ली द्वारा ‘साहित्य गौरव सम्मान’ से सम्मानित

