कनक किशोर
सरल व्यक्तित्व के स्वामी बड़का आ गंभीर बात के बड़ा सहज ढंग से एह तरे सामने रखेला कि ऊ अपना जइसन, अपना जोरे घटल घटना, अपना घर-परिवार के कहानी जइसन लागेला। बलभद्र के ‘झनकि बाजे हो’ छोट काया, बढ़िया कलेवर में एगो सुंदर कथेतर गद्य संग्रह हाले में आइल बा, जवना में उनुकर बारह गो रम्य रचना/ललित निबंध शामिल बा। हम ओह में से कुछ रचना के आत्मकथात्मक संस्मरण के श्रेणी में राखल चाहब, काहे कि संस्मरण के सामाजिक जामा पहिरा के नया रूप में राखल गइल बा।
बलभद्र खुद कहले बाड़न कि एह संग्रह में आपन भाषा में आपन बात, अपना गाँव-घर के बात, खेत-खरिहान के बात, लोग-बाग के, कोइल-काग के, पंडुक आ भुचेंगा के, नेह-नाता के, दुख-तकलीफ के, गावे-बजावे के, जूझे के बात रखल गइल बा। बात अपना समय के, अपना समाज के, आर्थिक हालात के, राजनीति के, लोक संस्कृति के बात रखल गइल बा।
बलभद्र गाँव के कवि, किसान के कवि, मजदूर के कवि, आम आदमी के कवि हवन। गाँव, घर, किसान, मजदूर, मेहरारू, माटी आ आम आदमी के दरद के नजदीक से देखले बाड़न—किताब के पन्ना में ना, बलुक गाँव के माटी में रचत-बसत। ऊ दरद गाँव से ले आइल लेवा जइसन उनुका साथे आजुओ जुड़ल बा। ओकर प्रमाण उनुकर साहित्य संसार बा, चाहे ऊ गीत, कविता भा कथेतर गद्य होखे। ‘झनकि बाजे हो’ के बारहो रचना ऊपर लिखल बातन के गवाही देत बा।
लेखक के सभ रचनन के भाषा के लय-ताल में गंवई सुगंध बसल बा। पाठक के ताल टूटे ना, एह तर्ज पर ऊ अपना से बन्हले रखेला आ कहीं ऊबे ना देला। अब हम बात कइल चाहब कुछ रचनन आ ओह में उठत पीर आ विमर्श पर।
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गाँव के आपन एगो ठेठ मिजाज होला। गंवई जीवन आ मनई के आपन रंग-रास होला। ऊ रंग-रास में पीरो छुपल रहेला। काल्हु तक गाँव में ई सब भरपूर रहे। समय के साथ गाँवो बदलल बा, तबहूँ आजुओ गाँव-घर, गोतिया-दयाद, खेत-बधार में गंवई गंध भेंट जाला आ मनवा पुरनका दिन के याद करत गाँव के माटी में खो जाला।
‘टभकल’ पीर के याद दिआवेला आ ‘टुभुकल’ गाभी मारे के, बोल बोले के, काँव-कीच करे के भाव जगावेला। दुनो अलग-अलग जगहा के चीज ह, बाकिर गंवई संस्कृति में दुनो एके जगहा भेंट जाला। लेखक ‘टभकल से टुभुकल ले’ में लइका होखला पर गाँव में होखे वाला एगो छोट आयोजन के माध्यम से ठेठ गंवई अंदाज में एह बात के बड़ा सुंदर ढंग से रखले बाड़न। एगो गर्भवती मेहरारू के पीर एह गीत के माध्यम से सामने रखल गइल बा।
डाँड़ मोरा बथेला लहालह,ओदर चिलिख मारे हो
ए महादेव! मरलो पँजरिया के पीर
तो धगड़िन बोलावहु हो।
ओहिजे लइकिन के मुँहे उठावल गीत समाज में बेयापत दहेज के बात उठा के सोचे पर मजबूर कर देता।
बाप माँगे रोपइया बेटा माँगे मोटरसाइकिल
मोटरसाइकिल करनवे लइकी लोग कुँआर परल बा।
ढोलक के ताल आ गीत-गवनई के बीच गूँजत हँसी-ठिठोली, बोलबाजी, ताक-झाँक आ काँव-कीच ‘टभकल से टुभुकल ले’ में देखत बनत बा, उहो खुला अंदाज में, बिना छोट-बड़ के भेदभाव के।
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‘बिरह से जिरह में’ लेखक आज के लइकिन के मनोदसा आ ओकरा भीतर खुला आकास के खोज में बइठल चिरई के बात रखले बाड़न। इहे नूं आज के स्त्री विमर्श ह। भोजपुरिया संस्कृति में पल-बढ़ रहल लइकिन काल्ह तक भले बिरह में जियत रहली स, बाकिर आज खुलके देहरी के बाहर आ जिरह करे के स्थिति में बाड़ी स। समाज में मरद के सोच आजुवो नइखे बदलल, बाकिर समय के माँग बा कि बदले के होई मरदो के आ समाजो के। रचना में उद्धृत एगो गीत देखीं।
तोर मन बसे कि ना रे सँवरका
मोर मन बसेला तोरा में
चाहे मराइब चाहे कटाइब
चाहे कसाइब बोरा में।
एह में एगो जूनून,एगो फैसला सुनात बा। संस्कार के देहरी पार क के बोलत एह आवाज में समाज में काल्हु के अनबोलता के बोल कह रहल बा हमनी खातिर कोइल,सावन, फागुन,बिरह के बात अब पीछे छूट गइल बा। एगो दूसर उद्धरित गीत
आग लेबे गइलीं सिरिस तर माई
जोगिया बजावे उहाँ बंसी सुन माई
बँसिया के धुनिया सोहावन लागे माई
अस मन करे हम जोगिए संगे जाई।
लइकी के एहिजा मन, ओकर पसंद, ओकर इच्छा लउकता। लइकी के भीतर कवनो द्वंद नइखे। भले समाज खातिर ओकर चाह चौंकावे वाला बा, बाकिर इहां संकेत बा कि ऊ अपना मन संगे रहे के चाहतिया। अपना मन के चाह आ दुख के भीतर दबा के राखे के नइखे चाहत। ऊ अब खुला आकाश खोजतिया, उड़ान भरे खातिर। ना सुनल जाई त जिरह करे खातिर तइयार बिया। रचनाकार बिरह के बात छोड़ि जिरह पर ध्यान देवे के वकालत रचना में करत नजर आवत बाड़न। इहे समय के मांग बा।
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“पिछिला एतवार के गइल रहीं बिहिया बाजारे। आग लागल बा सगरो बाजार में। दस कम सई रुपइया लेके। आँट ना आइल। कतनो हाय-हाय क के खटीं, कतनो पेट-गाँड़ जारीं, जाँत-खोंत के चलीं—आँट नइखे आवत।”
महँगाई पर एगो मजदूर के व्यथा लेखक ‘समय के साँचा में’ रखले बाड़न, जे खेतिहर मजदूर के दारुण दशा के अभिव्यक्त कर रहल बा। ओहिजे कार्यालय में व्याप्त घूसखोरी के बयान करत लिखत बाड़न—
“के पूछवइया बा? के सुनवइया बा? मिलत त बा बीस हजार रुपइया इंदिरा आवास के। केकरा से कहीं? कहाँ से पाईं हजार-डेढ़ हजार, जे घूस थमाईं? बिना दिहले त दुरदुरा देत बाड़न। एगो सवांगो बाड़न त उनका फुरसत नइखे। ब्लॉक के चक्कर काटीं कि मजूरी करीं।”
बातो सही बा, मजदूर आपन पेट भरे कि पेट काटि साहेब-सुबा के घूस देवे? ‘समय के साँचा में’ ऊ चाहियो के नइखे ढल पावत। ओकर पेट आ रोटी के सवाल के हल मिलो, तब त ऊ समय के सोचो।
साल में बारह महीना होला, बाकी फागुन, चइत आ सावन हटा देल जाय, त जिनिगी में कतना रंग-रास बाची, गंवई संस्कृति के सुगंध कतना बाची, ई केकरो से छुपल नइखे। ‘बाकी चइत के झकोर जनि माँगऽ’ में लेखक फागुन आ चइत के विविधता आ उल्लास से त परिचय करावत हीं बाड़न, साथ हीं फगुआ-चइता के लय-ताल, धुन, गाँव के रीति-नीति, खेत-बधार के हाल, गंवई जिनिगी के चाल, आपस के बात-विचार, किसान आ मजूर के मनोभाव आ किसान के दरद पर बड़ा खुल के आ बेबाकी से आपन बात रखले बाड़न, जे गंवई माटी के साँच ह। तनि लेखक के शब्द में किसान के पीर देखीं।
“जे देश-दुनिया के अन्न देला, आपन रंग में रंग देवे के कूबत राखेला, जे मौसम के मतलब बूझेला, एह सोगहग समाज के हालत आज ठीक नइखे। एह समाज के साथे क्रूर मजाक कइल जा रहल बा। ई बेवस्था एह समाज के हित के अनदेखी कर रहल बिया। आपन उपेक्षा कबले सही? ई हिस्सा खड़ा हो रहल बा। आपन हक-अधिकार खातिर आवाज उठा रहल बा। फागुन के रंग आ चइत के झकोर बेकार ना जाई। धूर से गुलाब तक के हउवे ई सफर, गावे से ललकार तक के।”
सुख आ दुख साथे चलेला, आगे-पीछे। बाकी गाँव के माटी में रचल-बसल मनई के याराना पीर से अधिका बा। तवनो हार माने वाला जीव नइखे। फागुन के रंग आ चइत के झकोर से जिनिगी के रंगे-रचे के कोसिस से ऊ बाज नइखे आवत। एह रचना में एकर सजीव वर्णन मिलत बा।
ताल आ ताव के जुड़ाव जिनिगी के आधार ह। ताव चढ़बो करेला, उतरबो करेला, दियइबो करेला, खाइलो जाला आ ताव बूझलो जाला। ओसहीं ताल ठोकलो जाला, देलो जाला आ बूझहूँ के पड़ेला। ताल आ ताव समय से जुड़ल रहेला। ‘ताल छूटे ना’ में लेखक कहत बाड़न, “सहर होखे भा गाँव, एही ताव आ ताल पर साधारण आदमी के सँउसे जीवन नाचत रहेला।”
बातो सोरह आना साँच बा। सामाजिक विषमता आपसी खाई बढ़ावत जा रहल बा। समरसता के जगह समाज में फइलल विषमता के ओर नजर रखत लेखक कहत बाड़न कि, “धनवान धन जमा करे के उतजोग में होले आ किसान-मजूर आपन अकुलाहट में। जतने धनी बाबू लोग के धन बढ़ियाला, ओतने गरीब के अकुलाहट। अकुलाहट ओकर आपन पूँजी ह, जेकरा बूते ऊ बाबू-बबुआन, मालिक-मोख्तार लोग के औकात नापे के ओर बढ़ेला। जतने जुलुम बढ़ेला, मुक्ति के जरूरतो लोग ओही अनुपात में महसूस करेला।”
ई बात समाज के समझे के होखी आ समाज में बेयापत अकुलाहट के कम करे के पड़ी। सुख-दुख बाँटे के पड़ी। बदलत गाँव के तस्वीर देख लेखक के चिंता हो जात बा आ ऊ कहत बाड़न, “शहर के चमक गाँव के अपना गिरफ्त में ले लेले बा। शहर गाँव में आ रहल बा, शहरी जीवन-मूल्य गाँव में दखल जमा रहल बा।”
लेखक के चिंता वाजिब बा आ मन में डर बा कि एह तरह बढ़त शहरी दखलंदाजी कहीं गाँव के निगल मत जाय। लेखक सहर के मध्य आ नीचे तबका के लोगन आ प्रवासी के दरद के बड़ा सहज आ सुनर ढंग से एह रचना में रखले बाड़न। समाज में बढ़त दलाली आ घूसखोरी आज एगो स्थापित प्रक्रिया बन गइल बा, एह परो लेखक गंभीरता से बात करत नजर आवत बाड़न। बाकिर लेखक के भरोसा बा कि मेहनत के राग छिड़ी आ नयका तराना गूँजी, ताकि भइया ताल टूटे ना।
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‘अँटका में परल बसन्त’ में लेखक गाँव-घर, खेती-बारी, रीति-नीति के बदलत चाल संगे भागत बसन्त के रूप देखि, डिजिटल बसन्त के गाँवन में घुसत देख चिंतित नजर आ रहल बाड़े। आदमी के बदलत जीवन शैली में रूह-चूह बसन्त कहीं भेंटाइयो जाता, त मन उदास हो जाला। प्रकृति में बसन्त कम-बेसी हेर-फेर में लउक जाता, बाकी आदमी के बसन्त त अँटका में परल भागल जा रहल बा। कारण बा बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार आ तिकड़मबाजी के जबरदस्त मार। ई हम ना, रचनाकार कह रहल बाड़े, जे आदमी के माथ पर रखल समस्या के बोझा देख रहल बाड़े। माथ भारी रहेला, त कुछुवो नीक ना लागे आ रोकलो पर माथे हाथ चलिए जाला। बाहरी खाद-बीया से बधार हरियर-पियर लउकतो बा, त चिरई-चुरंग, मधुमाखी, कउवा आ कोइलर नदारद बाड़न। ई साफ बता रहल बा कि प्रकृतियो के बसन्त अँटका में परल जा रहल बा, बढ़ल जा रहल बा। लेखक के चिंता वाजिब बा, तबे त कह रहल बाड़े कि मॉल कल्चर पसर रहल बा। ई कल्चर हमनी के जीवन आ समाज में अन्हार बो रहल बा। मस्ती के नांव पर आत्महीनता, खोखलापन आ बजारू बसन्त पसारल जा रहल बा। आसावादी लेखक मन तबो साफ कह रहल बा कि बसन्त ठस्स ना होखे, मुई ना, भले रूप बदल ले। चलल-चलि आवत बसन्त के बूझ के बचावे के संदेश देत, एगो नया बसन्त के कामना करत बाड़े।
‘ना पहिले वाला धान, ना पहिले वाला किसान। बाकी एगो चीज आज ले ना बदलल—किसान आ मजूर के माली हालत। एह लोग के उपेक्षा के क्रम कबो ना टूटल। एह लोग के कष्ट के, एह लोग के पीर के ना तब कवनो ओर रहे, ना अब कवनो छोर बा।’ लेखक के ‘पीर हउवे जहँवा के पहचान’ में कहल बात के प्रमाण खोजे के जरूरत नइखे। जरूरत बा किसान-मजूर के काल्हु आ आज के जिनिगी पर नजर डाले के, उहो एसी चेंबर में बइठ के ना, बल्कि ओहनी के बीच रहिके, ओहनी के पीर देखिके। ‘किसान-मजूर के थाकल-थहराइल जिनगी एह शासन आ सरकार के सबसे बड़ उपहार बा। एह लोग के हर माँग के जवाब में लाठी-गोली। नीचे धरती, ऊपर आकास।’ ई बहुत कुछ कह जाता सत्ता के, बाकी के सुनवइया के बा? किसान-मजूर अपना पीर के छाती से साटि जियत बा आ आगहूँ जीहे के आस के हौंसला माटी के लाल में आजुओ जिन्दा बा।
‘झनकि बाजे हो धनि खेते-खेते चुरिया’ शीर्षक भले मन में रोमांस के लहर उठावत तन-मन रोमांचित कर देला, बाकी आरि से उतरते खेत में दरार देखि मन करूआ जाला। ओसहीं, रचना में घुसते धनि (मेहरारू) के पीर देखि मन करूआ जाता। एह करूआहट के दोष ओकनी के विधाता के दे जाला, बाकी दोषी समाज बा, जेकरा पर पुरुष वर्चस्व आजुओ कायम बा।
मेहरारून के दशा पर लेखक लिख रहल बाड़न— ‘औरतन के त कतहूँ आ कबहूँ चैन ना। ना दिने, ना राते। खेत-खरिहान से फुरसत मिलल त चूल्हा-चउका आ साथे-साथे लरिका-फरिका। ढेंका से उतरे त जाँत धरे।’
रूप भले बदल गइल होखे, औरतन के दशा आजुओ कम-बेसी इहे बा। औरतन के श्रमगीत, समय के साथ बदलत सोच, प्रवासी पति से वियोग-संजोग के बड़ा सुन्दर ढंग से वर्णन मिलेला, जेकरा में दुख-सुख, मेहनत-मशक्कत, हँसी-मजाक आ नोंक-झोंक सभे एके जगह देखल जा सकेला। ‘एह जमीन के दरद के मरम जब तक ना बूझल जाई, जब तक ई जमीन अपना बल-बूते ना खड़ा होई, ई दरद रहले रही।’
अंत में लेखक साफ कर देत बाड़न कि जे बदलाव के राह ना अपनाई, ई जमीन साफ-साफ कह दी— ‘तू ना माई के, ना मेहरी के।’ स्त्री-विमर्श पर ऐकरा से बड़ बात का होखी?
एकहवा, लेवा आ ‘ढ़ूँढ़न हम आइब’ के हम आत्म-संस्मरणात्मक आलेख कहल चाहतानी, एह से कि लेखक अपना संस्मरण के सामाजिक जामा पहिरा के सामने रखले बाड़े। ‘एकहवा’ में अपना गाँव के एगो बरियार झखाड़ आम के गाछि के बहाने गाछ-वृक्ष के महत्व, ओकरा कट गइला के दुख, गंवई जिनिगी के ओकरा से लगाव आ पर्यावरण संरक्षण में ओकर योगदान पर भरपूर बात करत बाड़न। साथ ही, वन विभाग के वृक्षारोपण के कागजी खानापूर्ति, अलाय-बलाय गाछ बिना सोचले लगावल आ फेर काटल, पर्यावरण के नाम पर आम आदमी के बढ़त परेशानी आ विभागीय लूट-खसोट पर प्रश्नचिह्न खड़ा करत बाड़न, जे बहुत हद तक सही बा।
‘लेवा’ में लेवा, जे गरीब के घर-बाहर के ओढ़ना आ बिछवना दूनो ह आ घर के फाटल-पुरान कपड़न से घरहीं बनावल उत्पाद ह, जेकरा से माई-ईया के इयाद जुड़ल रहेला, ओकर विशेषता आ वर्णन आत्मीय लगाव के साथे कइल गइल बा।
‘ढ़ूँढ़न हम आइब’ में लेखक अपना माई के अंतिम साँस लेवे के घरी के मार्मिक ढंग से रखत, एगो गीत के माध्यम से सामंती रीति-नीति के मोहक रूप के वर्णन करत, ओकरा के बेमतलब आ अमानवीय बतवले बाड़न।
कुल मिलाके ‘झनकि बाजे हो’ में संग्रहित रम्य रचनन के पढ़त मन अइसे ओह में रम जाता कि पाठक ओकरा से अपना के अलग क के नइखे देख पावता आ ओकरा ई आपन गाँव-घर के कहानी लागता। ‘झनकि बाजे हो’ में संग्रहित रचनन काल्पनिक सोच से उपजल रचना नइखी सऽ। ऐहनी में जे चीज हाथ में कँगन जइसन साफ-साफ लउकता, उहे परोसल गइल बा आ उहे साँच ह। जनता के चरित मूल रूप से यथास्थितिवादी होला आ एह रचनन में आम जिनिगी के बात कइल गइल बा।
एगो बात अउरी बा। साहित्यकार अक्सर देखावे के कोसिस करेलन कि ऊ विवेकसंपन्न बाड़न, बाकी सत्ता के रुख देख चाहे ऊ चुप हो जालन, चाहे ज्वलंत प्रश्न के दिशा दोसर ओर मोड़ देलन। एगो सच्चा साहित्यकार साँच के साँच कहेला आ तरफदारी साँच के करेला। बलभद्र साँच के साँच कहे वाला साहित्यकार हवन, जेकरा के उनुकर इहो संग्रह प्रमाणित करता।
बलभद्र आपन एह संग्रह में सीधा-साधा, ठेठ गंवई भोजपुरी शब्दन के प्रयोग कइले बाड़न, जे ऐकर सुंदरता बढ़ा रहल बा। श्री कमलेश राय के शब्दन में बलभद्र के लेखनी के बारे में कहे के होई, त अतने कहब—
‘ देखा है यदि चाँद को कहो उसे तुम चाँद
सच को कहने में कभी करना नहीं प्रमाद।’
अंत में आदरणीय द्वारिका तिवारी जी के शब्द उधार लेके कहल चाहब कि, “आजुओ रचना ठेठ भोजपुरी में गँवई बदलाव, लोग के रहस्यमय चाल-चलन, प्रकृति पर आधारित विषय, सामाजिक संदेश, चेतावनी, परदा में श्रृंगार आ राजनीतिक आडंबर पर होखे त खूब पसंद कइल जाई।” आ बलभद्र के ‘झनकि बाजे हो’ एह मापनी पर पूरा तरे खरा उतर रहल बा। ई संग्रह भोजपुरी साहित्य के समृद्धि में बढ़त एगो बड़हन डेग के नमूना ह। बाकी एह संग्रह के पोरे-पोर में भरल पीर देखत हम कहब कि, “झनकि बाजे हो मन के भितरी दरदिया।”
झनकि बाजे हो
रचनाकार – बलभद्र
विधा – रम्य रचना संग्रह
प्रकाशक – सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
मूल्य – 140.00/
कुल पृष्ट – 70

