‘किसी का सत्य था,
मैंने संदर्भ में जोड़ दिया।
कोई मधुकोष काट लाया था,
मैंने निचोड़ लिया।
यो मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ,
काव्य-तत्त्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ?
चाहता हूँ आप मुझे,
एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ें।
पर प्रतिमा- अरे, वह तो,
जैसी आप को रुचे आप स्वयं गढ़े।’
अज्ञेय की इन पंक्तियों को पढ़ते समय स्पष्ट प्रतीत हो रहा कि साहित्य का आविर्भाव भी इसी समाज से होता है जिसे रचनाकार अपने भावों के साथ मिलाकर उसे एक आकार देता है। यही रचना समाज के नवनिर्माण में पथप्रदर्शक की भूमिका निभाने लगती है। यह साहित्य अनुभवजनित होता है। जब भोगे हुए यथार्थ को शब्दों में दर्ज किया जाता है तो उसकी प्रासंगिकता समाज के लिए प्रभावी बन जाती है।

भोजपुरी के यशस्वी कथाकार कृष्ण कुमार इन्हीं मूल्यों पर अपनी रचना संसार गढ़ते हैं, इनकी कहानी हो, निबंध हों, कविता हों उसमें समय से संवाद, यथार्थ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलता है। सद्य: प्रकाशित इनकी पहली काव्य संग्रह ‘अल्ट्रासोनोग्राफी’ को पढ़ते समय प्रेमचंद की एक पंक्ति याद आ रही ‘डरपोक प्राणियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है।’
यहां कृष्ण कुमार के पात्रों की चेतना मौन नहीं, बल्कि समय, परिस्थिति और परिवेश में बदलाव के साथ डटे हैं, मुखर हैं। इस संग्रह की एक कविता ‘हताश मत होखऽ’ में दहाड़ है नारी सशक्तिकरण की जिसके लिए रचते हैं कृष्ण कुमार-
‘जीवन एगो लडाई हऽ,
लड़े के चाहिं,
राह में आवे वाला,
मुश्किल आ असफलता से,
कबो हताश ना होखे के चाहिं…।’
छत्तीस कविताओं के इस संग्रह में दो चार को छोड़ दें,तो नारी सशक्तिकरण की प्रतिबद्धता साफ-साफ है। ‘अल्ट्रासोनोग्राफी’ कविता में भ्रूण हत्या के प्रति आक्रोश है,तो ‘हमरो जीए के बा ‘ में आकाश में उड़ान भरने की चाह है। कविता ‘हाजत’ में मानवीय असंवेदना का नग्न रूप जब दिखता है, तो ‘वहशी दौर में बेटी’ कविता में कृष्ण कुमार अपने आक्रोश को रोक नहीं पाते-
‘बात मेहारारून के,
पहनावा, पहरा, पाबंदी प,
आके अटकि जाई ।
बाकिर, अइसन घिनौना कुकरमी के,
मान-मर्दन के कबो,
गम्भीर बहस ना होई,
ओकर अंग-भंग ना कइल जाई।
कानून के बरियार खौफ,
दरिन्दन के ना होई,
अगर होइत त,
अइसन सामूहिक पासविकता के,
दोबारा पुनरावृति ना होईत ।’

इस काव्य संग्रह में संकलित कविताओं को पढ़ने के बाद 1906 में मैक्सिम गोर्की द्वारा लिखा गया ‘ माँ ‘(मदर) उपन्यास की याद आ जाती है, जिसमें क्रांतिकारी मानवता की बहुआयामी झलक देखने को मिलता है | माँ पुरी दुनिया की समूची मेहनतकश और मुक्तिकामी जनता के लिए लिखा गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण आख्यान है, जिसने असंख्य लोगों की चेतना को झकझोरा था।इसे पढ़ने के बाद बहुत से लोग प्रगतिशील एवं वामपंथी आन्दोलन से जुड़े थे। इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय 1905 से पूर्व सोवियत संघ मजदुर वर्ग का जीवन, निरंकुश राजतंत्र और पूंजीपति वर्ग के खिलाफ उनका संघर्ष, उनकी क्रांतिकारी चेतना में वृद्धि तथा इस क्रांति से आगे आए पथ-प्रदर्शक एवं क्रांतिकारी नेताओं को चित्रित किया गया है। नायक पावेल ब्लासेव मजदूरों में क्रांतिकारी चेतना जगाने का काम करता है ,ठीक वैसे ही इस भोजपुरी काव्य संग्रह की तमाम कविताएं समाज में महिलाओं, शोषितों, पीड़ितों, दमितों ,दलितों और उपेक्षितों में चेतना जगाते हुए दिखती हैं। शायद इसीलिए कृष्ण कुमार इस संग्रह को दुनिया के सभी मां को समर्पित करते हैं।
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जो तेवर इनके उपन्यास ‘के हवन लछुमन मास्टर’ और ‘बरमूदा त्रिकोन’ कहानी संग्रह में है,उसी सामाजिक मानवीय मूल्यों के प्रतिस्थापन, स्त्री सशक्तिकरण की भूख की अगली कड़ी है काव्य संग्रह-‘अल्ट्रासोनोग्राफी’।
जहां प्रख्यात कथाकार मिथिलेश्वर का कथन सटीक बैठता है कि, ‘कृष्ण कुमार की सबसे बड़ी विशेषता भोजपुरी भाषा को लेकर स्वयं की क्षमता है। भोजपुरी के सघन आंचलिक शब्दों के जीवंत प्रयोग, नवीनता और समाज के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनकी रचनाओं को अभिनव स्वरूप प्रदान करता है।’
प्रख्यात भोजपुरी कथाकार कृष्ण कुमार ‘अल्ट्रासोनोग्राफी’ के आवरण में स्त्री सशक्तिकरण, बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओं अभियान को सशक्त करने की पूरजोर कोशिश किये हैं, साथ ही समाज में स्त्रियों की जमीनी सच्चाई को वयां करने जैसे स्त्री शोषण और जीवन-संघर्ष को रेखांकित करने का प्रयास भी किये हैं। यह मानव के सपनों को मूर्त रूप देने की यथार्थवादी दृष्टिकोण है। इस संग्रह में स्त्रियों के प्रति पुनर्जागरण का आह्वाहन एवं संवेदनात्मक गहराई है । यह संग्रह सामाजिक उत्थान की दृष्टि से शोध का विषय साबित होगा ।इस काव्य संग्रह के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामना।
डॉ.पुष्कर कुमार, दिल्ली

