परदेस से लौटे लोगों ने कैसे बदला भोजपुरी-बिहारी खाने का स्वाद?

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पटना: बिहार का खानपान केवल लिट्टी-चोखा या सत्तू तक सीमित नहीं है। इसकी रसोई दरअसल सदियों की यात्राओं, प्रवास, व्यापार, संघर्ष और सांस्कृतिक मेल-मिलाप की कहानी कहती है। बिहार के लोग जब रोज़गार, शिक्षा, व्यापार या मजदूरी के लिए देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गए, तो वे केवल अपनी मेहनत और सपने ही नहीं ले गए, बल्कि वहां के स्वाद भी अपने साथ वापस लेकर आए। धीरे-धीरे वे स्वाद बिहार की रसोई में घुलते चले गए और नए व्यंजनों का हिस्सा बन गए। यही कारण है कि बिहार का भोजन आज केवल पारंपरिक नहीं, बल्कि बहुसांस्कृतिक अनुभव भी बन चुका है।

भोजपुरिया लोगों का प्रवासी परंपरा और स्वाद का सफर

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बिहार लंबे समय से प्रवास की भूमि रहा है। अंग्रेजों के समय बड़ी संख्या में बिहारी मजदूरों को मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और कैरेबियन देशों तक ले जाया गया। वहीं स्वतंत्रता के बाद रोजगार और शिक्षा के लिए लाखों लोग कोलकाता, पंजाब, दिल्ली, मुंबई और दक्षिण भारत की ओर गए। हर यात्रा अपने साथ नए स्वाद लेकर आई। भोजपुरी समाज के लोकगीतों में भी परदेस और कलकत्ता का बार-बार उल्लेख मिलता है। यह केवल भावनात्मक दूरी की कहानी नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भी कहानी थी। जो लोग बाहर से लौटते थे, वे वहां के खाने की बातें करते, नए मसाले लाते और घरों में नए तरीके से पकवान बनने लगते।

कोलकाता से आया रोल और चाउमीन का स्वाद
बिहार के शहरों में आज जो एग रोल, चाउमीन और कटलेट आम दिखते हैं, उनका बड़ा प्रभाव बंगाल और खासकर कोलकाता से आया। 1960 और 70 के दशक में बड़ी संख्या में बिहारी मजदूर और छात्र कोलकाता जाते थे। वहां की सड़क किनारे मिलने वाली चाइनीज-इंडियन डिशेज उन्हें पसंद आने लगीं। धीरे-धीरे पटना, गया, मुजफ्फरपुर और भागलपुर जैसे शहरों में भी चाउमीन और रोल की दुकानें खुलने लगीं। हालांकि बिहार ने इसे भी अपने स्वाद के अनुसार बदल लिया। यहां चाउमीन में ज्यादा मसाले और तीखापन जुड़ गया। एग रोल में सरसों वाली चटनी और देसी मसालों का तड़का लगने लगा।

पंजाब और दिल्ली से आया तंदूरी और पनीर कल्चर
1990 के दशक के बाद जब बड़ी संख्या में बिहारी युवक पंजाब और दिल्ली में काम करने लगे, तब वहां के खाने का प्रभाव बिहार की रसोई पर भी दिखने लगा। पहले गांवों में पनीर बहुत कम बनता था और तंदूरी खाना लगभग नहीं के बराबर था। लेकिन बाहर काम कर रहे लोगों ने जब बटर चिकन, दाल मखनी और पनीर टिक्का का स्वाद चखा, तो वे उसे बिहार तक ले आए। आज बिहार के छोटे कस्बों तक में पंजाबी ढाबा और तंदूरी रोटी आम हो चुके हैं। शादी-ब्याह के मेन्यू में शाही पनीर और नान अब सामान्य बात है। यह बदलाव केवल होटल संस्कृति का नहीं, बल्कि प्रवासी अनुभवों का परिणाम है।

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दक्षिण भारत से डोसा-इडली का विस्तार
एक समय था जब बिहार में डोसा और इडली केवल बड़े शहरों के कुछ रेस्तरां तक सीमित थे। लेकिन इंजीनियरिंग, नौकरी और पढ़ाई के लिए दक्षिण भारत जाने वाले युवाओं ने वहां की खानपान संस्कृति को भी अपनाया। लौटने पर उन्होंने अपने शहरों में दक्षिण भारतीय भोजन की दुकानों की शुरुआत की। आज पटना से लेकर दरभंगा तक “मसाला डोसा” और “फिल्टर कॉफी” आसानी से मिल जाती है। हालांकि बिहार ने इसे भी अपने हिसाब से ढाल लिया। कई जगह डोसा के साथ नारियल चटनी के अलावा हरी मिर्च वाली देसी चटनी भी परोसी जाती है।

गल्फ देशों से कबाब और मसालों का प्रभाव
बिहार से बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों में काम करने जाते हैं। वहां के अरब और मुगलई खाने का असर भी बिहार की रसोई पर पड़ा। खासकर पटना और सीमांचल क्षेत्र में शावरमा, कबाब और ग्रिल्ड मीट का चलन बढ़ा। पहले जहां मटन केवल पारंपरिक तरीकों से पकाया जाता था, वहीं अब अरबियन मसालों और ग्रिलिंग तकनीकों का इस्तेमाल भी दिखने लगा है। कई रेस्तरां अरबियन चिकन और मंडी जैसे व्यंजन परोसने लगे हैं।

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मिठाइयों में भी दिखा बाहरी प्रभाव
बिहार की मिठाइयों में भी बाहरी स्वाद शामिल हुए। बंगाल से रसगुल्ला और चमचम का प्रभाव आया, तो उत्तर भारत से गुलाब जामुन और काजू कतली का चलन बढ़ा। हालांकि बिहार ने अपने पारंपरिक स्वाद को भी बनाए रखा। खाजा, ठेकुआ, अनरसा और तिलकुट जैसे व्यंजन आज भी अपनी अलग पहचान रखते हैं।

बिहार ने केवल अपनाया नहीं, बदला भी
दिलचस्प बात यह है कि बिहार ने केवल बाहर के स्वादों को अपनाया नहीं, बल्कि उन्हें अपने अनुसार बदल भी दिया। यही वजह है कि बिहार में मिलने वाला चाउमीन दिल्ली या कोलकाता से अलग स्वाद देता है। यहां की बिरयानी में भी स्थानीय मसालों और सरसों के तेल की हल्की झलक मिल जाती है। यानी बिहार की रसोई केवल नकल नहीं करती, बल्कि हर स्वाद को बिहारी बना देती है।

प्रवास ने बदली खाने की सोच
पहले गांवों में भोजन का मतलब था दाल, भात, रोटी और मौसमी सब्जियां। लेकिन प्रवास ने खाने को अनुभव में बदल दिया। अब लोग केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि नए स्वाद खोजने के लिए भी बाहर जाते हैं। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फूड व्लॉगिंग ने इस बदलाव को और तेज कर दिया। बाहर रहने वाले बिहारी अब सोशल मीडिया पर नए व्यंजनों के वीडियो देखकर उन्हें घरों में बनाने लगे हैं।

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बदलते स्वादों के बीच बची हुई जड़ें
भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा होता है। जब बिहारी मजदूर पंजाब गए, तो वहां की रोटियां बिहार तक आईं। जब छात्र बेंगलुरु गए, तो डोसा यहां पहुंचा। जब लोग गल्फ गए, तो कबाब और मंडी आए। यानी हर प्रवास ने बिहार की थाली में एक नया अध्याय जोड़ दिया। हालांकि आधुनिकता और बाहरी प्रभावों के बावजूद बिहार की मूल भोजन संस्कृति आज भी जीवित है। आज भी गांवों में सत्तू, लिट्टी-चोखा, चूड़ा-दही और दाल-भात का महत्व कम नहीं हुआ है। बल्कि कई बार लोग बाहर के स्वाद चखने के बाद फिर अपने पारंपरिक भोजन की ओर लौटते हैं। यही बिहार की सबसे बड़ी ताकत है यह नए स्वादों को अपनाता है, लेकिन अपनी मिट्टी की पहचान नहीं छोड़ता।

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बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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