सुहागिन महिलाओं का सबसे बड़ा पावन पर्व है वट सावित्री व्रत, जानें विधि

Date:

साल 2026 में वट सावित्री का व्रत 16 मई (शनिवार) को मनाया जा रहा है। पंचांग के अनुसार यह व्रत हर साल ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि पर रखा जाता है, जिसमें सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य के लिए वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं।

शुभ मुहूर्त (Puja Shubh Muhurat):
प्रातः काल का शुभ मुहूर्त: सुबह 07:12 बजे से 08:24 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक
राहुकाल (इस समय पूजा से बचें): सुबह 08:54 बजे से 10:36 बजे तक

गोरखपुर: भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से भोजपुरी समाज में तीज-त्योहारों की समृद्ध परंपरा रही है। इनमें वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए श्रद्धा और आस्था के साथ करती हैं।

श्री गोरक्षनाथ मंदिर, गोरखपुर से संबद्ध धर्माचार्य पंडित शशांक शास्त्री के अनुसार, वट सावित्री व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट प्रेम, समर्पण, त्याग और नारी शक्ति का प्रतीक है। यह व्रत भारतीय सनातन संस्कृति में स्त्री के दृढ़ संकल्प और उसकी आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाता है।

सावित्री और सत्यवान की अमर कथा

पंडित शशांक शास्त्री बताते हैं कि इस व्रत की पौराणिक कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री का विवाह सत्यवान नामक राजकुमार से हुआ था। विवाह से पहले ही ऋषियों ने भविष्यवाणी कर दी थी कि सत्यवान की आयु बहुत कम है, लेकिन सावित्री ने अपने दृढ़ निश्चय और प्रेम के कारण सत्यवान को ही अपना पति चुना।

निर्धारित समय आने पर जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने पहुंचे, तब सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। सावित्री की बुद्धिमत्ता, पतिव्रता धर्म और अटूट निष्ठा से यमराज अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने सावित्री को वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने अत्यंत चतुराई और धैर्य के साथ ऐसे वरदान मांगे कि अंततः यमराज को सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े। मान्यता है कि जिस वट वृक्ष के नीचे सत्यवान को पुनः जीवन मिला, उसी कारण इस व्रत का नाम “वट सावित्री व्रत” पड़ा।

ये भी पढ़ें – भोजपुरी लोकगीतों की परंपरा सिर्फ मनोरंजन नहीं, जीवन के दस्तावेज भी

पूजा की तैयारी और विशेष सामग्री

पंडित शशांक शास्त्री के अनुसार, इस दिन महिलाएं प्रातःकाल स्नान करके नए वस्त्र धारण करती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। कई महिलाएं गंगा स्नान करती हैं, जबकि घरों में गंगाजल मिलाकर स्नान करने की भी परंपरा है। पूजा में मुख्य रूप से इन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है-
बांस की डलिया
भीगा हुआ चना और अक्षत (चावल)
कच्चा सूत
मौसमी फल जैसे आम, केला, लीची
पुआ-पूरी और अन्य पकवान
सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, अलता सहित श्रृंगार सामग्री
वट वृक्ष की पूजा का महत्व

शशांक शास्त्री बताते हैं कि सनातन धर्म में वट वृक्ष को अत्यंत पवित्र माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास होता है। वट वृक्ष दीर्घायु, स्थिरता और जीवन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ें और शाखाएं निरंतर फैलती रहती हैं, इसलिए महिलाएं अपने परिवार की समृद्धि, पति की लंबी आयु और वंश वृद्धि की कामना करते हुए इसकी पूजा करती हैं।

ये भी पढ़ें-भोजपुरी सिनेमा के ‘अमरीश पुरी’ के बारे में आप कितना जानते हैं?

पूजा विधि

सुहागिन महिलाएं समूह में वट वृक्ष के पास जाकर पूजा करती हैं। वृक्ष की जड़ में जल अर्पित किया जाता है, सिंदूर लगाया जाता है और फल-फूल एवं पकवान चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटती हैं। कई स्थानों पर सात बार और कई जगह 108 बार परिक्रमा करने की परंपरा है। परिक्रमा के दौरान महिलाएं अपने पति के सुखी और दीर्घ जीवन की प्रार्थना करती हैं।

ये भी पढ़ें- परदेस से लौटे लोगों ने कैसे बदला भोजपुरी-बिहारी खाने का स्वाद?

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

भोजपुरी क्षेत्र में यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रेम और पारिवारिक एकता का भी प्रतीक है। पूजा के बाद महिलाएं अपनी सास, जेठानी या परिवार की बड़ी सुहागिन महिलाओं का आशीर्वाद लेती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं एक-दूसरे की मांग में सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

नारी शक्ति और संकल्प का प्रतीक

शशांक शास्त्री का कहना है कि वट सावित्री व्रत भारतीय नारी की आस्था, प्रेम और संकल्प का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व संदेश देता है कि सच्चा प्रेम, धैर्य और निष्ठा किसी भी कठिनाई को पराजित कर सकते हैं। वट सावित्री व्रत आज भी भारतीय संस्कृति की परंपरा, पारिवारिक मूल्यों और सनातन आस्था को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।

ये भी पढ़ें- भोजपुरी सिनेमा के ‘जनक’ नजीर हुसैन कौन थे, जिन्हें अंग्रेजों ने सुनाई थी फांसी की सजा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

भोजपुरी में बनी ‘वैभव चालीसा’, IPL स्टार वैभव सूर्यवंशी के फैन का VIDEO वायरल

मुंबई। आईपीएल 2026 में अपने तूफानी प्रदर्शन से क्रिकेट...

…जहां तीन वर्षों में एक बार धरती पर उतरते हैं 33 करोड़ देवी-देवता

राजगीर का प्रसिद्ध मलमास मेला 17 मई से 15...

बिहार के लइका वैभव सूर्यवंशी का धमाल, IPL में नए युग की शुरुआत

पटना: इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) 2026 के इस रोमांचक...