भोजपुरी सिनेमा के ‘जनक’ नजीर हुसैन का जन्मदिवस इसी महीने के 15 तारीख को होती है। भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत 1963 में बनी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ (Ganga Maiya Tohe Piyari Chadhaibo) से मानी जाती है। इस फिल्म की परिकल्पना और निर्माण के पीछे नजीर हुसैन का ही दिमाग था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें अपनी मातृभाषा भोजपुरी में फिल्म बनाने की प्रेरणा दी थी।
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Father of Bhojpuri Cinema Nazir Hussain भोजपुरी सिनेमा की नींव रखने वाले, हिंदी फिल्मों के सशक्त चरित्र अभिनेता और आज़ादी की लड़ाई के जांबाज सिपाही नजीर हुसैन का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक ओर वे परदे पर सैकड़ों किरदारों में ढलते रहे, तो दूसरी ओर असल जिंदगी में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया, जेल की सजा झेली और मौत को भी मात दे दी। हाल ही में एक पॉडकास्ट में अभिनेता दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ ने उनके योगदान का जिक्र किया, जिससे एक बार फिर यह नाम चर्चा में है।

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भोजपुरी सिनेमा की पहली लौ, ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’
भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत 1963 (22 फरवरी) में बनी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ से मानी जाती है। इस फिल्म की परिकल्पना और निर्माण के पीछे नजीर हुसैन का ही दिमाग था। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की 1960 के दशक में नजीर से मुलाकात हुई थी। तब उन्होंने नजीर से भोजपुरी सिनेमा की ओर पहल करने की बात कही थी। इसके बाद नजीर हुसैन 1963 में पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ लेकर आए। कहा जाता है कि तभी से भोजपुरी फिल्मों का सिलसिला शुरू हुआ। यह फिल्म जबरदस्त हिट रही और यहीं से भोजपुरी सिनेमा की मजबूत नींव पड़ी। इसी कारण नजीर हुसैन को ‘भोजपुरी सिनेमा का पितामह’ कहा जाता है।
गाजीपुर जिले के उसिया गांव के थे नजीर हुसैन
नजीर हुसैन का जन्म 15 मई 1922 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के उसिया गांव में हुआ था। उनके पिता शहबजाद खान भारतीय रेलवे में गार्ड थे, जिसके कारण परिवार में अनुशासन और नौकरी की स्थिरता का माहौल था। पिता की सिफारिश पर नजीर हुसैन को भी रेलवे में फायरमैन की सरकारी नौकरी मिल गई, लेकिन उनका मन इस काम में नहीं रमा। उनमें कुछ अलग करने और बड़े उद्देश्य के लिए जीने की बेचैनी थी। यही कारण रहा कि कुछ ही महीनों बाद उन्होंने यह सुरक्षित नौकरी छोड़ दी और ब्रिटिश आर्मी ज्वाइन कर ली।

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आजादी की लड़ाई का जांबाज सिपाही
फिल्मों में आने से पहले नजीर हुसैन का जीवन पूरी तरह अलग था। वे ब्रिटिश आर्मी में शामिल हुए, लेकिन जल्द ही देशभक्ति की भावना ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम की ओर मोड़ दिया। उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज का साथ दिया और अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। यह वही दौर था जब देश के लिए जान देना भी एक कर्तव्य माना जाता था और नजीर इस भावना के प्रतीक बन गए। इसी दौरान नजीर ने चुपके से एक कागज पर अपने सकुशल होने की चिट्ठी लिखी और जैसे ही दिलदारनगर जंक्शन आया, खिड़की से वह कागज फेंक दिया। तब जाकर उनके घरवालों तक उनकी जानकारी पहुंची। हालांकि उस वक्त गांववालों ने उन्हें अंग्रेजों से छुड़वाने की कोशिश जरूर की, लेकिन वे विफल रहे। बाद में जब देश आजाद हुआ तो नजीर को रिहा कर दिया गया।
कहा जाता है कि रिहाई के बाद नजीर को लाइफटाइम के लिए रेलवे का पास दिया गया था। बता दें, बिमल राय ने नजीर को फिल्मी दुनिया में इंट्रोड्यूस किया था। इसके बाद बॉलीवुड में उन्होंने ‘परिणीता’, ‘जीवन ज्योति’, ‘मुसाफिर’, ‘अनुराधा’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘नया दौर’, ‘कटी पतंग’, ‘कश्मीर की कली’ जैसी कई फिल्मों में छोटे-बड़े किरदार निभाए।
नजीर हुसैन को क्यों सुनाई गई थी फांसी की सजा?
नजीर हुसैन अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय हो गए थे और आज़ाद हिंद फौज के साथ जुड़कर उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी वे इस लड़ाई का हिस्सा रहे। बताया जाता है कि अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के कारण उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इसी दौरान नजीर हुसैन को सजा-ए-मौत सुनाई गई थी. पहले उन्हें लाल किले में फांसी दी जानी थी। पहले उन्हें मलेशिया और सिंगापुर की जेलों में कैद रखा गया था, फिर इंडिया लाया गया था। नजीर हुसैन के जीवन का सबसे रोमांचक अध्याय तब सामने आता है, जब अपनी सूझबूझ और साहस के बल पर वे जेल से भाग निकले। यह घटना उन्हें सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि एक असली नायक के रूप में स्थापित करती है।

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ऐसे हुई थी फिल्मों में एंट्री
नजीर हुसैन को उनके साथियों ने अंग्रेजों को चकमा देकर बचाया। आजाद होने के बाद वे देश के लिए काम करते रहे, लेकिन आजादी के बाद उनके पास कोई स्थायी काम नहीं था। ऐसे में उन्होंने बी.एन. सरकार के साथ नाटक लिखने का काम शुरू किया। वे नाटक भी लिखते और अभिनय भी करते थे। उनके एक नाटक को देखकर बिमल राय प्रभावित हुए और 1950 में आई सुभाष चंद्र बोस पर फिल्म ‘पहला आदमी’ की कहानी लिखने का मौका दिया। इसके बाद नजीर हुसैन ने अभिनय की दुनिया में भी कदम रखा और कई सपोर्टिंग किरदार निभाए।
500 फिल्मों का सफर, हर किरदार यादगार
करीब 44 साल लंबे करियर (1948–1996) में नजीर हुसैन ने लगभग 500 फिल्मों में काम किया। ‘दो बीघा जमीन’, ‘देवदास’, ‘कश्मीर की कली’, ‘राम और श्याम’, ‘ज्वेल थीफ’, ‘चरस’ जैसी फिल्मों में उनके निभाए किरदार आज भी याद किए जाते हैं। वे कभी पिता बने, कभी चाचा, तो कभी पुलिस अधिकारी और हर भूमिका में उन्होंने जान डाल दी। नजीर हुसैन हिंदी सिनेमा के एक बेहद प्रतिभाशाली लेकिन अक्सर नजरअंदाज किए गए दिग्गज कलाकार थे, लेकिन उन्हें कभी कोई बड़ा सम्मान या अवॉर्ड नहीं मिला।
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सम्मान से दूर, लेकिन दर्शकों के दिलों में अमर
इतना लंबा और प्रभावशाली करियर होने के बावजूद नजीर हुसैन को कभी बड़े पुरस्कार या सम्मान नहीं मिले। यह हिंदी सिनेमा की एक बड़ी विडंबना है कि जिन कलाकारों ने नींव मजबूत की, उन्हें अक्सर वह पहचान नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे। फिर भी दर्शकों के दिलों में उनकी जगह आज भी अटूट है, यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
विरासत जो आज भी जिंदा है
15 मई 1922 को जन्मे नजीर हुसैन का निधन 16 अक्टूबर 1987 को हार्ट अटैक से हुआ। पत्नी की मृत्यु के बाद वे अकेलेपन से भी जूझते रहे, लेकिन उनकी बनाई विरासत आज भी जीवित है। आज जब भोजपुरी सिनेमा देश-विदेश में अपनी पहचान बना रहा है, तो उसकी जड़ें नजीर हुसैन के उस साहसिक फैसले में हैं, जिसने एक नई इंडस्ट्री को जन्म दिया।
…..अगली सीरीज में पढ़ें की नजीर हुसैन जी के साथ और कौन कौन था


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